Tuesday, May 26, 2020

प्रिय बेटी हिमानी , सदैव खुश रहो . पत्र आत्मीयता का संवाद होता है . जो बात रू - ब- रू हो के नहीं कह सकता हूँ . वही सच मैं पत्र के द्वारा कह रहा हूँ . तुम्हारे अतीत के साक्षी सुनहरी स्मृतियों के दस्तावेज की धरोहर तुम्हें सौंप रहा हूँ . बिटिया ! भारतीय संस्कृति में माँ को परिवार की धुरी कहा जाता है और पिता को धन कमाके परिवार को आर्थिक संबल देना , अर्थ सत्ता का नियंत्रण करना आदि काम बताया है . बेटी के प्रसंग में संस्कृत में श्लोक है - " पुत्रीती जाता महतीत चिंता , कस्यै प्रदेयती महान्वितर्क : . दत्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति , कन्या पितृत्वं खलु नाम कष्टम . " अर्थात पुत्री का जन्म असीम चिंता का विषय है . किससे विवाह होगा , किस वर का चयन करना होगा . कन्या विवाहोपरांत सुख पा सकेगी या नहीं . इसके अलावा माता- पिता को बेटी की सुरक्षा की चिंता और आर्थिक कारण भी सताते हैं . सच में एक पिता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि लडकी का पिता होना कितना कष्टदायक है ? तुम्हारे प्यारे बचपन का कारवाँ मेरी नजरों के सामने गुजर रहा है . तुम्हारी पैदाइश भारत की आर्थिक राजधानी ,औद्योगिक , सामाजिक , सांस्कृतिक , साहित्यिक , आध्यात्मिक , लोक कला , बालीबुड की महानगरी गोरेगाँव , मुम्बई में हुयी थी . भरा - पूरा परिवार दादा - दादी , चाचा , बुआ की गोद में आँखें खोली . तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें अपनों का प्यार मिला जो रिश्तों की बुनियाद होते हैं . तुम लक्ष्मी , सरस्वती , दुर्गा का रूप धर के हमारी जीवन की बगिया को महकाने आयी . तुम्हारा हँसना , खिलखिलाना , रोना आदि बड़ा मोहक लगता था . लेकिन तुम्हारी पुराने ख्यालों वाली दादी - दादा के चेहरे पर पोती होने की खबर ने शिकन ला दी थी और तुम उन्हें बोझ लगी थी . प्रगतिशील भारत में यह कैसी उपेक्षित , बीमारू सोच है . क्या संवेदनाओं का स्तर इतना गिर गया है कि प्रसव वेदनाओं को सह कर गोद में में आयी माँ की संतान तो जिगर का टुकड़ा होती है . हाँ हिमानी ! तुम हमारा प्यार हो , जिगर का टुकड़ा हो . हिमानी नाम तुम्हारा भी ख़ास है . हिमालय की तरह बर्फीली और ईश का उपहार हो . आधी आबादी का प्रतिनिधित्वकारी सशक्त हस्ताक्षर हो . महिला शब्द का शाब्दिक अर्थ करें तो मही का अर्थ पृथ्वी को हिला देने वाली . जिन्दगी के सफर में अब संघर्षों का दौर आँधी बन आया . घर में मैं सबसे बड़ा होने के कारण श्रवण कुमार बन माता - पिता की जिम्मेदारी बहन की शादी का दायित्व था . पिताजी कपड़ा मील में समय से पहले ही सेवा निवृत होगये . क्योंकि मुम्बई की उस समय सारी कपड़ा मील बंद हो गयी थीं , लोग बेरोजगार हो गये थे . इस सदमे से पिताजी बीमार रहने लगे . उनकी सेवा , दवाइयों में पैसा बहने लगा . आर्थिक हालत गिरने लगी . वहीं ' अँधेरी ' मुम्बई में ' नेल्को कम्पनी ' में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था . आफिस जाने का सुबह का ८ बजे का वक्त निश्चित था . रात में ८ - ९ बजे वापस आना होता था . तुम्हारी अच्छी परवरिश , स्वस्थ जीवन , चरित्र निर्माण के लिए नैतिक मूल्यों को संस्कार में लाना , सर्वांगीण विकास , तुम्हारी पढ़ाई की जिम्मेदारी तुम्हारी माँ के कंधों पर आ गयी . मुझे घर की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए नौकरी के प्रति १०० % पूर्ण रूप समर्पित रहा था . जबकि संसार में पिता ही ऐसा निस्वार्थ रिश्ता होता है जो संतान की उन्नति , भविष्य बनाता है , शिक्षक और मार्गदर्शक भी है . जीवन एक जटिल पहेली लगने लगा . तुम्हारी प्रारंभिक शिक्षा यानी कक्षा पहली के लिए एडमिशन फ़ार्म लेने के लिए रात भर जागकर स्कूल के मैदान में अगले दिन सुबह तक के लिए लाइन लगानी पड़ती थी . तब जाकर खुशकिस्मत लोगों को दाखिला फ़ार्म मिलता था . में भी भाग्यशाली था तुम्हारे लिए ' विवेक विद्यालय का फ़ार्म मिल गया . तुम्हारी विद्या का श्री गणेश हुआ . जीवन की पाठशाला की वर्णमाला का पहला अक्षर ज्ञान तुमने अपनी माँ से सिखा . तुम्हारी तर्क शक्ति , विलक्ष्ण प्रतिभा की प्रशंसा सभी करते थे . तुम अव्वल आके शिक्षा के सौपान चढ़ने लगी . हिंदी अंग्रेजी , मराठी जैसी विविध भाषा बोलना इन भाषा की किताबें की कहानियाँ , कविता तुम्हारा मित्र बन मार्गदर्शन करती थीं . तुमने माँ से ज्यादा मुझ पर अपना प्यार लुटाया . तुम्हें एलिफेंटा , जुहू ,चौपाटी पर समुद्र की लहरों पर खेलना बढ़िया लगता था . यहाँ पर तुम्हें अंग्रेजी , हिंदी के शब्द भंडार को खेल -खेल में सीखा खूब बढ़ाता था . जो मनोरजन के साथ ज्ञानार्जन था . मुम्बई मेट्रोपोलिटन होने के कारण विविध भाषा , जाति, धर्म संस्कृति लोगों के बीच दीवार न हो के पुल का काम करती है . यहाँ सब एक दूजे के त्यौहार मनाते हैं . तुम्हें सबके साथ खुशियाँ , मिठाई बाँटना अच्छा लगता था . जैसे - जैसे तुम उम्र के पायदान पर चढ़ रही थी . वैसे ही कंपनी की प्रगति , अपने प्रमोशन के लिए मुझे देश - विदेश में कई महीनों के लिए बाहर दौरों पर जाना पड़ता था . मेरी भाग -दौड़ , परेशानी को तुम्हारी माँ ने समझ हिम्मत हौंसले से मेरा साथ दिया . तुम्हारी पढ़ाई के प्रति प्रतिबद्धता , दृढ निश्चय , लगन , कड़ी मेहनत , ईमानदारी से बीडीएस में अव्वल आ के दाँतों के डाक्टर बनने का सपना साकार किया . हमारे खनदान में पहली डाक्टर बनी . हमारी खुशी का ठिकाना न था . पारिवारिक विरोध के बावजूद तुम्हारे उन्नत भविष्य के लिए एमडीएस की तैयारी करवायी और सौभाग्य से तुम पहली बार में ही प्रीलियम में सलेक्ट होगयी । मैं तुम्हें एमडी. एस ( मास्टर आफ डेंटल सर्जन ) की पढ़ाई के लिए ' कृष्ण देव राय दंत चिकित्सा महाविद्यालय , बंगलुरु ' में ले गया , जहाँ तुम्हें मेरिट में स्थान मिला .तुम्हारे साथ डीन से मिला . तीन साल के लिए वहाँ के छात्रावास में रहकर पढ़ाई के लिए सूरज की तरह तपकर एमडी . एस की डिग्री लिए दाँतों की डॉक्टर बनकर घर पर आ गयी . तुमने अपनी प्रतिभा से भारतीय समाज की बेटी बोझ है की मानसिकता को तोड़ा ."बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ "की मिसाल बनके तुम ' बीआरसी ' मुंबई में डाक्टर बन के समाज में आग्रणीय भूमिका निभा के आर्थिक रूप से सशक्त , स्वावलंबी बनी . हम भाग्यशाली हैं हमें दहेज का दानव का सामना नहीं करना पड़ा . तुम्हारे जीवनसाथी एमडीएस डॉक्टर ने हमसे खुद तुम्हारा हाथ माँगा . बेटी हमें तुम पर गर्व है कि पीड़ित , वंचितों की मसीहा बन उनकी निःशुक्ल सेवा कर रही हो । तुम दोनों भारतीय समाज की आन - बान - शान हो . ,तुम दोनों को हमारा आशीर्वाद , फलो -फूलो और सदा खुश रहो तुम्हारा पिता स्वतंत्र गुप्ता लेखिका -


- माँ मंजु गुप्ता वाशी , नवी मुंबई ।

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