Friday, May 1, 2020

मजदूर दिवस पर संकालपी सदस्यो की अभिव्यक्तिया


मजदूर  दिवस  पर  शुभसंकल्प  समूह  के सदस्यो के सुन्दर  अभिव्यक्तिया  तथा  दिल को लेकर  मन  को छूती चंद पंक्तिया

श्र बिन्दु श्रमित न होने पाए श्रमिक है
 सरताज श्रम का सुनो वक्त के सृजन
 हार सुनो श्रेष्ठ श्रमिकों का श्रेयस्काम ही! *




लता प्रासर*
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मै हूं तेरे बिना कुछ नहीं हूं मै, तेरे पसीने की कर्जदार हूं मैं ।

क्या लौटा पाऊंगा तेरी वफादारी का कीमत, कभी कर पाऊंगा तेरे भूखे नंगे बच्चो पर रहमत।

नहीं हूं काबिल तुझ से आंख मिलाने के डर है मुझे मुझे मेरे हाथ खाली रह जाने के।
छोड़ दिया अब तुझे सड़क पे मरने को, कुछ बचा नहीं तेरे पास पेट भरने को।
 खुदगर्ज इंसान हूं यह फितरत है मेरी,
तेरे पसीने का खाकर तुझ से उलझने की ताकत है मेरी।
 बख्श दे प्राण दाता तेरे रहमों कर्म पर ,
 जिंदा हूं इठलाता हूं अपने गुमान पर।

 मित्रा शर्मा महू
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*शीर्षक-"मजदूर की व्यथा"*

 मैंने झांका और देखा, अथाह गहराई में था जल, कितनी कठिनाई होती है उनको, जिन्होंने खोदा है
यह भूतल, हां ये वही मजदूर हैं साहेब, जिन्होंने हमारे लिए कुआं बनाया, तालाब,सड़के, नहरें, इमारत बनाई,
और बनाएं अनगिनत पुल, कितनी कठिनाई होती है उनको, जिन्होंने जोड़े हैं ये पुल,
 काश कभी कोई उनके हृदय में झांके, दो रोटी से ज्यादा उनकी कीमत आंके,
नहीं होता मजदूर के बिना कोई श्रृजन, पीड़ा उनकी देख हो जाती हूं भाव विहृल,
 आओ उनका सम्मान करें, शब्द पुष्पांजलि अर्पण करें, अपने स्नेह से सराबोर करें,
उनकी आंखों में है अश्रु रूपी जल, कितनी कठिनाई होती है उनको, जिन्होंने खोदा है
यह भूतल, मैंने झांका और देखा, अथाह गहराई में था जल । 




हेमलता शर्मा भोली बैन
इंदौर मध्य प्रदेश
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पसीने की दो बुंद गिराकर देख।
इस भरी दोपहरी मे कुछ उठाकर देख। चल दो कदम पैरो से अपने।

 फिर पता चलेगा, नयाकर के देख।
आज मत मुझे तुम मजदूर कहो। मै श्रमिक हूं, और श्रम करता हू। दो सूखी रोटी खाकर दिनरात रहता हू।
और इस जमाने के सारे काज करता हू।
क्या तुम मेरा एक दिन मनाओगे। आज याद करके कल भूल जाओगे। पर मै तो वही सुबह से शाम तलक।
इस गर्मी की.भीषण तफन मे।
यू.ही हाथ पांव चलाता रहुंगा। तुम्हे खुशिया मिले इसलिए तडफता रहुंगा। मकान तुम्हारा बने, मै नींव खोदता हू।
 बाना तुम्हारा निकले, सर पर बोझ ढोता हू। सामान पहुचाने मे हम्माली भी करता हू। और जहां जो जरूरत होती वहा, मिलो मे भी पहुंचता हू। कहा कहां नही हूं मै। मुझे कम ना आकनां।
केवल ऐक दिन यहां काम करने झांकना। देखना किस कदर मै शरीर से काम करता हू। बडे बडे पत्थर पहाड कैसे मै खोदता हू। अरे तुम क्या मानोगे मुझे, तुम तो ठहरे निकम्मे। घर का खूद के तन का भी काम हमसे करवाते हो। और बडे बडे सोफो पर पसरकर बैठ जाते हो। हम गरीब असहाय मजदूर ताकत इतनी रखते है। यदि एक दिन हम बैठ जाए, दूनिया हिला सकते है। पर हम मासुम प्राणी, मेहनत की रोटी खाते है। इसलिए चाहे जैसे पुकारो हम सब सह लेते है।

 श्रीमती ममतावैरागी तिरला धार
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मजदूर रवि की किरणें जब धरती को अलसुबह रोशन करतीं हैं,
हाथों में मेहनतकश मजदूरों के ताकत वो भरती हैं।
 एक पोटली में रोटी ,प्याज , अचार की खुशबू ले कर, चल पड़ते हैं ,पेट पालने, कठिन जिंदगी की राहों पर।
मजदूरी की खातिर दिन भर मथ देते हैं तन मन अपना , हर बूंद पसीने की दिखलाती ,
सुखद कल का मानों सपना। इनकी मेहनत से हम अपना जीवन सुखद बनाते हैं।
 मजदूरों की मेहनत से हम सपने अपने सजाते हैं। श्रम के बदले चंद सिक्के ,
पाकर भी जो खुश हो जाते, हमें जीवन की खुशियां देकर , ईश्वर सा हैं रूप दिखाते।


 अचला गुप्ता इंदौर

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कविता
मजदूर

लिए दर्द आँखों मे पूछा उसने मुझसे यू
क्युँ होता है हमेशा हमारे साथ ही एसा
क्यो हमसे ही रूठा रहता है नसीब
सच सुख अमीरों के घर मे रहता हैं
क्या हुआ बाल मजदूर हु तो
मन मेरा भी करता है पढु खेलु
 पर बद नसीब हू ना मेरी हालत
रब मिले तो पूछुंगा एसी क्या भुल हुई
क्या कसूर हैं मेरा कि तुने गरीब के यहां पैदा किया
मेरे हम उम्र बच्चों को देख कर रो देता हू
वो सब स्कूल जाते और मे मजदूरी करने
साँस मिलते ही भुख  चली आती हैं
मौत वीराम न दे तब तक भुख नहीं जाती है
पेट की आग ही एसी है की बीना मजदूरी करे बुझती नही
मेरे मालिक तेरी दी हुई जिन्दगी को सलाम
उसे ही सवाल करूंगा  मे एक बाल मजदूर क्यों


चारूमित्रा नागर

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श्रमिक मन विचलित हो या हो तन शिथिल, पैरों में फटी हो बिवाइयाँ,
चाहे शरीर पर हो फटी कमीज, जिंदगी में हो लाख विषमताएँ, मैं चुपचाप सब सहता हूँ,
 मैं आम नागरिक हूँ, मैं इस देश का श्रमिक हूँ। परिवार के पोषण के लिए,
दो जून के भोजन के लिए, मीलों पैदल चलता हूँ, अपने सारे दर्द छिपाकर रखता हूँ, किसी से कुछ नहीं कहता हूँ,
 मैं आम नागरिक हूँ, मैं इस देश का श्रमिक हूँ। क्या सोचूँ ज़माने की बातें, मेरी तो जिंदगी कट गई, बस पेट की आग बुझाने में, मैं आम नागरिक हूँ, मैं इस देश का श्रमिक हूँ।
मैं अविरत श्रमरत रहता हूँ, पथिकों को घर पहुँचाता हँू, ऊँची इमारतें बनाता हूँ, नए-नए रूप गढ़ता हूँ,
 श्रमबिंदु बहाते रहता हूँ, मैं आम नागरिक हूँ, मैं इस देश का श्रमिक हूँ।
अपने कार्य से संतुष्ट हूँ, दूसरों के काम आना, सुविधारहित रह औरों की, सुविधाओं हेतु काम करता हूँ,
 मैं आम नागरिक हूँ, मैं इस देश का श्रमिक हूँ। -

सीमा रानी मिश्रा, हरियाणापरभक्षी

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स्वरचित मजदूर हूँ मजबूर नही मेहनत की रोजी से अपना घर चलाता हूँ,
पसीना रोज बहाकर मुस्कान खरीद लाता हूँ।
 ऊँची ऊँची इमारतों के मजबूत बीम बनाता हूँ, पढ़े लिखो की दुनिया को रोज एक पाठ सिखाता हूँ।
 मेहनत ही है जो बेरंग सपनो में रंग भरती हैं,
तुम्हारे महलो की रोशनी से मेरी झोपडी चमकती है।
 कहाँ है वो सुख पकवानों में जो मेरे रूखे सूखे खानों में,
दौलत बेशक तुमने कमाई पर सुकून मेरे खजाने में।
 हर वक़्त तैयार ही रहता मजदूर हूँ मगरूर नही,
 मेरी शराफत कम न आँकना मजदूर हूँ मैं मजबूर नही।

 कविता सक्सेना शुजालपुर

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जरूरत मजदूर मत कहो हमें दुनिया वालों हम तो दुनिया के राजा महाराजा हैं विश्वास नहीं है
हमारी बात पर तो हमारा वर्चस्व आजमां के देख लो एक इमारत स्वयं बना कर देख लो।
 हम ना होते तो तुम कहां पर रहते ये बता दो फिर तुम क्या करते तुम्हारे जीवन की सारी रौनक हमसे भतुम्हारी ये सारी बादशाहत है हमसे।
 हम ना होते तो फिर क्या खाते तुम क्या स्वयं खेत की फसलें काटते तुम क्या कंधे पर बोरियां ढो कर स्वयं पहुंचाते अपने घर में स्वयम् बोरियां को ढो लेते।
 हमसे ही तुम्हारी जीवन यात्रा सफल है हमसे ही तुम्हारे सारे नाज ॒नखरे हैं हर कदम पर है
 तुम्हें हमारी जरूरत हमसे ही है तुम्हारी सारी शान ॒शौकत।
क्या स्वयं वस्त्र और गहने बना लेते हम पसीना बहाते तो तुम आराम पाते हमारे बिना तुम हो जाओगे मजबूर इसलिए हमें नहीं कहना कभी मजदूर।
समझो सको तो समझो कीमत हमारी हमारे बिना भूल जाओगे शेखियां
 सारी तुमहारे लिए सेवा में हमेशा तैयार रहते तुम्हारा सारा साजो-सामान घर पहुंचाते।

 नीति अग्निहोत्री


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अपमान नहीं अपनत्व दो हमको घर देने वाले ये ,
झोपडियो में ही रहते है ।
पहचान नहीं इनकी अपनी, मजदूर श्रमिक सब कहते हैं मेहनत ही इनका जीवन है ,
 मजदूरी कर जो पाते हैं ।
सन्तुष्ट उसी में रहते हैं, जो रूखा सूखा खाते हैं ।।
 सम्मान की इनको भूख नहीं, श्रम की पूजा यह करते हैं ।
अपमान नहीं अपनापन दो, मजदूर हम सब से कहते हैं ।।

 श्रीमती शारदा मिश्रा

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मज़दूर दिवस पर कविता मैं मजदूरन

🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨🔨 मैं महिला मज़दूर हाथ में हथौड़ा पीठ पर संतान मज़दूरी पत्थर फोड़ना बसी
 बच्चे में जान शिशु परवरिश के लिये करती हूँ
श्रमदान मैं मज़दूर बहुत सुखी चाहे तुम कितने धनवान यही हथौड़ा
लोरी बनता यही कभी संगीत सा बजता यही हवा काझौंका बनता बहा
पसीना ठंडक बनता नहीं चाहिये तड़क भड़क कोई बिल्डिंग कोई सडक गर
बिन मज़दूर गई अटक तुम भी नहीं कमा पाओगे अर्थ बिना जीवन निरर्थक शाम को
जब मज़दूरी पाती माँ की आत्मा शीतल होती ये मज़दूरी धर्म बना फिर
 इसको सीखा कर्म बनाकर करते जाना लक्ष्य साधकर श्रम का दान करूँ निरंतर नहीं शरम नहीं झिझक


 कुसुम सोगानी


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"ॐ"
 हाइकु मजदूर पोछ पसीना गमछा उठाकर नित्य चलता। ***
हाथ फावड़ा चिलचिलाती धूप ना ठहरता। ***
कम मजूरी दिल से हँसी,खुशी सलाम देता। ***
चूल्हा जलता फिर आशा लेकर सूर्य जगाता। ***
पेट की भूख विश्वास की कुल्हाड़ी आगे बढ़ता। **
* परिश्रम का बोझ उठा के मिलो तन्हा चलता। **
* देश उसी से प्रगति की दिशाओं आगे बढ़ता।
*** फिर भी वह हीनता की भावना शिकार होता।
*** जागो जनता दिवस मनाकर क्या हो जाता। *** सम्मान करों जीवन भर उनका जीवन देता।
 देश के सभी सम्मानीय मजदूरों की समर्पित ।
"तुम वह दीपक हो.. जो ना जले...तो देश ना चले."

 वन्दना पुणतांबेकर इंदौर

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विषय ।
 मजदूर दिवस ।
विधा कविता ।
 भरी धूप बारिश हो चाहे , वो प्रातः उठ कर जाते है ।
नव निर्माण कराते है । वो कर्मठ श्रृमिक कहाते है ।
पर्वत और पहाडों में , गर्जन और दहाडों में , मरूस्थल और मैदानों में भूतल को स्वर्ग बनाते हैं ,
 वो मजदूर कहाते है ।
खंदक खाई खाड़ी में छोटी मोटी झाड़ी में , दिल की धड़कन नाड़ी में जगमग ज्योति जलाते है ।
 वो मजदूर कहाते हैं ।
उधोगों उधानों में ,खेतों , और खलिहानों में नहरें , नदियों नालों में ,ऊँचे नीचे , ढालों में , फसलों को लहरातें है , वो कर्मठ मजदूर कहाते है ।
धन्य धन्य उनका जो जीवन , हम को सुख पहुचाते है ।


 मनोरमा जोशी


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*जो ज़िन्दगी ढो ले गया....

* *बस वही मजदूर है....* *जो जी गया ज़िन्दगी भरपूर...

* *बस बाकी उसी का नूर है !* *-

 संजय राष्ट्रवादी*


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पेट में आग की लपटें उठने लगी ज़िस्म झुलसाने को गर्मी ही बहुत थी


पेट में आग की लपटें उठने लगी ज़िस्म झुलसाने को गर्मी ही बहुत थी


जितेन्द्र  शिवहरे

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*फर्याद..
* विधा :
कविता
 करे फर्याद हम किस से, सभी तो एक जैसे है।
जब रक्षक बन जाये भक्षक, तो फिर किस से करे फर्याद।
 कितना कुछ बदल दिया, हुए जबसे हम होशियार। की पहले तरह वो आत्मीयता, नही बची अब घरों में।।
 सब के सब लूटने को, बैठे है तैयार यहां पर। नियत ऐसी हो रही, हमारे समाज की लोगों।
फिर किस से आत्मीयता की, रखे उम्मीदे अब हम सब।
ऐसे माहौल में क्या गाँव, और शहर बच पायेगा।।
 कलयुग में सतयुग की उम्मीदे, हमें रखना बेकार सी लगती है।
जहाँ बेटा बेटी भी साथ, छोड़ देते है माँबाप का। कितना कुछ बदल गया है, इस कलयुगी समाज का।
अब तुम ही बताओ कि, करे किस से फर्याद हम।
की बदल जाये हमारी सोच।। जय जिनेन्द्र देव की

संजय जैन (मुंबई )


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मजदूर ,मैं वो,जो नही रहता कर्मो से दूर मैं मजदूर,मैं जो,मेहनत से नही भागता दूर।
 मैं मज़दूर,मैं जो ,दुपहरिया हो बारिश मुश्किल को दूर रख जुट जाता ,करता परवरिश।
 मैं मज़दूर,मैं जो रूखी सुखी खाकर,तृप्त रहता कर्मो का पसीना बहाने पर,,। ,
मैं मज़दूर,मैं जो सन्तोषी नर सदा सुखी,हंसते गाते धुन का पक्का,कर देता चुटकियों में काम तमाम,,।
 मैं मज़दूर,मैं जो न डरता न घबराता,मेहनत की रोटी खाता मैं मजदूर,मैं जो क्यों डरूँ किसीसे,मेहनत करने से नही घबराता,,,। मैं मज़दूर,मैं जो प्यारा लगता,घर परिवार मुझे भी चाहे हो या दुख सुख।
मैं मज़दूर,मैं भी तो चाहता अपना प्यारा देश,,।
मैं मज़दूर ,मैं जो नही भाव रखता काम चोरी का,न गद्दारी का,,, मैं मज़दूर,मैं जो सिर्फ काम का नशा चाहता,और चाहूं सिर्फ स्वस्थता,, मैं मज़दूर ,मैं जो चाहूं सिर्फ दो जून की रोटी,और मेरे प्यारे बच्चों का भविष्य मैं मज़दूर,मैं जो न पढा तो क्या?बनाऊंगा बच्चे को इजनेर डाक्टर,,,। मैं मज़दूर,मैं जो चाहूँ, बस मेरी मिट्टी की सेवा और खुशाली वतन की मैं मज़दूर,मैं जो अर्पण करदूँ सारा जीवन और मेहनत से शीश उठाये रखु,जान से प्यारे वतन भारत की



प्रभा जैन


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कविता शीर्षक -- मेहनतकश मजदूर

 भोर की सुनहरी किरणें जब मुस्काती है मेरे जीवन में एक नया जोश भरलाती है।
 हाँ मैं मेहनतकश मजदूर हूँ ।
 हर पल हर मौसम में करता रहता काम मेरे जीवन मे नहीं है आराम हाँ मैं मेहनतकश मजदूर हूँ।
 श्रम ही जीवन ,श्रम ही मेरी शक्ति है बोझ उठाता, पत्थर तोड़ता चट्टानों को काटकर कुँआ खोदता फसलें काटता,ऊँची ईमारतो का मैं ही तो शिल्पकार हूँ ।
 मेहनत करके दो जून की रोटी पाता फटे पुराने चिथडो़ में भी खुश रहता खुशहाली सबके जीवन में लाता हाँ मैं मेहनतकश मजदूर हूँ।
 जीवन की कठिन परिस्थिति में भी आत्मविश्वास,आत्मबल से अदम्य साहस से भरपूर हर वेदना,मुश्किल से सह जाता हाँ मैं मेहनतकश मजदूर हूँ ।

 वन्दना अर्गल

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मजदूर मजदूर मजबूर है बहाकर पसीना करता है
 श्रम बनाता है महल सवा सवारता है खेत और खलियान बांधता है क्यारियां चलाता है
 हल जीवन की नियति है श्रम श्रममेव जयते है जीवन फिर भी अभाव में रहता है
मजदूर भागता है दौड़ता है हफ़ता है
परेशानी ही परेशानी में गुजार देता जीवन न खुशियो से सरोकार केवल गम ही है
उसके पास हमको देना होगा उसके हिस्से की खुसी उसके हिस्से का प्यार मर जाता है
 मजदुर बगैर कोई समाचार के न कोई सुर्खी न कोई प्रचार बस करता है श्रम मजदुर मजबूर

शिव कुमार दुबे इंदौर

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मजदूर ----------------

 हां मैं मजदूर हूं , हां मैं मजदूर हूं , समुद्र की छाती चीरकर, बांध बनाया, अपने हाथों से, सृष्टि का निर्माण किया, चट्टानों को काटकर ,राह बनाई, रेगिस्तान को ,हरा भरा किया , फिर भी आत्म सम्मान, से दूर हूं।
हां मैं मजदूर हूं, हां मैं मजदूर हूं ।
अन्न उगाता हूं धरती से ,पर भूखा रह जाता हूं, औरों के तन ढकता वस्त्रों से ,बिना कफन मर जाता हूं, पेट की आग बुझाने को, मैं मजबूर हूं, हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं।
 निर्धन का खून चूस चूस कर ,अपना घर ही भरते हैं , नागों जैसा फन फैलाए ,मजदूरों को डरते हैं, जिंदगी का बोझ कंधों पर उठाता हूं, हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं ।
जिनका वर्तमान गिरवी, भविष्य अंधकार है, धरा बिछौना छत आसमां, ना कोई बहार है, बोल ना पाता मालिक के आगे ,अपना सर झुकाता हूं, हां मैं मजदूर हूं ,हां मैं मजदूर हूं।


 श्रीमती शोभा रानी तिवारी



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*में मजदूर* राष्ट्र नींव के लिए अथक परिश्रम करते मजदूर भूख ,गरीबी से
 मजबूर बन जाते ये मजदूर मजदूर का जीवन है खानाबदोश होता
मजदूर के हिस्से में दुनिया भर की मेहनत अधिकारों का हनन और शोषण
उनकी हे ये नियति रात भर रहते बेचैन दूसरे दिन रोटी की फ़िक्र में सरों पर ओढ़कर कड़कड़ाती धूप की चादर
उनकी वजह से हम आलीशान घरों में सुकून से रहते वो जीवन
भर अपने लिए एक छोटे से घर को तरसते नवभारत निर्माण के सपने
 होगें उनसे ही पूर्ण मजदूर के सम्मान के लिए हम आज लें प्रण मजदूर भी हकदार के अच्छी जिंदगी जीने के लिए मजदूर की मदद करके बढ़ाएं उनका हौसला

पूनम शर्मा इंदौर

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पद्मश्री वाकणकर जी को श्रद्धांजलि कला गुरु ,पुरातत्व वेत्ता आपने कहे इतिहास स्वतः देश के चुनौती दे डाली इतिहास को तुम्हें प्रणाम। अपनी धरती के गर्भ से खोजें अनमोल रत्नपुरा के कला गुरु, पुरातत्व वेत्ता, तुम्हें प्रणाम। आपने खोजी मरुस्थल में विलुप्त वैदिक सलिला पुरातत्व वेत्ता तुम्हें प्रणाम। अपने निस्वार्थ बन जड़ता को कर दिया स्पंदित अपना सब कुछ दे डाला, खुद बन गए संग्रहालय, तुम्हें प्रणाम। आप पुरातत्व षृष्टि के विष्णु हो, श्रीधर के अनमोल रतन कला भवन के कला गुरु तुम्हें प्रणाम। आप भारतीय सभ्यता संस्कृति के, और इतिहास के कर्म योगी, भागीरथी हो पुरातत्व वेत्ता,कला गुरु तुम्हें प्रणाम। तुम्हारे मंथन से डॉ विष्णु भटनागर, सच्चिदा नागदेव, रमेश नानवानी, नारायण व्यास, विदुषी पूर्णिमा रेखा ऋषि भटनागर आदि अनेकानेक रत्नपुरा के निकले तुम्हें प्रणाम। आपने तो इतिहास रचा ही आपके शिष्यों ने भी इतिहास रच डाला, अभिनंदन ग्रंथ, को प्रकाशित कर व आपकी कलाकृतियों की पुस्तक प्रकाशित कर सबके समक्ष ला दी तुम्हें प्रणाम। यह लहरें तो हैं बहने को बह जाएंगे कई कई अनकही कहानियां कह जाएंगी ,जन्म शताब्दी वर्ष मना रहा सारा देश, विदेश जन्म जन्मांतर स्मृतियां शेष रह जाएंगीं स्मृतियां शेष रह जायेंगी।

डॉ रेखा भटनागर वाकणकर जी की शिष्या भोपाल मध्य प्रदेश


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मेहनतकश हाथों से घर की बुनियाद खुदी है खुशियों की ख़िलखिलाट से मंजु खिल उठी हैं ।
 डॉ मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई मेहनतकश हाथ श्रम के बल पर जहान का आशियाँ बनाती नींव में अपने दर्द की दास्तां छिपाती . मजबूरियों की आँच पर मौसमों को झेलकर कम आय से अपनी पेट की आग बुझाती
. साथ अगर उनका हमको न मिला होता तो तारीखदानों के ताज में नूर न बरसाती .
 मजदूर महिला देश की उन्नति के खातिर प्रसव के बाद भी कदम से कदम मिलाती .
 रोजी , रोटी के लिए करे शिशु संग काम ध्यान अपना न रखने से सेहत लड़खड़ाती .
 शोषण, अत्याचार की आग में ये न जले दो 'मंजु' मान जिंदगी इनकी चमकाती



 डॉ मंजु गुप्ता वाशी, नवी मुम्बई



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"बाल मज़दूर '' उसकी व्यथा वो ही जाने, रहता बड़ा मज़बूर है ।
मालिक की हाँ में हाँ बोले, वो एक बाल मज़दूर है । खेले - कूदे स्कूल जाये, उसका भी मन करता है ।
मित्रों संग पिकनिक मनाये, उसको अच्छा लगता है ।
पर नहीं भाग्य में ये सब उसके, लिखी ग़रीबी नसीब में जिसके ।
बच्चा होकर बचपन से वो लगता बहुत ही दूर है ।
मालिक की हाँ में हाँ बोले वो एक बाल मजदूर है ।
 माँ तो करती बहुत प्यार है, पर वो बड़ी मज़बूर है । भाग्य की मारी वो बेचारी वो भी इक मज़दूर है ।
झाड़ू,पोंछा, बर्तन करती कपड़े धोती , पानी भरती । चार घरों काम करके चूल्हे का इंतज़ाम है करती ।
ये कैसा जीवन है उसका ? हरदम ग़मों से चूर है । मालिक की हाँ में हाँ बोले, वो एक बाल मज़दूर है ।
शासन ने प्रतिबंध लगाये, बाल श्रम कानून बनाये । भ्रष्टाचारी के इस युग में, सुविधा उन तक पहुँच न पाये । ग़रीब से बढ़कर दुनियाँ में, कोई नहीं मज़बूर है , उसकी व्यथा वो ही जाने रहता बड़ा मज़बूर है । मालिक की हाँ में हाँ बोले वो एक बाल मज़दूर है । -----

 सुरेन्द्र सिंह राजपूत 'हमसफ़र' देवास मध्यप्रदेश


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कविता का शीर्षक है (मजदूर दिवस,)

 मजदूर के पसीने की एक बूंद भारत के भाल पर तिलक बन जाती है
भारत का ह्रदय पटेल इन श्रमिकों का आभारी है।
श्रमिकों ने पसीने से भूमि को सींचा और अपने दम पर हिंदुस्तान को जीता श्रमिक मेहनत मशक्कत करके अपने परिवार का निर्वाह करता है उनकी जरूरतों को पूरा करता है श्रम में ही शक्ति है परिश्रम ही भक्ति है।
🙂 फटे पुराने कपड़े मन में अरमान, ढंग की मिल जाए जो मजदूरी तो मिल जाए जहान।
 कोई भी तीज त्यौहार उनका खून सूखती है हालातों को देखकर मन में रुलाई फूट जाती है मित्रों मजदूर राष्ट्र की नीव का कार्य करते हैं हम बिना मजदूर के सशक्त राष्ट्र की कल्पना भी नहीं करते हैं ।
 मजदूर भाई हम सबके जीवन का संचार करते हैं आओ हम सब मिलकर इन का आगाज करते हैं।।।,

सुषमा शुक्ला इंदौर

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विषय : मजदूर दिवस .
 कितना कठिन है जीवन हमारा हर दिन करने को गुजारा।
कितने कितने धक्के है खाते तब दो वक्त की रोटी है पाते।
 तन पर ना मिलता है कपड़ा कैसे कैसे जीवन है चलता। कभी कठिन इतना समय भी आता कोई काम ना हमको मिल पाता। उस दिन बच्चें भूखे सोते खून के आँसू जब हम रोते कोई हमारी व्यथा न जाने कभी खाने के भी होते लाले।
 बिना हमारें काम नही चलता महल अटारी कुछ ना बनता जो ना हम पसीना बहाते चुन चुन कर जो ना ईंट उठाते।
 बड़े बड़े समान उठाना धूप में है पसीना बहाना बारिश हो या तूफान करते हम उस वक्त भी काम।
 रोज कमाना रोज है खाना जैसे तैसे जिंदगी चलाना बड़ी बेदर्द है जिंदगी हमारी इसको ही कहते लाचारी।
 एक दिन भी कर ले आराम चूल्हा ना जले उस दिन शाम जो भी हम पड़े बीमार घर हमारा हो जायें परेशान।

 मंगला श्रीवास्तव इंदौर स्वरचित


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*मजदूर दिवस पर*
 मेरे काव्य संग्रह प्रकृति और आधुनिक मानव से *विधा-कविता*
 *शीर्षक-मजदूर के पैर फिर जलने लगे*
 दिनकर का उदय भोर के साथ चिड़यों की चहक, मुर्गे की बांग, चक्षु खुले मजदूर के और व्याकुल हो उठे हाथ। मरीच की औज ने भरा जोश, वातावरण मचल उठा, परिवेश हुआ मदहोश। रजनी की दूर हुई नमीं, सौंधी-सौधी मिट्टी की महक सी थमीं, और किरण-पुंजों ने पिलाई गर्मी पेड़-पौधे पत्ते तब समीर संग हिलने लगे। जमीं पर बिखरी छटा, नमीं से अंधेरा हटा पवन और रोशनी दवा सी लगी, धरा से अंकुर फूटने लगे। मजदूरों ने छेड़ी तान, बाल-बूढ़े, युवा-जवान, ले साथ अपना जीवन अपने उर नंगे पैर सब चलने लगे। तन से स्वेदज से बहने लगी धार, बदन को चीर निकली बयार, काया को छेड़ भूमि पर ऐसे पड़े जैसे नगराज पर हिम मोती से पिघलने लगे। दीनता की आग से चक्षु क्षुधा मिटती नहीं, फिर हताहत हुई तरुणाई कलेवर हुआ छत-विक्षत, तकदीर में कंगाली, पीने को पसीना, उदर की आंते सब जल जैसे उबलने लगे। तपिस का दौर मद्यम हुआ और किरण ताने ठंडी हवा, राहत की श्वास मिली, संग सहचर-सखा गली-गली, कुटिया में रात बिताने, मजदूर वापिस तब चलने लगे। दवा की कमीं महसूस हुई, हाथ पैर में पड़े छाले, हाथ-पैसा-रुपया-कौड़ी नहीं, किश्मत के मकान पर पड़े ताले, पड़ें ठंडे पैर जैसे ही वसुंधरा पर, *मजदूर के पैर फिर जलने लगे।* *मजदूर के पैर फिर जलने लगे।*

 राजेश कुमार लखेरा, जबलपुर



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विधा-घनाक्षरी विषय-संकल्प लेकर संकल्प चले,
सपने आंखों में पले, आशाओं के दीप जले, हम जीत जाएंगे।
 धरती अंबर मिले, क्षितिज की ओर चले, सीपियो से मोती मिले, क्षीर थाह पाएंगे।
 पर्वतो को लांघकर, नभ में उड़ान भर,
 संकल्प ये ठानकर, नव ऊर्जा चाहिए।


 ममता कानुनगो इंदौर


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मजदूर दिवस 1 मई *
(एक कहानी रोज़-17)* *
मजबूर मजदूर मजबूत*
 *चौदहवीं* मंजिल पर निर्माण संबंधी कार्य प्रगति पर था। लालसिंह शहर में पहली बार आकर मजदूरी कर रहा था। बालु रेत का ढेर लगाकर वह उसमें सिमेंट मिलाने लगा। उसे पास ही के निर्माणाधीन बाथरूम में स्त्री-पुरूष की समान मात्रा में विभिन्न प्रकार की आवाज़े आ रही थी। लालसिंह से रहा नहीं गया। वह बाथरूम के निकट गया और दुर से ही वहां झांकने लगा। भवन निर्माण ठेकेदार और एक मजदूर स्त्री वहां प्रेम प्रसंग में संलग्न थे। लालसिंह को झांकता हुआ देखकर दोनों असहज हो गये। यह वहीं भवन निर्माण ठेकेदार अर्जुन था जो सुबह-सुबह लालसिंह को मजदूर चौक से यहां मजदुरी कराये जाने के उद्देश्य से लेकर आया था। पुरे तीन दिन बाद लालसिंह को आज काम मिला था। वह भी तब जब मजदूर चौक पर काम की तलाश में खड़े एक अन्य मजदूर जीवन ने लालसिंह को समझाया कि इस शहर में अगर मजदूर चौक से प्रतिदिन काम चाहिए तो उसे पहले साईं सेवा मजदुर समिति के कार्यालय  जाकर वहां अपना पंजीयन करवाना होगा। पंजीयन करवाने के उपरांत मजदूर समिति का शुल्क जमा करने के बाद ही उसे काम पर भेजा जायेगा। इतना ही नहीं चौक से काम मिलने पर उसे मजदूरी में मिलने वाली दैनिक वेतन धनराशी का पच्चीस प्रतिशत मजदूर समिति के यहां नियम से जमा करना होगा। सुरक्षा की दृष्टि से मजदूर चाहने वाले ठेकेदार और अन्य लोग समिति के यहां पंजीकृत मजदूर को ही अपने साथ ले जाते है। क्योंकि कुछ अनहोनी घटना घटित होने पर समिति इसकी जवाबदेही सुनिश्चित करती है। अन्य मजदूर भी ऐसा ही करते है यह सोचकर लालसिंह ने साईं सेवा मजदूर समिति में अपना नाम, पता आदि लिखवा दिया। उसने वहां पांच सौ रूपये शुल्क भी जमा करवा दिये। वह गांव से जितने रूपये लाया था, सभी खत्म हो चूके थे। अब उसे काम की नितांत आवश्यकता थी वर्ना भूखो मरने की नौबत आने वाली थी। भवन निर्माण ठेकेदार अर्जुन और महिला मजदूर कजरी के संबंध के विषय में वह सोच ही रहा था की भोजनावकाश की घण्टी बज गई। सभी मजदूर इकठ्ठा होकर भोजन करने बैठ गए। कजरी भी अन्य महिला मजदूरों के साथ भोजन कर रही थी। वह लालसिंह से नज़र नहीं मिला पा रही थी। कजरी को डर था कि अभी नया-नया काम पर आया मजदूर लालसिंह कहीं अन्य मजदूरों के सम्मुख उसकी पोल न खोल दे! भोजनावकाश समाप्त हो कर निर्माण कार्य पुनः आरंभ हो गया। मशीनों के शोर में मजदूरों की बातें साइलेन्ट मंचीय अभिनय जैसी प्रतित हो रही थी। कजरी ने लालसिंह का हाथ पकड़ा और उसे एकांत में ले जाकर कहा-- "देख! तुने जो भी देखा है न! यदि किसी को बताया तो समझ ले तेरा यहां से पत्ता साफ। समझा।" आकस्मिक आक्रमण से लालसिंह कुछ घबरा गया।  "बोल किसी से कहेगा तो नहीं?" कजरी ने पुनः दोहराया। "नहीं मैं किसी से नहीं कहूंगा।" लालसिंह सम्भलकर बोला। "शाबास! तुने जो देखा, उसे तुरंत भूल जा।" कजरी बोली। "ठीक है।" गोपाल ने विनम्रता से कहा। "अच्छा चल जा! अपना काम पुरा कर!" कजरी ने रौबदार आवाज में लालसिंह को निर्देश दिया। अर्जुन ठेकेदार की कजरी पर विशेष कृपा थी, लालसिंह यह जान चूका था। सो पानी में रहकर मगरमच्छ से कौन बैर करे? यह विचारकर वह भी अन्य मजदूरों के समान सबकुछ जानकर भी अनजान बनने का ढोंग करने लगा। पहले दिन की मजदुरी के बदले उसे तीन सौ रूपये मिले। पिच्चतहर रूपये उसे मजदूर समिति में कमीशन के रूप में जमा करने पड़े। अगले दिन काम पर जाने के लिए यह कमीशन जमा करना बहुत ही आवश्यक था। लालसिंह ने भाड़े पर एक कमरा लिया। स्वयं खाना पकाया और खाने लगा। लालसिंह की यह अब नियमित दिनचर्या हो गई। एक शाम काम से मजदूरों की छुट्टी होने में कुछ विलंब हो चुका था। अर्जुन ठेकेदार ने सुबह ही सभी मजदूरों को कह दिया था की आज चौदहवीं मंजिल की छत भराई जाना है, सो सभी मजदूर विलंब से घर जायेगें। विलंब का सभी मजदूरों को सौ-सौ रूपये अतिरिक्त मेहनताना दिया जायेगा। रात के आठ बज चुके थे। छत भराई जाने का काम अन्तिम चरण में था। लालसिंह वहीं मजदूरों के निवास के लिए बनाई गई अस्थायी झोपड़ी में पानी पीने के उद्देश्य से गया। पास ही की एक अन्य झोपड़ी में कजरी और अर्जुन ठेकेदार के बीच किसी विषय को लेकर बहस चल रही थी। लालसिंह ने पानी पीया और पास ही की अन्य झोपड़ी में झाँककर देखने का प्रयास किया, जहां कजरी और अर्जुन ठेकेदार बहस कर रहे थे। अर्जुन ठेकेदार क्रोधित था। अर्जुन ने कजरी को गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया और गुस्से में वहां से बाहर निकल गया। लालसिंह का दुर्भाग्य था कि कजरी ने उसे पुनः देख लिया। लालसिंह को यकीन हो गया की अब उसका दाना-पानी यहां से निश्चित ही बंद हो जायेगा। क्योंकि यदि कजरी उसकी शिकायत अर्जुन ठेकेदार से कर देगी तब अवश्य ही वह लालसिंह को काम से बाहर निकाल देगा। कजरी ने लालसिंह की शिकायत नहीं की। अपितु उसके लिए वहीं निर्माण स्थल पर ठहरने की व्यवस्था उपहार स्वरुप कर दी। ताकी उसका मासिक मकान भाड़ा भी बचे और उसे मजदुरी का कमीशन भी नहीं देना पड़े। कजरी की कृपा पर लालसिंह कृतार्थ तो था मगर अब भी वह अर्जुन ठेकेदार और कजरी के संबंध को समझ नहीं पा रहा था। उसे यह तो अवश्य पता था विवाहित पुरूष ही अपनी पत्नी पर संपूर्ण अधिकार रखता है। स्वयं पत्नी भी अपने पति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मार-पीट या स्नेह को सहन नहीं कर सकती। तब क्या अर्जुन ठेकेदार, कजरी का पति है? कजरी नव युवती होकर सिंदूर से मांग भरती है और गले में मंगलसूत्र भी धारण किये हुए है। मगर लालसिंह को कजरी का पति अब तक दिखाई नहीं दिया। उसे यह अफवाह भी सुनने को मिली थी कि कजरी के पति ने कजरी का परित्याग कर दिया है। वह खण्डवा जिले में रहता है। कजरी अपनी चारों बहनों में सबसे बड़ी है। अन्य तीनों बहन नाबालिग किशोरी है। उसका आठ वर्ष का एक भाई भी है। पिता शराबी और मां परिवार के भोजनादि की व्यवस्था और बच्चों की परवरिश में तल्लीन रहकर अक्सर बीमार रहती है। कजरी ने अपनी मां की मजदुरी दबाव लेकर छुड़वा दी। ताकी वह पुरी तरह स्वस्थ हो सके। कजरी ही उसे दवाखाने लेकर जाती थी। पिता सुरेश को शराब के आगे कुछ याद नहीं रहता। कजरी न होती तो उसकी मां राधा कब की स्वर्ग सिधार जाती और भाई-बहन फुटपाथ पर भीख मांगते हुये नज़र आते। मगर इसे कजरी की दृढ़ इच्छाशक्ति ही कहेंगे कि वह संपूर्ण परिवार को एकता के धागे में पिरोकर उनके भरण-पोषण का दायित्व बहुत अच्छे से निभा रही थी। अमावस्या की छुट्टी पर लालसिंह और कजरी राशन आदि खरिदने बाजार की ओर निकल पड़े। पैदल-पैदल कुछ दुरी तक चले होगें की लालसिंह ने अपने ह्रदय में उठते अनगिनत सवाल कजरी से एक-एक कर पुछ ही लिये। लालसिंह को कजरी ज्यादा समय तक अंधेरे में नहीं रखना चाहती थी। कजरी ने स्वयं से संबंधित रहस्योद्घाटन लालसिंह के सम्मुख किये- "लालसिंह! मैं विवाहित नहीं हुं।" "फिर ये मांग में सिन्दूर और ये मंगलसूत्र क्यों पहन रखा है?" लालसिंह ने आश्चर्य से पुछा। "ये सब मेरे रक्षा कवच है लालसिंह! ये इन्हीं की शक्ति है जिसके कारण मैं इतने सालों से इंदौर में सुरक्षित हूं।" कजरी ने बताया। "लेकिन•••" लालसिंह बोलते-बोलते रूक गया। "जानती हूं कि तुम अर्जुन ठेकेदार के विषय में जानना चाहते हो? अर्जुन और मेरा रिश्ता वैध नहीं है। वह एक शादी-शुदा और बाल बच्चेदार आदमी है।" कजरी ने सड़क किनारे फुटपाथ पर रखी सिमेन्ट-क्राॅक्रींट निर्मित टेबल पर बैठते हुये कहा। "फिर तुम उसके साथ ये सब क्यों करती हो?" लालसिंह ने पुछा। वह भी कजरी के पास ही बैठ गया। "नगर वधु बनने से बचने के लिए मैंने यह स्वीकार किया है।" कजरी बोली। "क्या मतलब?" लालसिंह ने पूछा। "अर्जुन मेरी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का बन्दोबस्त पिछले दो साल से कर रहा है। उस पर यहां सभी लोगों को पता है कि कजरी, अर्जुन ठेकेदार की स्वामित्व वाली संपत्ति है जिसके कारण चाहते हुये भी कोई मेरी ओर आंख उठाकर देखता भी नहीं है।" कजरी ने स्पष्ट किया। "मगर ऐसा क्यों? अर्जुन ठेकेदार से सभी मजदूर और कारीगर, मिस्त्री इतना डरते क्यों है?" लालसिंह ने पुछा। "अर्जुन शहर का पुराना ठेकेदार होकर भवन निर्माण क्षेत्र में जाना-पहचाना नाम है। उसके पास पुरे वर्ष भर काम की कोई कमी नहीं आती। मिस्री और कारीगरों ने उससे लाखों रूपये अपनी निजी आवश्यकता पुरी करने के लिए एडवांस में ले रखे है। अर्जुन ने लाखों रूपये मजदूरों भी को एडवांस में दिये है ताकी मजदुर और मिस्री उसके पास नियमित रूप से काम करते रहे। एडवांस में दिये गये रूपये के वापस मांगने के डर से भी लोग उससे डरते है।" कजरी ने कहा। उसने यह भी बताया की अर्जुन ठेकेदार को कजरी का अन्य मजदूर या आगंतुकों से हंसते- मुस्कुराते हुए बात करने पर आपत्ति थी। उस दिन इसी बात को लेकर अर्जुन ने कजरी पर हाथ उठाया था। कजरी ने स्वयं विवाह नहीं करने का कारण भी लालसिंह को बताया। उसने बताया कि यदि वह विवाह कर लेती है तब उसके भाई-बहन और बीमार मां की देखभाल कौन करता? शराबी पिता पर उसे तनिक भी भरोसा नहीं था। विवाह कर लेने के बाद भी कजरी को मजदुरी ही करनी पड़ती। दिनभर मेहनत-मजदुरी की कमाई अपने पति के हाथ में देनी होगी। फिर बच्चें पैदा करना और उनके लालन-पालन का उत्तरदायित्व आरंभ हो जायेगा। दिन भर मज़दूरी करो, शाम को थके हाल घर लौटकर चूल्हा-चौका फुंको। बच्चों को सम्भालों और शराबी पति की दुत्कार, मार खाओ सो अलग। कजरी को यह जीवन स्वीकार नहीं था। अपने परिवार के साथ रहकर वह स्वतंत्र थी। कजरी बे-रोकटोक परिवार को पाल-पोस रही थी। भाई-बहन को पढ़ना-लिखना सीखा रही थी। विवाहित होने के उपरांत कजरी का पति उसे यह सब करने देगा, इस बात पर उसे संदेह था। लालसिंह को कजरी की कर्तव्यनिष्ठा ने प्रभावित किया। वह धीरे-धीरे कजरी के प्रति सकारात्मक राय बनाने में सफल रहा। अवसर पाकर लालसिंह ने कजरी को विवाह हेतु प्रस्ताव दे दिया। "लालसिंह! होश में आओ! न तुम्हारे पास रहने को छत है और न हीं तुम्हारे अन्दर इतना सामर्थ है कि तुम मेरा और मेरे परिवार का भरण-पोषण कर सको!" कजरी गुस्से में आकर बोली। "जो काम तुम अकेली कर रही हो, वही काम अगर हम दोनों मिलकर करे तो निश्चित ही भविष्य में कोई परेशानी नहीं होगी।" लालसिंह ने दृढ़ता से उत्तर दिया। कजरी जान चुकी थी की लालसिंह उससे प्रेम करने लगा है। लालसिंह उसके लिए उपयुक्त वर है इसमें कोई संदेह नहीं था किन्तु उन दोनों के परिणय बंधन में सबसे बड़ी बाधा अर्जुन ठेकेदार था। जिसके उपकार तले कजरी श्वांस भी नहीं ले पा रही थी। लालसिंह का दृढ़ संकल्प देखकर कजरी ने उसके साथ मिलकर अर्जुन ठेकेदार का विरोध प्रारंभ कर दिया। लालसिंह अब कारीगर बन चुका था। उसे मिलने वाले पारिश्रमिक में भी पर्याप्त वृद्धि हुई थी। कजरी ने अर्जुन ठेकेदार से एक लाख रूपये अपनी मां के उपचार हेतु उधार लिये थे, उन रूपयों को लालसिंह ने अर्जुन ठेकेदार को चुकता करने में सहयोग किया। कजरी ने भी दुगनी मेहनत कर प्राप्त मजदुरी की राशी को जमा कर अर्जुन ठेकेदार के शोषण से स्वयं को मुक्त करने में सफलता प्राप्त कर ही ली। लालसिंह जैसा समझदार जीवनसाथी पाने की प्रसन्नता कजरी के साथ-साथ उसके पारिवारिक सदस्यों को भी थी। कुछ ही समय में कजरी और लालसिंह ने स्वयं की जीवन शैली में आश्चर्यजनक बदलाव किया। प्रतिदिन मिलने वाली मजदूरी की राशी को न्यूनतम व्यय कर अधिकतम बचत करना शुरू कर दिया। स्कूल की पढ़ाई के बाद कजरी के भाई-बहन मजदुरी में कजरी की सहायता करना नहीं भुलते। कजरी की मां भी थोड़ा बहुत काम कर कुछ न कुछ मजदुरी से कमा ही लेती। कजरी के पिता सुरेश ने आत्मग्लानि का आभास होने पर शराब छोड़ दी। अब वो भी अपनी मजदुरी से प्राप्त संपूर्ण राशी किरण के हाथों में देने लगा। लालसिंह ने भवन निर्माण में सहायक उपकरण- संसाधन आदी जुटाने आरंभ कर दिये। शनै: शनैः वह भवन निर्माण के छोटे-मोटे ठेके स्वयं लेने लगा। कजरी और उसके पारिवारिक सहयोग के कारण लालसिंह को पहले से अधिक लाभ होने लगा। लालसिंह ने अपने गाँव से भैया-भाभी को भी बुलवा लिया। देखते ही देखते गोपाल भवन निर्माण ठेकेदार बन गया। कल का मजदुर चौक पर खड़े होकर काम की तलाश में खड़े रहने वाला लालसिंह आज स्वयं चौक से मजदूरों को काम देने लगा था। पारिवारिक परस्पर सहयोग, दृढ़ संकल्प और जीवन में सफल होने की प्रबल भावना के फलस्वरूप कजरी और लालसिंह, गांव छोड़कर शहर आ रहे हर मजदुर के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं थे। उन दोनों ने अन्य मजदूरों को सिखाया कि दिन-भर मेहनत-मजदुरी की राशी केवल खाने-पीने में व्यर्थ नष्ट न करे अपितु उसकी संयुक्त बचत करना भी सीखे। सुखद भविष्य के केवल स्वप्न ही न देखे बल्कि उन स्वप्न को पुर्ण करने का पुरूषार्थ भी दिखाये। पारिवारिक सदस्यों द्वारा मिल-जुलकर कार्य संपादन करने से कार्य आनंद के साथ संपूर्णता को प्राप्त करते हुये आशानुरूप सफलता दिलाता है। आवश्यकता अपने उत्तरदायित्व का स्मरण रख निरंतर सद्कदमों पर चलकर भरपूर परिश्रम करने की है। कजरी ने न केवल स्वयं के शोषण का विरोध किया अपितु पति के रूप में लालसिंह को पाकर योजनाबद्ध तरीके से सफलता के लिए सांझा प्रयास किए, जिसमें दोनों सफल हुये। समाप्त ------------------ प्रमाणीकरण-- कहानी मौलिक रचना होकर अप्रकाशित तथा अप्रसारित है। प्रेरणा-- शहर के विभिन्न चौराहों पर खड़े मजदूरों को ध्यान मे रखकर रचित यह कथा मजदूरों की निम्न आर्थिक दशा का उत्तरदायी उनकी अशिक्षा को स्वीकारती है। अशिक्षित होकर मद्यपान/मदिरापान जैसे व्यसनों में घिरे मजदूर अपनी दिनभर की मेहनत-मजदुरी को व्याभिचार में व्यय कर नष्ट कर देते है। जबकी यही मजदुरी की राशी का संचय यदि पारिवारिक सदस्य मिल-जुलकर करे तब निश्चित रूप से बड़ी धनराशि की प्रतिदिन आवक होकर जीवन शैली में सकारात्मक परिवर्तन अवश्य लाये जा सकते है। जिससे अधूरी शिक्षा को पुर्ण कर भविष्य के सभी ऐश्वर्य सरलता से प्राप्त किये जा सकते है।

 लेखक जितेंद्र शिवहरे सहायक अध्यापक शा प्रा वि सुरतिपुरा चोरल महू इन्दौर



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*💪🏻भारत के मजदूर है
 ,ये सचे कोहिनूर है💪🏻
* जिसके दम से हर कार्य चले,जो महलो का निर्माण करे भारत माँ का लाल है वो,
पर हालत से बेहाल है वो बेरोजगारी और गरीबी दोनों उसके बने करीबी जो इंसान के जीवन का सिर्फ जख्म नही नासूर है ये भारत का मजदूर है,देखो कितना मजबूर है जो मेहनत की रोटी खाये,कभी भूख में आँसू पी जाएं पापी पेट को भरने खातीर ,घर-परिवार से रहता दूर है दर दर ठोकर भी खाता है,फिर भी खुद को समझाता है मेहनत करना मेरा किस्मत और दुनिया ये मगरूर है ये भारत का मजदूर ये ही सच्चा कोहिनूर है सरकार के झूठे वादे है,मजदूर तो सीधे-सादे है दुनिया भी इनको मूर्ख कहे फिर भी नही घबराते है गरीबी में ही जन्म लिए और गरीब ही मर जाते है झुग्गी में ही रहते है पर भारत के तकदीर है ये भारत का मजदूर ये ही सच्चा कोहिनूर है *मनी* कहे ये दिल भी रोता है,जब कोई भूखा सोता है ये भारत देश की गरिमा पर है जैसे काला दाग पड़ा कुछ करोड़ो गटक लिया,कुछ विदेशो में भाग खड़ा घुटकर जीते सत्य के राही,ये कैसा दस्तूर है दाल में कुछ काला है गड़बड़ कुछ तो जरूर है उनकी हालत कौन सुधारे जो भारत का मजदूर है ये भारत का मजदूर है ये ही सच्चा कोहीनूर है । *

कवि मनीष कुमार तिवारी*

मनी टैंगो* *ग्राम+पो०:-मिल्की ईश्वरपुरा* *जिला :-भोजपुर* *राज्य:-बिहार*


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पथ पर ठहर जरा बहुत दौड़ा बहुत भागा बड़ी तेजी से उठा उड़ा नभ जल भूमि अंतरिक्ष कुछ भी नही
छोड़ा विजित चिन्ह छोड़ चला प्रगति की राह चले चला अब ठहर गया
सब घर मे सिमट गया अपने बनाये जल में अब उलझ गया ठहर जा
अब ठहर जा हर जगह कर मत सौदा हर तरह भाग दौड़ा अंधी दौड़ में बस अब ठहर जा जहाँ है
वहाँ सबकुछ है इंसान है तू बिता समय अब प्रार्थना में कर दे कुछ दान अब गरीबो असहायों गरीबो की कर दे मदद अब उन्हें इंतज़ार तेरा उन्हें तेरा सहारा उन्हें तेरी जरूरत कर रहे जो सेवा अस्पतालों में वे भगवान
 क्या जरूर वे कर्मयोगी महान योगी जो उठा रहे बीड़ा बन मर्मयोगी जो कर सेवा पीडित मानवता किवो
 कर्म योगी वो हठयोगी डटे रहे जो सेवा में वे ह्रदयस्पर्शी मर्मस्पर्शी कहाँ है
महापुरुष हमारे दलदल के दाल वाले कहाँ है पंडे और पुजारी मौलवी और पादरी दे हमे सहायता अब हमें चाहिये उठोजागो मानवता तुम्हे पुकार रही मानवता तुम्हे निहार रही मदद करो मदद करो कुछ तो अनुभूत करो

 शिव कुमार दुबे इंदौर



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लघुकथा शीर्षक:-आत्मविश्वास

 किसान दीनालाल के खेत में रबी की फसल पक गयी है। कोरोनावायरस के कारण पूरे राष्ट्र में लाकडाउन लगा है। एक सच्चे देशभक्त होने के कारण मजदूरों को फसल काटने के लिए नहीं कह रहे हैं। फसल कटाई के लिए बहुत चिंतित है। " दादाजी आप सवेरे -सवेरे क्यों चिंतित हैं? आपके चेहरे पर बारह बज रहे हैं।"
 उनका बारह वर्ष का पोता रोहन पूछा।
 "खेत में रबी की फसलें सूख गयी है।अगर इसको यूं ही कुछ दिन छोड़ देंगे तो सारी मेहनत पर पानी फेर जाएगी।क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मजदूरों से कटवा नहीं सकता ।
मैंनें कभी फसल काटी नहीं है।" दीनालाल उदासी स्वर में बोले।
 " ओहो दादा जी! रोहन के रहते हुए आप क्यों चिंतित हो जाते हैं।
चलिए खेत , हमलोग स्वयं फसलें काटकर ले आएं। मैंनें मजदूर चाचा जी सबको फसल काटते ध्यान से देखता रहता।" राहुल आत्मविश्वास के साथ बोला। " पर रोहन तुम अभी......... ।
" दीनालाल बोले। " चलिए , दादा जी फसल काटने में देरी मत कीजिए। " रोहन दीनालाल को फसल काटने के लिए तैयार कर लेता है।दोनों आत्मविश्वास के साथ प्रसन्नता पूर्वक खेत की ओर चल देते हैं।

 रीतु प्रज्ञा (शिक्षिका) उत्क्रमित माध्यमिक विद्यालय करजापट्टी, केवटी,दरभंगा, बिहार



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भारत की अमूल्य धरोहर को हम कहां से लाएंगे,
यह हंसता खिलखिलाता सा चेहरा कहां से लाएंगे
यह मासूमियत और देशप्रेम हम कहां से लाएंगे, यह खूबसूरत सितारा जो
हम रोज देखा करते थे कहां से लाएंगे, ऋषि कपूर की प्रतीति अब हम कहां से
ढूंढ कर लाएंगे, श्रद्धांजलि


डॉक्टर मणी अभय मुथा जलगांव महाराष्ट्र


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एक रचना

* चार आना भर उपज है, आठ आना भर कर्ज बारा आना मुसीबत, कौन मिटाए मर्ज?
* छिनी दिहाड़ी, पेट है खाली कम अनुदान शीश उठा कैसे जिएँ?
भीख न दो बिन मान मेहनत कर खाना जुटे निभा सकें हम फर्ज
* रेल न बस, परबस भए रेंग जा रहे गाँव पीने को पानी नहीं नहीं मूँड़ पर छाँव बच्चे-बूढ़े परेशां नहीं किसी को गर्ज
* डंडे फटकारे पुलिस मानो हम हैं चोर साथ न दे परदेस में कोई नगद
न और किस पर मुश्किल के लिए करें मुकदमा दर्ज



*** संजीव वर्मा सलिल


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कहने वाले कहते रहे, निकम्मे हैं सरकारी !
आज इस विकट दौर में, काम आए सरकारी !
कोई न आते पास मरीज के, दवा पिलाते सरकारी ।
कोई न इनके हाथ लगाते , मल मूत्र उठाते सरकारी ! कोई न इनको रोक पाते, पत्थर खाते सरकारी ।
 चौराहों पर चौबीसों घण्टे , पाठ पढ़ाते सरकारी ! स्कूलों में बारातियों सी , खातिर करते सरकारी ।
छोड़ परिवार डटे हुए हैं, कर्तव्य पथ पर सरकारी! या फिर बच्चे के संग, ड्यूटी पर मां सरकारी! नेताओ ने नाम कमाया, देकर धन सरकारी। घर रहने की विनती करते, गाना गा कर सरकारी! घर घर जो सर्वे करते,
 वो बन्दे सारे सरकारी। अपनी कमाई का हिस्सा दे, बिना नाम के सरकारी! धन कम पडे खजाने में तो,
 DA कुर्बान करे सरकारी! मौत सर पर लिए बैठे निकम्मे सारे सरकारी !!



विजय  खरे


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दिल,,,,,,,

कुछ पंक्तियाँ दिल की बात बड़ी निराली है
कहते इनके दिमाग़ खाली हैं बेपरवाह हैं
जो दिल की सुनते ऐसा दिमाग़ वाले कहते रहते पर
दिल की जो मान लेते हैं दुआओं के हक़दार होते हैं
अपना सब कुछ लुटा देते हैं चाहे वे ख़ुद कंगाल हो
जाते तो दिल दिमाग़ दोनों की सुनो


 सरला मेहता

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दिल की चाहत मुहब्बत सी दिल में जगी हो
जैसे जिंदगी अब जिंदगी लगी हो
 जैसे प्यास दरिया की निगाहों में छुपी एक बादल से आस करी हो जैसे महक रहे
है अल्फाज़ मुहब्बत के चिट्ठी किताबों में यूँ रखी हो जैसे तेरी
 बातों को छुपाना नामुमकिन लहजे में
 तेरी खुशबू बसी हो जैसे जाते जाते तेरा यूँ मुड़कर देखना उमड़ती सी अल्हड़ नदी हो
जैसे सभी को मिले खुशियों की सौगात दिल ने"मधु"यही बात कही हो जैसे ||

मधु टाक


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।।अहंकार।। करोना मद भरी बातें। मन का उद्गार दिखता है।
 अहंकारी धरातल में। डूबा डूबा सा दिखता है। अहंकार के मद में। चूर रावण को है देखा।
वो खुद अपने ही हाथों से। विनाशक अपना बन बैठा। गई लंका बजा डंका। मिट गया सार
 जीवन का। दशानन था अभिमानी।
मान मिट्टी में खो बैठा। सभी समझाएं बहुतेरे।। एक भी बात माने ना।
घड़ी आई बिनाशक की। बुद्धि विपरीत होती है। सदियों से अहंकारी।
 का दहन होता आया है। करो ना मद भरी बातें। मन का उद्गार दिखता है।
 करोना मद भरी बातें।
मन का उद्गार दिखता है। अहंकारी धरातल में। डूबा डूबा सा दिखता है।


 वंदना रमेश चंद्र शर्मा 52 सर्वोदय नगर देवास



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आज का विषय दिल दिल तोड़ना जरूरी रहा होगा,

बेवफा तो वो नहीं था। दिल ने मजबुर ही किया होगा बेवफा तो वो नहीं था।






दिल को कैसे समझाया होगा हमे भी मालूम नहीं दिल किसी और से जोड़ना होगा बेवफा तो वो नहीं था।



अर्पण  तिवारी

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इंसान कहाँ खो गया आज वो इंसान बसता था जिसके दिल में
कभी भाई चारा और इंसानियत खाता था रोटी ईमान की ओढ़ता था चादर सुकून की
 नफ़रत और इरशा से कोसो दूर दिल में थी मोहब्बत उसके सब कोई
अपने थे कोई न पराया था बेटी होती थी पूरे गाँव की बेटी हँसते रोते सब
एक दूजे के लिए त्योहार मनाते सब मिलकर हँसते गाते सब मिलकर कोई अपना था ना कोई पराया था
कोई बड़ा था ना कोई छोटा था अमीर ग़रीब सब रहते मिलजुल कर ये क्या हुआ इन्सान
तुझे बना भाई भाई का दुश्मन लालच पैसे का और कीड़ा अहंकार का द्वेष और दुश्मनी
 ने बनाया तुझे इंसान से हैवान अब भी वक़्त है ऐ इंसान सुबह का भूला शाम को भटका हुआ नहीं कहलाता


 शारदा गुप्ता इंदौर


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मनुज हर वो , जो है श्रम साधक है सुदीप्त अपने आत्मबल और आत्म कौशल से , परमात्मा की संरचना में , इस जीवन धरा में , जिसने भरें हैं रंग चितेरे हस्तकौशल से , ऐसा मक़बूल क्या कभी हो सकता है --- मजबूर , निरीह है साक्षी इतिहास हमारा , हुई है जब भी उसके अन्याय और दमन की बात , ताकत दिखलाई है विश्व को उसने अपनी निडरता और हौसलों की कायनात भी झुकाती है , कदम अपने समक्ष उसके बाहुबल के , हर वो हाथ जो है मेहनतकश , है उसी मजदूर के हाथ , जिसके श्रम से ही है रोशन ये दुनिया सारी ।

इंसान कहाँ खो गया आज वो इंसान बसता था
जिसके दिल में कभी भाई चारा और इंसानियत खाता था रोटी ईमान की ओढ़ता था
चादर सुकून की नफ़रत और इरशा से कोसो दूर दिल में थी मोहब्बत उसके
सब कोई अपने थे कोई न पराया था बेटी होती थी पूरे गाँव की बेटी हँसते रोते
सब एक दूजे के लिए त्योहार मनाते सब मिलकर हँसते गाते सब
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*मजदूर* रघुबीर मल्टी नेशनल कंपनी में कार्यरत कर्मचारियों के साथ *मजदूरी* का काम करता था लेकिन जीवन निर्वाह करने के लिए साहूकार से कुछ पैसे उधारी लेने के कारण उन रुपयों को चुकाने के लिए रात को पार्ट टाइम काम करता था बेहद थक जाता था। आये दिन साहूकार अपने पैसे मांगता रहता था कहता था कि जल्दी से पैसे चुका दो वरना अब आगे से पैसे नही दूंगा...... रघुबीर आखिर क्या करता दिन रात *मजदूरी* करने के बाद भी पैसे सिर्फ खाने पीने में ही चले जाते थे तो साहूकार ने उसे सलाह मशवरा दिया ........ रेलवे स्टेशन में पटरी पर जाकर लेट जा और आत्महत्या करने का नाटक करना ताकि तुम्हारे कंपनी के अधिकारी तुम्हें पार्ट टाइम का पैसा दें ..... रघुबीर ने वैसा ही किया रेलवे स्टेशन पर जाकर पटरी के बीच लेट गया और आत्महत्या का नाटक करने लगा कुछ कर्मचारियों को पता चला तो वे बड़े अधिकारियों को जाकर बतलाये ..... अधिकारी ने कहा -कुछ सुरक्षा कर्मियों को लेकर जाओ और उसे पकड़ कर ले आओ ।रघुबीर को पकड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन वह पटरी पर पड़े हुए पत्थरों से मारने लगा था अब अधिकारियों ने कहा - ऐसा करो ट्रेन आने वाली है जहां रघुबीर बैठा हुआ है वहाँ कुछ दूरी पर एक व्यक्ति लाल रंग का कपड़ा लहराते खड़े रहे ....ताकि रेलगाड़ी को कुछ समय तक रोका जा सके और कुछ व्यक्ति अपने साथ टिन का टुकड़ा ले जाकर अपना बचाव करते हुए रघुबीर को पकड़ कर लाया जा सके ..... अधिकारियों के आदेशानुसार कुछ सुरक्षा कर्मियों ने रघुबीर को पकड़ने में कामयाब रहे .... अब उन्होंने कहा कि उसकी खूब पिटाई करो ताकि सच्चाई जाहिर करे और उसे छोड़ दो । सुरक्षा गार्ड ने ऐसा ही किया उसकी खूब पिटाई कर छोड़ दिया वह घर पहुंचा घर के लोग उसकी यह दशा देखकर हैरान हो गए आखिर रघुबीर को क्या हुआ .... दूसरे दिन रघुबीर की पत्नी कंपनी के अधिकारी के पास अपनी शिकायत लेकर पहुंची ..कहने लगी मेरे पति को सुरक्षा कर्मियों ने पकड़कर खूब पिटाई की है ये अच्छा नही किया उन्हें कड़ी सजा सुनाई जाय....... रघुबीर की पत्नी की सारी बातें सुनकर अधिकारी ने कहा पहले आप रघुबीर से सच्चाई पूछिये वह रेलवे स्टेशन पर पटरी पर लेटकर आत्महत्या करने जा रहा था आखिर क्यों ......? ? रघुबीर ने साहूकार के सलाह मशवरे की पूरी घटना का वर्णन करते हुए सभी के सामने अपनी गलतियों को कबूल किया। साहूकार के बहकावे में आकर गलत कदम उठा रहा था सभी अधिकारियों ने उसकी सच्चाई को सुनकर चौंक गए और रघुबीर की गलतियों को स्वीकार कर प्रायश्चित करने से उसे कंपनी में कर्मचारियों के साथ काम करने के लिए पदोन्नति दिलाकर उनके परिवार जनों की भी आर्थिक सहायता प्रदान की गई ........ आखिर मेहनतकश मजदूर वर्ग अपने खून पसीने की कमाई से ही परिवार का भरण पोषण करता है। *पसीने की हर बून्द दिखलाती है हाथों की लकीरें बतलाती है वे हम सभी के जीवन मे खुशियां भरते नये रूप में विश्वकर्मा बन जाते हैं*


 *शशिकला व्यास* ✍️
######'क्ष्क्ष्####


ऐ सर्द हवाओं जरा फ़िर से लौट आओ ,

झुलसती धूप से इस सृष्टि को बचाओ, कोई गरीब दो वक्त की रोटी की खातिर पसीना बहा रहा है ,

कोई श्रमिक बच्चा गर्मी में घंटे उठा रहा है,

कोई मां पेड़ पर झूला डाल बच्चे को सुलाकर,झुलसती धूप में अमीरों के महलों की नींव खोद रही है ,

ठंडी बयार बने कर उनके श्रम बिन्दु को सुखाओ , ऐ ठंडी बयारे पंखा उनको झल के आओ ,

ऐ चांद तुम अपनी शीतल चांदनी के रस बिन्दु बरसा जाओ ऐ जाओ

 ,मेरी लेखनी की शुभकामनाए सबको देकर आओ, मेरे देश को झुलसती गर्मी से बचाओ ,ऐ

जाओ सर्द हवाओं तुम फिर से लौट आओ 🙏🏻

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