*चुप्पी*
अक्सर चूप-चूप रहा करतीं थीं,
अपनी दिल की बातें कभी भी ना कहतीं थीं!
शर्म और लाज के परदों में हमैशा छुप कर रहतीं थीं,
कहतीं थीं कहनें का हक़ नहीं था उसे!
शादी से पहले उसके पिता,
और शादी के बाद पति ही मुख्य निर्णय करता थें!
शादी के पहले का पता नहीं,
मगर पिताजी को अक्सर अपने दिल की बातें कह दिया करतीं थीं माँ!
वो मेरी पाठशाला से पीकनीक जाने की बातें चली,
मेरा बहुत मन था जाने का मगर ना कह दिया माँ ने!
मैं भी रूठी रहीं सप्ताह भर उससे,
सभी कार्य करतीं थीं मगर बात नहीं करतीं थीं!
पिताजी ने सबको मनाया और मुझे भेज दिया था!
अब तक मैं माँ से नाराज़ थीं,
मगर वो कुछ नहीं बोलीं!
मैं जाने को तैयार हो गई,
तब भी कुछ नहीं बोलीं!
बाद में वापस आई तब तोहफ़ा तो था,
मगर दिया नहीं मैने उसे!
सबकुछ जानती थीं वह,
फिर भी कुछ नहीं बोलीं वो!
फिर जन्मदिन की पार्टी करनी थीं सहेलियों संग,
तब भी ना कह दिया उसने!
मगर फिर पिताजी ने सबको मनाया,
और मुझे मेरी खुशी मिल गई!
बाहर जाकर पढ़ने जाने की बातें चली,
तब भी लड़की हैं क्या करेगी बाहर जाकर ऐसा कहकर ना कह दिया!
हर बार ना कहतीं रहीं,
मगर सदा अपनी ना में भी हां छुपाकर बैठी रहीं!
मेरे सामने ना कहतीं,
पूरे परिवार के सामने भी ना कहतीं थीं!
अकेले में पिताजी को,
अटुट विश्वास का दिलासा दें हां करवाती रहीं!
लोगों ने सवाल उठाएं कैसी माँ हैं,
सब सहती रहीं कभी सच्चाई ज़ाहिर न होने दिया!
मेरी नफ़रत सहतीं रहीं,
परिवार की मर्यादा का पालन करतीं रहीं!
पिताजी के मान को बढ़ाती रहीं,
अपने हर ना में हां छुपाती रहीं!
©दीपशीखा अग्रवाल!
©दीपशीखा अग्रवाल!

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