🙏पूज्य बाबूजी,
सादर नमन ।
बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है, यह जानती हूँ मैं ।
अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है ।
कभी-कभी एक अनजाना- सा भय लगता है , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद से घिरे हुए हैं।
आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी शाखाओं से हम पर स्नेह की
छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ । तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे ।
याद है न भूकंप के समय कितना डर गई थी मैं ।
सब मेरा मजाक उड़ाते थे, पर तुम मेरी मनःस्थिति को समझ कर कितना प्यार से सहलाते थे मुझे।
आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ ।
भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है ; और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न !
तुम्हारे रहते शायद हम बेफिक्र रहते । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न !
कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो ; समाचार मिलते रहते हैं । पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है।
एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी ।
बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें, चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही ।
आज बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हें बताना चाहती हूँ ; पर आँखें डबडबा रही हैं, शब्द धुंधले पड़ रहे हैं, ठीक से दिख नहीं रहा ।
तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी ! अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी ।
पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो --- आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं न कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----।
होती है न बाबूजी ! -
*तुम्हारी लाड़ली वंदना ।
बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है, यह जानती हूँ मैं ।
अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है ।
कभी-कभी एक अनजाना- सा भय लगता है , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद से घिरे हुए हैं।
आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी शाखाओं से हम पर स्नेह की
छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ । तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे ।
याद है न भूकंप के समय कितना डर गई थी मैं ।
सब मेरा मजाक उड़ाते थे, पर तुम मेरी मनःस्थिति को समझ कर कितना प्यार से सहलाते थे मुझे।
आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ ।
भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है ; और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न !
तुम्हारे रहते शायद हम बेफिक्र रहते । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न !
कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो ; समाचार मिलते रहते हैं । पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है।
एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी ।
बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें, चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही ।
आज बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हें बताना चाहती हूँ ; पर आँखें डबडबा रही हैं, शब्द धुंधले पड़ रहे हैं, ठीक से दिख नहीं रहा ।
तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी ! अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी ।
पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो --- आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं न कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----।
होती है न बाबूजी ! -
*तुम्हारी लाड़ली वंदना ।


बहुत उत्तम।
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