भगवान
(kundumeghna2003@gmail.com)
देव न इतने दूर रहो तुम, मेरे तन का आसन ले लो । यूं जग को अपनाओगे तुम, मेरे मन का आंगन ले लो ..। मन का दीप जलाया मैने, आशाओं के फूल चढ़ाए । कर सोलह श्रृंगार सजी मैं , पर, प्रियतम तुम इधर न आए। मेरे अंजन तुम्हें बुलाते , इन नयनों का सावन ले लो । सांस में याद लिए जो फिरती , मेरे गीत तुम्हीं को अर्पित । जो कुछ मेरी झोली मे है , सब कुछ तुमको किया समर्पित। तेरा दिया तुम्हें लौटाऊं , मेरा मौन समर्पण ले लो । नयनों मे मोहक रूप बसाए, लौ से जलने मे ही सुख है । धूप - छांह की आंख मिचौली , तुमको पाने मे ही सुख है । आंच बहुत सी सह ली मैंने , अब, मेरे मन का कंचन ले लो
। मेघना रॉय वाराणसी।
देव न इतने दूर रहो तुम, मेरे तन का आसन ले लो । यूं जग को अपनाओगे तुम, मेरे मन का आंगन ले लो ..। मन का दीप जलाया मैने, आशाओं के फूल चढ़ाए । कर सोलह श्रृंगार सजी मैं , पर, प्रियतम तुम इधर न आए। मेरे अंजन तुम्हें बुलाते , इन नयनों का सावन ले लो । सांस में याद लिए जो फिरती , मेरे गीत तुम्हीं को अर्पित । जो कुछ मेरी झोली मे है , सब कुछ तुमको किया समर्पित। तेरा दिया तुम्हें लौटाऊं , मेरा मौन समर्पण ले लो । नयनों मे मोहक रूप बसाए, लौ से जलने मे ही सुख है । धूप - छांह की आंख मिचौली , तुमको पाने मे ही सुख है । आंच बहुत सी सह ली मैंने , अब, मेरे मन का कंचन ले लो
। मेघना रॉय वाराणसी।

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