मां का दिल
करुणा दीदी अपने नाम के स्वरूप ही करुणामयी थीं।
मोहल्ले में सभी के सुख दुःख में हमेशा साथ होतीं।दो बेटों ,बहुओं ,पोते पोतियों से भरापूरा परिवार था।
सभी से उन्हें इतना प्यार मिला कि वैध्वय है अहसास उन्हें कभी नही हुआ।अब उम्र भी बढ़ी जा रही थी,बुढापा शरीर को थकाने लगा था।
उन्होंने सोचा क्यों न मकान का बंटवारा दोनो बेटों में कर दूं ।मेरे मरने के बाद विवाद न होगा और सभी खुशहाल रहेंगे ।
उन्होंने जल्दी ही मकान के दो हिस्से कर दिए।
लेकिन इसके बाद वही हुआ ,जो उन्होंने सोचा भी न था।सभी के बदले रंग नजर आने लगे ।उनकी रोटी के लिए बहुओं में बहस होने लगी ,जो उन्हें भीतर तक दुखी कर देती।पर अब क्या हो सकता था।
काश उन्होंने दिल की न सुनकर दिमाग से काम लिया होता।लेकिन इंसान अपने दिल के टुकड़ों के प्यार में अपना ही नुकसान कर बैठता है।करुणा की करुण कहानी अब शुरू हो चुकी थी।
अचला गुप्ता
इंदौर

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