Sunday, May 17, 2020

जिंदा रहे तो फिर से आयेंगे बाबू तुम्हारे शहरों को आबाद करने । वहीं मिलेंगे गगन चुंबी इमारतों के नीचे प्लास्टिक के तिरपाल से ढकी झुग्गियों में । चौराहों पर अपने औजारों के साथ फैक्ट्रियों से निकलते काले धुंए जैसे होटलों और ढाबों पर खाना बनाते । बर्तनो को धोते हर गली हर नुक्कड़ पर फेरियों मे रिक्शा खींचते। आटो चलाते रिक्शा चलाते पसीने में तर बतर होकर तुम्हे तुम्हारी मंजिलों तक पहुंचाते । हर कहीं फिर हम मिल जायेंगे तुम्हे पानी पिलाते गन्ना पेरते । कपड़े धोते , प्रेस करते , सेठ से किराए पर ली हुई रेहड़ी पर समोसा तलते या पानीपूरी बेचते । ईंट भट्ठों पर , तेजाब से धोते जेवरात को , पालिश करते स्टील के बर्तनों को । मुरादाबाद ब्राश के कारखानों से लेकर फिरोजाबाद की चूड़ियों तक । पंजाब के हरे भरे लहलहाते खेतों से लेकर लोहा मंडी गोबिंद गढ़ तक। चाय बगानों से लेकर जहाजरानी तक । अनाज मंडियों मे माल ढोते हर जगह होंगे हम बस सिर्फ एक मेहरबानी कर दो बाबू हम पर , इस बार हमें अपने घर पहुंचा दो । घर पर बूढी अम्मा है बाप है जवान बहिन है । सुनकर खबर महामारी की, वो बहुत परेशान हैं बाट जोह रहे हैं सब मिल कर हमारी , काका काकी ताया ताई। मत रोको हमे अब बस जाने दो विश्वास जो हमारा तुम शहर वालों से टूट चुका उसे वापिस लाने मे थोड़ा हमे समय दो । हम भी इन्सान हैं तुम्हारी तरह , वो बात अलग है हमारे तन पर पसीने की गन्ध के फटे पुराने कपडे हैं, तुमहारे जैसे चमकदार और उजले कपडे नही। बाबू चिन्ता ना करो , विश्वास अगर जमा पाए तो फिर आयेंगे लौट कर जिंदा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । जिन्दा रहे तो फिर आएँगे लौट कर । वैसे अब जीने के उम्मीद तो कम है अगर मर भी गए तो हमें इतना तो हक दे दो । हमें अपने इलाके की ही मिट्टी मे समा जाने दो । आपने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से जो कुछ भी खाने दिया उसका दिल से शुक्रिया । बना बना कर फूड पैकेट हमारी झोली में डाले उसका शुक्रिया। आप भी आखिर कब तक हमको खिलाओगे । वक्त ने अगर ला दिया आपको भी हमारे बराबर फिर हमको कैसे खिलाओगे । तो क्यों नही जाने देते हो हमें हमारे घर और गाँव । तुम्हे मुबारक हो यह चकाचौंध भरा शहर तुम्हारा । हमको तो अपनी जान से प्यारा है भोला भाला

 गाँव हमारा ।। _प्रवासी मजदूरों के दिल की आवाज शहरों मे रहने वालों को समर्पित ।_ जैसा आया वैसा साझा किया


सविता राठौर 😢 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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