संध्या बेला
आओ प्रिये , बैठो पास
जीवन की इस
संध्या बेला में
याद करे कुछ खट्टी ,कुछ मीठी,
और कुछ कड़वी यादों
को हम जीवन था हमारा एक हिंडोला जिसमें झूलते हम कभी हँसते, कभी गाते तो कभी हो जाते उदास और कभी लेते
प्यार की लम्बी लम्बी पेंगे हम कभी रूठ जाते एक दूजे से फिर चलता रूठना मनाना कई दीनों तक एक चमेली का गज़रा
काफ़ी था तुम्हें मनाने के लिए और एक मुस्कान तुम्हारी काफ़ी थी मुझे रिझाने के लिए हमारी बगिया में फिर खिले दो
फूल तुम हो गई व्यस्त उनकी ख़ुशबू चारों ओर बिखराने में मैं था कटिबद्ध तुम सबको सँवारने में जब मिलते रात और
दिन दिवाकर सिमटने लगता अपने आग़ोश में इस निलांबर की बाँहोंमें सौंप अपनी जीवन डोर संध्या काल में हम करे
वादा आज एक दूजे से कभी न होगा मलाल क्या खोया और क्या पाया हमने इस जीवन में
शारदा गुप्ता इंदौर
को हम जीवन था हमारा एक हिंडोला जिसमें झूलते हम कभी हँसते, कभी गाते तो कभी हो जाते उदास और कभी लेते
प्यार की लम्बी लम्बी पेंगे हम कभी रूठ जाते एक दूजे से फिर चलता रूठना मनाना कई दीनों तक एक चमेली का गज़रा
काफ़ी था तुम्हें मनाने के लिए और एक मुस्कान तुम्हारी काफ़ी थी मुझे रिझाने के लिए हमारी बगिया में फिर खिले दो
फूल तुम हो गई व्यस्त उनकी ख़ुशबू चारों ओर बिखराने में मैं था कटिबद्ध तुम सबको सँवारने में जब मिलते रात और
दिन दिवाकर सिमटने लगता अपने आग़ोश में इस निलांबर की बाँहोंमें सौंप अपनी जीवन डोर संध्या काल में हम करे
वादा आज एक दूजे से कभी न होगा मलाल क्या खोया और क्या पाया हमने इस जीवन में
शारदा गुप्ता इंदौर

No comments:
Post a Comment