Tuesday, May 26, 2020

उन दिनों की बात है जब घरों में बिजली नहीं हुआ करती थी ।


संदेश पहुंचाने को सिर्फ पोस्ट ऑफिस का सहारा हुआ करता था । परदेश में रहने वाले अपने प्रियजन को चिट्ठी द्वारा ही मन की बात पहुंचा पाते थे। मुझे याद है गांव में पढ़ना लिखना भी रात के समय में एक लालटेन या दियासलाई हुआ करता था। मैं जब आठवीं में पढ़ाई करती थी तब की बात है , एक परिवार की बहू को अपनी मन की भावना पति को पहुंचाना था। पर मुश्किल तो यह था कि उसको पढ़ना लिखना नहीं आता था। उसका पति उससे रूठ कर गया था। वो अपनी पति को मनाना चाहती थी। बात मेरे समक्ष आया की एक मनुहार चिठ्ठी लिखना है । मै पहली बार चिठ्ठी लिखने बैठी । "सर के स्वामी चरण स्पर्श हम यहां सब कुशल मंगल है , आशा करती हूं आप भी कुशल मंगल होंगे । मुझे मालूम आप नाराज है मुझ से। आप जब जा रहे थे घर की आड़ से आप को निहारती रही एक दफा आप मुड़कर देखेंगे पर मुझे निराशा ही हाथ लगी । फिर सोचा की जाते ही आप की चिठ्ठी आएगी पर नहीं आई । आप क्यों इतना नाराज हुए की मेरा यह कहना था "कि सासू मां को मेरी हर काम में मिन मेख निकालने की आदत है । हम पांच बहु में से मै ही अखरती हूं उनको । आप बोलिए की मुझ से भी समान व्यवहार किया जाय। " इतने में ही आप मुझ से ही नाराज हो गए और दूसरे दिन उठ कर चल दिए नौकरी पर। मै यह भी जानती हूं कि अब आप के मन में कोई नाराजगी नहीं है न मेरे मन में है। कहते है न कि पति पत्नी की झगड़ा पराली के आग समान होती है । छुटकी की तबियत नरम गरम होती रहती है। पूछती है पापा कब आएंगे ? अब की बारी छुटकी के लिए हरलिक्स की दो सिसी ले आना । और अब ज्यादा क्या कहूं अपना ध्यान रखना । आप की फूलमती " उसके पति को यह मालूम था कि उसकी बीबी को लिखना नहीं आता। इतना सुलझे बातों से कौन कर सकता है। बाद में जब पता चला खास इज्जत बन गई मेरी । मेरी फिर यही इमेज बन गई की बिगड़ती बनाने वाली की। चिट्ठियां तो बहुत लिखे पर पहला चिट्ठी संस्मरण कि तौर पे आप लोग के समक्ष 🙏💐


 मित्रा शर्मा महू

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