Tuesday, May 26, 2020

पत्र मेरे नाम मैं आज स्वयं के नाम पत्र लिखना चाहती हूँ ।मैंने अपनी जिंदगी को अपनी ही शर्तों पर जिया इसलिए स्वयं

से प्यार भी है। मैंने लिखने का क्षेत्र चुना और लिखती रही बस लिखती रही परन्तु मुझे पूर्ण संतुष्टि कयों नहीं मिली समझ


 नहीं आता। ऐसा प्रतीत हुआ कि ये मेरी पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं है। मैं कहीं न कहीं विलुप्त हूं और अपने को पूरी तरह


व्यक्त नहीं कर पा रही हूं। सब कुछ अधूरा सा लगता हैऔर कभी लगता है मैं वह नहीं हूं जो रचनाआओं से प्रस्फुटित हो


रहा है।मन के संसार की थोड़ी सी झलक तो है उनमें यही सोच कर नई ऊर्जा के साथरचने लगती हूं नये बिम्ब । पूर्ण तो


हम कभी अभिव्यक्त हो नहीं सकते क्योंकि हम ईश्वर नहीं इंसान हैं यही सोच कर मन को समझा लेती हूं। शायद यही

भाव मुझे प्रेरित करता है कि और अच्छा लिखूं । मेरी प्रेरणा सिर्फ मैं हूं और इसने पग ॒पग पर नये विचारों से मुझे

अवगत कराया है। मुझे स्वयं से इतना ही कहना है कि कभी हारना मत और जब मन विचलित हो तो बस कलम उठा लो

। लिख कर प्रकट कर दो अपने जज्बात । |||

नीति अग्निहोत्री|||

| ५७ साईं विहार इन्दौर मप्र

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