Monday, April 13, 2020

बड़ी बहन

*पूजनीय दीदी* हर बार माँ यह शब्द जरूर बोलती. "वो बचपन से ही बड़ी नटखट स्वभाव की है, पर तुम तो बड़ी हो - छोटी बाई - भैय्या को तुम्हे ही संभालना है". इसी उलाहने को सुनते हुए, और बड़े ही प्यार से छोटे बहन भाइयों को अपने नाज़ुक हांथों से संभालते हुए देखते ही देखते हम सब कब बड़े हो गए, पता ही नहीं चला. छोटे से गाँव में पढ़ाई की कोई सुविधा न होने के कारण दादी ने शहर में पढ़ने की सलाह दे डाली. पिताजी से कहा, "देख बाबू, बच्चों को पढ़ाना आज के समय में बहुत जरूरी है, लड़कियों को अगर पढ़ाएगा नहीं तो अच्छे घर में कैसे ब्याही जाएँगी?" पिताजी को भी अम्मा की बातें जम गयी और तैयारी शुरू हो गयी शहर जाने की. गाँव से रोड तक बैलगाड़ी और फिर बस से आगे का सफर. कितना सुहाना लग रहा था अपने छोटे भाई बहनों के साथ शहर का वो सफर. शहर के बारे में केवल इतना ही मालुम था कि बहुत अच्छी जगह होती है और वहां बहुत सारे अच्छे अच्छे लोग मिलते हैं. बस स्टैंड से तांगे में बैठ कर आगे चले और तांगे की सवारी एक बड़े से मकान के आगे रुक गयी. देखा, सामने दरवाजे पर चाचाजी और चाचीजी खड़े हो कर हमारा इंतजार कर रहे थे. छोटी भाई बहन को गोदी में ले कर घर के अंदर आ गए. कहाँ गाँव की वो खुली खुली हवा, बाग़ बगीचा, कुँआ बावड़ी, वो बरगद का पेड़, जिसकी जटाओं से लटक कर सारे बच्चे खेलते रहते थे और कहाँ यह शहर का छोटा सा एक कमरे का घर, जिसमे भरा था, कोयले की सिगड़ी का धुआं और घुटन? सहमें हुए सभी भाई बहन एक दुसरे को आस भरी नज़रों से देख रहे थे. अगले दिन सुबह सवेरे ही पिताजी ने सभी बच्चों को नहला धुला कर साफ़ कपडे पहना दिए तो लगा जैसे आज कोई त्यौहार है, पर यह क्या? वो तो स्कूल ले कर आ गए. दादी के कहे हुए शब्द कानों में गूंजने लगे "मोडी स्कूल जाएगी तो पता चलेगा, यहाँ तो खूब मौज कर ले, जब पढ़ना पडेगा तब मालुम पड़ेगा" ऐसा लग रहा था कि अब वो समय आ गया. पिताजी ने एक साथ तीनो भाई बहनो का दाखिला करवा दिया और शुरू हो गयी पढाई। स्कूल में बहनजी तो एक ही थी और सर ज्यादा थे. स्कूल में मास्टरों की डाँट और घर में चाची का अनुशासन, घर में पढ़ाई भी करो और छोटे भाई बहनों का ख्याल भी रखो. हर बात में सुनना की तू तो बड़ी है और बड़ी जैसी ही रहो. गाँव में भी नन्नू मन्नू इनको बड़ी बाई ही कहते थे. देखते ही देखते समय भी इतनी जल्दी बदला, पढ़ाई अभी चल ही रही थी फिर अम्मा ने पिताजी के कान में बात डाल दी कि "बाबू अपनी बाई बड़ी हो गई है, अब जल्दी से इसका ब्याव करना है. और भी छोटी चार मोड़ियाँ हैं, उन सब के लाने भी तो सोचना है". पिताजी भी सोचने लगे की अम्मा सही तो कह रही हैं, उन्हें अम्मा की बात जँच गयी. उस रात पिताजी रात भर सोये नहीं और पूरी रात करवट रहे. मैंने पूछा "पिताजी क्या हुआ? आप चिंतित दिख रहे हैं." लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. पिताजी ने हमे कभी महसूस नहीं होने दिया की हम पांच लडकियां हैं. जितना भाइयों को स्नेह करते थे, उससे कहीं ज्यादा ही हम बहनो का ध्यान रखते थे. एक अच्छे मित्र की तरह हर बात में सलाह लेना और मन की बात सहजता से सुनना। अपनी कहना घर बाहर की बातों के अलावा घर गृहस्थी और व्यवहार की बातें समझाते। हमने उन्हें कभी क्रोध करते हुए नहीं देखा, हमेशा उन्हें धीर वीर गंभीर ही देखा था. सभी का ध्यान रखते और अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए देखा है. बड़ी से बड़ी समस्यों को चुटकियों में सुलझाना उनके बाएं हाथ का खेल था. धार्मिक प्रवर्ती, वेदों के ज्ञाता, दानवीर, औऱ धर्मवीर भी रहे और इसीलिए वे हमारे आदर्श रहे. काफी ढूँढ़ते ढूँढ़ते आखिर एक रिश्ता उन्हें अपनी पसंद का मिल गया, और बड़ी धूमधाम से शादी की तैयारी हुई. विदाई की रस्मे चल रही थी, सभी की आँखों से अश्रुधारा बाह रही थी. जिज्जी, जिन्होंने सभी को अपनी ममता के धागे से एक सूत्र में पिरो रखा था, आज हम सब से दूर जा रही थी. अब कौन हमारे ड्रेस के कपडे सियेगा? कौन खाना बना कर खिलायेगा? अंदर बाहर का काम जिज्जी ने ऐसा संभाला था. रोना रुक नहीं रहा था. पिताजी ने नववधू के रूप में सजी हुई जिज्जी के सर पर हाथ फेरा और कहा, बेटी तुम बड़ी हो, वहां परिवार की जिम्मेदारी अच्छे से संभालना ससुराल में पहुँचते ही सभी घर में खुश थे. सुन्दर सुशिल पढ़ी लिखी बहु जो घर में आयी थी. जीजाजी भी डॉक्टर होते हुए भी अनेकों प्रतिभाओं के धनी थे. कहते है ना, प्रतिभायें अपनी पहचान स्वयं बना लेती है. उनका हौसला और इच्छाशक्ति उन्हें शीर्ष शिखर तक ले जाने का कार्य करते हैं और कई तरह की संघर्षों और अड़चनों के बावजूद सफलता प्राप्त करते हैं तो उन्हें समाज के लिए एक उदहारण बन जाते है. साधारण से दिखने वाले व्यक्ति जब असाधारण सफलता पाते है तो कोई सोच भी नहीं सकता की अपने जीवन कितना खटे हैं. कितना संघर्ष किया है. उनके संघर्षों की बुनियाद के पीछे कितनी मेहनत है. अपने हौसलों के दम पर वे निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं. प्रयास करते हैं और इस तरह एक दिन वे सफलता के शिखर को छू ही लेते हैं. ऐसे ही स्नेही और श्रद्धेय हमारे जीजाजी रहे हैं. जीवन में अगर संघर्ष न हो, चुनौतियाँ ना हो तो मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वग्रहीत विकास

नहीं हो पाता। जिज्जी ने भी अपनी बराबरी से साथ दिया. परिस्थितियों से झूझते हुए कठिनाइयों से लड़ते हुए यदि हिम्मत न हारी जाये तो सफलता रुपी मंजिल जरूर मिलतीं है. जिज्जी आपने चुनौतियों से लड़ते हुए संगर्ष करते हुए अपना जीवन विकसित किया है. इसीलिए तो कहते हैं संघर्ष जीवन को निखारते हैं, संवारते हैं और तराशते हैं. और गढ़ कर ऐसा बना देते है जिसकी प्रशंसा करते हुए जबान थकती नहीं. संघर्ष हमे जीवन का अनुभव करवाते हैं. सतत सक्रिय बनाते हैं. और हमे जीना सिखाते हैं. संघर्ष का दामन थाम कर न केवल हम आगे बढ़ते हैं बल्कि जीवन जीने की सही अंदाज को, आनंद को अनुभव कर पाते है. परिवार की बड़ी माँ बहन सहेली हर रूप में छोटे बड़ों को संभाला, हर दम अपने चुलबाले हंसमुख स्वाभाव से मन मोहित करने वाली जिज्जी अंदर से कितने गहरे हृदय वाली हैं. जिस तरह नदी के प्रवाह के सतत संपर्क में रहने से पत्थर के आकार में धीरे धीरे परिवर्तन हो जाता है और वह कभी इतनी सुन्दर आकृति प्राप्त कर लेता है की शालिग्राम के रूप वह पूजनीय हो जाता है. कुछ ऐसा ही व्यक्तित्व जीवन भर के संघर्ष और उतार-चढ़ाव के फल स्वरूप आप का निखरा है. जैसे समुद्री जहाजों को प्रकाश स्तम्भ राह दिखाता है, वैसा ही आप हम सब के जीवन में एक प्रकाशस्तम्भ या दिशा-दर्शक का प्रतिरूप है. आदरणीय जिज्जी, आप हम सब की पूजनीय है. वंदनीय है, और आज आपके जन्मदिवस पर यही कामना है कि प्रथम पूज्य श्री महागणपति , परबह्म परमेश्वर विष्णु , देवाधिदेव महादेव , जगत्जननी माँ भगवती , महामाया महालक्ष्मी , वीणापाणी माँ सरस्वती की अद्भुत कृपा आप पर सदैव बनी रहे, आप सुख समृद्धिवान हों , कीर्तिवान हों , यशवान हों , आयुष्मान हों , स्वस्थ्य रहें , आपके जीवन का हर पल खुशियों से भरपूर रहे , जीवन के प्रत्येक क्षण आप प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे , आपकी कीर्ति की पताका निरंतर फहराती रहे आपकी सदैव जय हो .......... स्वत्यस्तु ते कुशल्मस्तु चिरयुरस्तु॥ विद्या विवेक कृति कौशल सिद्धिरस्तु ॥ ऐश्वर्यमस्तु बलमस्तु राष्ट्र भक्ति सदास्तु॥ वन्शः सदैव भवता हि सुदिप्तोस्तु..!!! जीवेम शरदः शतम ! बृयाम शरदः शतम! शृणुयाम शरदः शतम! नंदाम शरदः शतम! मोदाम शरदः शतम! कुर्वन्नेव कर्माणि जीजीविशेम शतम समा!!!" भावार्थ ;- "आप सदैव आनंद से, कुशल से रहे तथा दीर्घ आयु प्राप्त करें | विद्या, विवेक तथा कार्यकुशलता में सिद्धि प्राप्त करें | ऐश्वर्य व बल को प्राप्त करें तथा राष्ट्र भक्ति भी सदा बनी रहे| आपका वंश सदैव तेजस्वी बना रहे| आप शतायुषी हो,

श्रीमती सुनीता  सक्सेनस

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