Wednesday, April 15, 2020

कविता


---लॉक डाउन ...


 जब से खुद ने मांजे बर्तन बर्तन हुएं चमकीले ऐसा लगता है


जैसे मैंने कल ही नए खरीदे कर रही हूं

जो अब मैंने खुद ही झाड़ू पोछा घर मेंरा चमक रहा दमके जैसे हीरा जो काम भी भूल रही थी

 धीरे धीरे करती आज देखा तो महीने भर में आ गईं मुझमें वापस फुर्ती भला हुआ ये

लॉक डाउन ने हमको कुछ तो सिखाया बाइयों पर हम निर्भर हो गए थे

हम तो पूरे पूरे बिन उनके काम नही चलता था आज समझ में आया काम अगर करतें रहते

तो कभी कष्ट ना होता कितना ही काम पड़े वो सब खुद से होता घर में रहने लगें अब हम लोग सारें।

*मंगला श्रीवास्तव इंदौर स्वरचित 

No comments:

Post a Comment

Featured Post

हिंदी पखवाड़े पर इंदौर संघ लेखिकाओ के पसंदीदा पुस्तकों पर विचार

एक सच्चा रिश्ता एक अच्छी किताब की तराहा होता है,  कितनी भी पुरानी हो जाए, फिर भी शब्द नहीं बदलते, रास्ते बहुत मिलेंगे भटकाने के लिए, लेकिन स...