Wednesday, April 15, 2020

लघुकथा----

 कृष्ण की सीख---


 महाभारत के युद्ध का अंत हो गया था।

द्रोपदी का प्रतिशोध पूर्ण हुआ परन्तु फिर भी द्रोपदी व्यथित थी।

संपूर्ण वंश का नाश हो चुका था। कौरवों के साथ पांड़व वंश में भी पांड़वों और उत्तरा के गर्भ के अलावा कोई नहीं बचा।

द्रोपदी आज व्यथित सी वर्षों बाद बालों को संवार रही थी, इतने में कृष्ण ने कक्ष में प्रवेश किया।

 द्रोपदी ने दुखी होकर कहा-- हे कृष्ण ये कैसा समय है?

संपूर्ण वंश का विनाश? अब पांड़वों को राज्य मिला भी तो यह श्मशान हो चुका है।

कृष्ण ने कहा-- हे सखी , द्रोपदी इसमें तुम्हारा भी योगदान है।

सृष्टि में हर युद्ध औरत और सत्ता के लिये हुआ है।
तुमने कर्ण को स्वयंवर में चुना होता तो तुम आज कर्ण की ब्याहता होती।

पांच पतियों की पत्नी नहीं। ना भरी सभा में तुम्हारी लाज पर छींटे होते।

कर्ण अपनी पत्नी की रक्षा करना जानता है।

वो पत्नी के सम्मान के लिये जान की बाजी लगा देता।

ना तुम बाल खोलकर दुःशासन के रक्त से उसे धोने का प्रण करती तो ये युद्ध ना होता।

तुम कौरवों की खिल्ली नहीं उड़ाती और अंधा ना कहती तो तुम्हारे चीरहरण का प्रयास कौरव कभी नहीं करते।

 स्त्री को हमेशा मितभाषी, धैर्यवान और दूरदृष्टि होना चाहिये।

तुम बुद्धिमती और सुंदर हो परन्तु धरती की तरहा विशाल ह्दय और गहरी नहीं।

इसी कारण आज तुम्हे ये दुख द्रवित कर रहा है। भविष्य में तुम हर नारी के लिये उदाहरण रहोगी।

सम्मान पाने के लिये सम्मान देना पड़ता है। कृष्ण की बात सुनकर द्रोपदी की आंखों से पश्चाताप के अश्रु ब हने लगे ।


सुष'राजनिधि'

2 comments:

  1. कथा अच्छी है । नारी के संदर्भ में कुछ प्रश्न हो सकते हैं ।

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