Sunday, May 17, 2020

डर के आगे डर है। जी हां, ठीक पढ़ा आपने डर के आगे डर है

 कुछ समय पहले मेरी सहेली का फोन आया था। कहने लगी

 " ये कोरोना तो २०२२ तक चलने वाला है ।जितनी भी डरावनी संभावनाएं हो सकती थीं उसने बता दी। कैसे होगा? क्या करेंगे? मराठी के एक लेखक हैं उन्होने क ही लिखा था कि " जब आलस आता है फिर आलस ही आता है और फिर आलस ही आता है। यही हाल डर का है। जब डर लगता है तो फिर डर, फिर डर ही लगता है। अभी हमारे सामने। कोरों ना का सबसे बड़ा डर खड़ा है। हमें लग रहा है कि इससे बड़ी विपदा,समस्या, संकट कुछ हो ही नहीं सकता। हम सब लगे हुए हैं हाथ धोने में, हाथ धोने के बाद भी शंकित मन से फिर धोते हैं। हाथ धड़ा धड धु ल रहे हैं।सब्जियां धुल रही है। समान ७२-७२ घंटे धूप में रखकर पानी से खंगाला जा रहा है। बच्चों को भी हाथ धोने का विशेष महत्व समझा दिया है। बच्चों को तो वैसे ही पानी से खेलने का शगल होता है। पूरा देश अभी " हाथ धो ओ, कोरॉना भगाओ" में लगा हुआ है ।जो जरूरी भी है । लेकिन अब गरमी शुरू हो गई है। पानी की किल्लत शुरू हो जाएगी। वाट्सअप महाराज पर संदेश आने लगेंगे कि धरती पर इतने प्रतिशत ही पानी बचा है। तीसरा महायुद्ध पानी के लिए ही होगा। आदि आदि। पानी के टैंकर कि मा रामार शुरू हो जाएगी। एक डर हमारे सामने फिर खड़ा हो जाएगा। कही पानी न कम पड़े। पानी स्टोर कर कर के हम हलकान होंगे। फिर हम पानी की त्रा सदी से डरेंगे। ये एक डर मुंह बांए खड़ा हो जाएगा। घर में काम करने वाली महिलाओं को यदि हम काम पर रखेंगे तो २०२२ तक का korona हमारे दिमाग में भय पैदा करेगा । हम सशंकित हो जाएंगे। यदि हम उं महिलाओं को काम पर नहीं रखते हैं तो को हमारे भरोसे ५_१० सालों से थीं, उसका क्या होगा? और यदि हम उनको काम पर न रखकर केवल मेहनताना देते रहे तो हमारी आर्थिक स्थिति के साथ साथ हमारी शारीरिक हालत के बिगड़ने का डर हमारे ऊपर हावी रहेगा। और यदि उनको काम से निकाल दिया तो सामाजिक संवेदना और उनके प्रति उत्तरदायित्व न निभा पाने का भय हम चैन नहीं लेने देगा। कुछ समय बाद स्कूल शुरू हो जाएंगे हमारे बच्चे स्कूल में हाथ धो रहे है या नहीं, ईधर उधर हाथ तो नहीं लगा रहे ये डर सताएगा। कुछ लोग नोकरी जाने के डर से, फैक्ट्री बन्द होने के डर से,आर्थिक नुकसान के डर से भयभीत रहेंगे। विदेशो में रहने वाले हमारे बच्चो का डर।ऐसे ही जब हम किसी समारोह में बुलाया जाएगा। तो क्या हमारा हाथ समोसा या द ही बड़े कि प्लेट लेते लेते रुक जाएगा? फिर डर? मतलब कोरोणा क ही से भी चला जाय किंतु जब तक हमारे दिलो_दिमाग से, हमारे विचारों से, हमारे आपसी वार्तालाप से नहीं जाएगा तब तक हम उसके आंतक से डरते रहेंगे। इसलिए मैने कहा कि डर के आगे डर है। एक डर डर भागेंगे तो दूसरा सम्मुख खड़ा हो जाएगा। और यदि ऐसी ही मानसिकता रही तो हम खोफ के साए में ही जीना पड़ेगा। इसलिए सावधानियां पूरी रखें। और रिस्क कि उतनी ही तेयारी रखें जितनी स्कूटर, कार में एक एक स्टेपनी दी जाती है। हम कभी ये तो नहीं सोचते कि स्कूटर के दोनों टायर या कार के चारो टायर पंचर हो गए तो? इसलिए एक स्टेपनी जितना ही सोचिए।दूसरी बात दुनिया से तो कोई किसी भी ब हाने कूच कर सकता है। कोरो ना बिचारा क्या करेगा सिर्फ इ तना ही कहेगा""मुफ्त हुए बदनाम "। इसलिए धीरज रखिए। सब कुछ चंगा होगा।वैसे ही बावले पोहे के ठेले पर मिलेंगे जैसे मतवाले मदिरा की दुकान पर थे। ईश्वर हमारे साथ है, हम सब साथ है। जयहिंद।

*नियति  सप्रे 

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