Friday, April 10, 2020

 🙏पूज्य बाबूजी, सादर नमन ।


 बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है, यह जानती हूँ मैं ।

 अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है ।

 कभी-कभी एक अनजाना- सा भय लगता है , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद से घिरे हुए हैं।

आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी-बड़ी शाखाओं से हम पर स्नेह की

छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ । तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे ।

याद है न भूकंप के समय कितना डर गई थी मैं ।

सब मेरा मजाक उड़ाते थे, पर तुम मेरी मनःस्थिति को समझ कर कितना प्यार से सहलाते थे मुझे।

आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ ।

 भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है ; और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न !

 तुम्हारे रहते शायद हम बेफिक्र रहते । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न !

कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो ; समाचार मिलते रहते हैं । पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है।

एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी ।

 बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें, चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही ।

आज बहुत कुछ लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हें बताना चाहती हूँ ; पर आँखें डबडबा रही हैं, शब्द धुंधले पड़ रहे हैं, ठीक से दिख नहीं रहा ।

 तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी ! अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी ।

 पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो --- आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं न कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----।

 होती है न बाबूजी ! -


*तुम्हारी लाड़ली वंदना ।

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