*प्रेम पत
*एक पत्र पिता के नाम*
पूज्य बाबूजी, सादर नमन ।
बाबूजी हम सब यहाँ सकुशल हैं और हमारी कुशलता में ही तुम्हारा सुकून है यह मैं जानती हूँ । अभी यहाँ पर कोरोना नामक महामारी ने तांडव मचा कर रखा है 21 दिन के लाॅकडाउन में सब घर में बंद है। कभी-कभी एक अनजाना-सा डर लगता , जाने क्या हो? सभी लोग मानसिक अवसाद में घिरे हुए हैं आज तुम हमारे साथ होते , तो कितनी हिम्मत देते। एक वट वृक्ष की तरह अपनी बड़ी शाखाओं से हम स्नेह की छाया करते । तुम तो जानते हो, मैं बहुत जल्दी डर जाती हूँ तुम्हारा लाड़ कितनी हिम्मत देता था मुझे आज तुम्हारी कमी को सबसे ज्यादा शायद मैं ही महसूस कर रही हूँ । भैया की जब से बायपास सर्जरी हुई है, तब से चिंता बनी रहती है और फिर इस खतरनाक महामारी के समय तो चिंता स्वाभाविक है न ! तुम्हारे रहते शायद मैं बेफिक्र रहती । बाबूजी तुम हमेशा मुझसे यही कहते थे न कि दो-चार दिन चिट्ठी लिख दिया करो, ताकि समाचार मिलते रहें। पर क्या करूँ आजकल चिट्ठी लिखना छूट ही गया है। एक पुरानी अधूरी चिट्ठी आज मेरे हाथ लगी जिसे मैने शुरू तो किया था, पूरा नहीं कर पाई थी । आज बहुत अफसोस होता है कि तुम्हें , अपनी चिट्ठी की प्रतीक्षा ही कराती रही । आज बहुत लिखने का मन हो रहा बहुत सारी बातें तुम्हे बताना चाहती हूँ पर आँखें डबडबा रही हैं शब्द ठीक से दिख नहीं रहे, धुंधले पड़ । तुम्हारी बहुत याद आती है, बाबूजी । अगली चिट्ठी जल्दी लिखूँगी । पर बाबूजी इस चिट्ठी को मैं किस पते पर भेजूँ , तुम्हारा पता तो ---। आशा है तुम्हारी आत्मा मेरी इस भावना को समझ लेगी, क्योंकि कहते हैं कि मृत्यु के बाद भी माता-पिता की आत्मा अपने बच्चों के आसपास ही होती है----। है न !
तुम्हारी लाड़ली वंदना ।

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