Wednesday, May 6, 2020

चुप क्यों हो? चुप क्यों हो माँ? क्या विवशता है माँ? करता है अन्याय सदा इह लोक तुम्हारे साथ करवा दिया जाता कभी

 आत्मजा की भ्रूण हत्या लगने दिया जाता नहीं अरमानों को पंख कभी ! सहती जाती व्यथा सभी चुप क्यों हो माँ तब भी

? प्रतिकार करो शक्ति स्वरूपा सहमी रहती तेरी गुड़िया देख दानवी क्रूर क्रिया तपती राह है असहनीय अस्तित्व रहा है


असुरक्षित अन्त किया जा रहा जीवन खिलाकर जहरीली पुड़िया क्यों चुप हो माँ? क्या शक्ति तुम्हारी हो गयी है नश्वर माँ?

माँ तुम्हीं हो महिषासुरमर्दिनी ! तुम्हीं हो रक्तबीज संहारिणी । सकल लोक कल्याणी संतान रक्षार्थ कर सदा सुख दायिनी

चुप क्यों हो माँ ? वेदना के सागर से अब तो निकलो माँ। रहती असहाय गाय समान सहती रहती सदा अपमान बनी रह

गयी हो कठपुतली हुंकार भरो माँ ! खोलकर जुल्मों की पोटली क्या तुम्हारा खुद पर कुछ भी अधिकार नहीं सम्मान मिले

समाज में क्या तुम इसकी हकदार नहीं? चुप क्यों हो माँ? मुख अपना भी खोलो माँ ! कुछ तो तुम भी बोलो माँ ।

 रीतु प्रज्ञा करजापट्टी , दरभंगा, बिहार

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