*हनुमाना जयंती पर विशेष-*
बात उन दिनों की है, जब गर्मियों की छुट्टी में माँ हमको व्यस्त रखने के अलावा धर्म और
संस्कार की शिक्षा भी देना चाहतीं थीं ।
चूंकि छुट्टियों में हम बच्चे सुबह देर से सोकर उठते और बहुत आराम तलब हो जाते ।इसलिए माँ ने एक युक्ति अपनाई -
रोज सुबह दस बजे सुन्दर काण्ड का पाठ शुरू किया और सबको स्नान करके उपस्थित रहने की शर्त रख दी।
एक दो दिन तो हमने आनाकानी की पर माँ के मुख से सुंदर काण्ड के सस्वर मधुर पाठ ने रुचि बढ़ा दी, यूँ भी हनुमान
जी के अशोक वाटिका वाले करतब बड़े लुभावन हैं । बस क्या था हम चारों बहनें भी दस बजे नहा धोकर तैयार हो कर
पाठ में शामिल होने लगीं । एक घंटे तक पाठ चलता । दो महीने की छुट्टी में रोज सुन्दर काण्ड करने से एक तो घर का
वातावरण बहुत सात्विक हो गया दूसरा, हम सबको सुन्दर काण्ड कंठस्थ हो गया । तीसरा और महत्वपूर्ण उद्देश्य , हम
बच्चों ने समय का सदुपयोग और नियोजन सीख लिया । 11 बजे पाठ समाप्त होने के बाद एक घंटे में भोजन तैयार हो
जाता, और 12 बजे सब एक साथ भोजन करने बैठते , जिसका अपना अलग मजा था। सुन्दर काण्ड पाठ के दौरान
रोज एक आश्चर्यजनक बात होती थी, हमारे देव स्थान के पास खुला आंगन था ज्यों ही पाठ शुरू करने की तैयारी पूरी
होती, एक काला कुत्ता खिड़की के पास आकर बैठ जाता और एक घंटे, जब तक पाठ चलता वह वहीं बैठा रहता आरती
होने के बाद चुपचाप चला जाता। ऐसा सतत दो महीने तक चला । पता नहीं किस रूप में आकर वह रोज पाठ सुनने
चला आता था । हमें भी ऐसा लगा जैसे हनुमान जी का पाठ करना सार्थक हुआ । शायद हनुमान जी के नाम श्रवण से
उस उस मूक प्राणी श्वान के भी रोग और पीड़ा दूर हो गए हों । क्योंकि *नासे रोग हरैं सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत
बीरा ।।*
*वंदना दुबे
संस्कार की शिक्षा भी देना चाहतीं थीं ।
चूंकि छुट्टियों में हम बच्चे सुबह देर से सोकर उठते और बहुत आराम तलब हो जाते ।इसलिए माँ ने एक युक्ति अपनाई -
रोज सुबह दस बजे सुन्दर काण्ड का पाठ शुरू किया और सबको स्नान करके उपस्थित रहने की शर्त रख दी।
एक दो दिन तो हमने आनाकानी की पर माँ के मुख से सुंदर काण्ड के सस्वर मधुर पाठ ने रुचि बढ़ा दी, यूँ भी हनुमान
जी के अशोक वाटिका वाले करतब बड़े लुभावन हैं । बस क्या था हम चारों बहनें भी दस बजे नहा धोकर तैयार हो कर
पाठ में शामिल होने लगीं । एक घंटे तक पाठ चलता । दो महीने की छुट्टी में रोज सुन्दर काण्ड करने से एक तो घर का
वातावरण बहुत सात्विक हो गया दूसरा, हम सबको सुन्दर काण्ड कंठस्थ हो गया । तीसरा और महत्वपूर्ण उद्देश्य , हम
बच्चों ने समय का सदुपयोग और नियोजन सीख लिया । 11 बजे पाठ समाप्त होने के बाद एक घंटे में भोजन तैयार हो
जाता, और 12 बजे सब एक साथ भोजन करने बैठते , जिसका अपना अलग मजा था। सुन्दर काण्ड पाठ के दौरान
रोज एक आश्चर्यजनक बात होती थी, हमारे देव स्थान के पास खुला आंगन था ज्यों ही पाठ शुरू करने की तैयारी पूरी
होती, एक काला कुत्ता खिड़की के पास आकर बैठ जाता और एक घंटे, जब तक पाठ चलता वह वहीं बैठा रहता आरती
होने के बाद चुपचाप चला जाता। ऐसा सतत दो महीने तक चला । पता नहीं किस रूप में आकर वह रोज पाठ सुनने
चला आता था । हमें भी ऐसा लगा जैसे हनुमान जी का पाठ करना सार्थक हुआ । शायद हनुमान जी के नाम श्रवण से
उस उस मूक प्राणी श्वान के भी रोग और पीड़ा दूर हो गए हों । क्योंकि *नासे रोग हरैं सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत
बीरा ।।*
*वंदना दुबे

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