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जरूरी नही तुम नद हमी से मिलो
पर सोच समझ के किसी से मिलो
जिस को दूरियों की कद्र हो
नजदीक से भी उसी से मिलो
अंधेरे की कदर हो जाएगी तुम्हे
फुर्सत में कभी रोशनी से मिलो
वजूद ना खो दो समंदर से मिलके
नदी हो तो बस नदी से मिलो
बराबरी में कद नापेंगे हम , पहले
आसमाँ से उतर के जमीं से मिलो
अतीत से फिर कभी मिलाएंगे तुम्हे
खेर अभी सार की शायरी से मिलो
*~गौरव गर्गसार*
*~गौरव गर्गसार*
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