Monday, March 18, 2019

होली

शारदा मिश्रा
गोरी  के  ये लाल लाल,  गाल  है गुलाल  से।
या शर्म  से  गाल  हो  , रहे रतनारे है ।
ऋतु  भगोरिया  की  है  , या प्रीत  का है  ये गुबार ।
कौन  बात  है  जो  सखी, गौरी  शरमाती  है।।

टेसू फूले  बाग  में  ,या कोई  विरहिणी  जले ।
लालिमा  सी देखो, चहुदिश कैसी छायी  है ।
प्रियतम  की  आस  है, या प्रीत  की है  ये  गुहार ।
कौन  बात  है  जो  सखी, गोरी  अकुलाती है ।।

चांदी  के गहनों  से  सजे, गोदने  गुदे हैं  माथ ।
रूपसी  बालाएं  चली  आइ, इठलाती  है ।
सखी  छेड  छेड  कहे ,कहाँ  तेरा  प्रियतम  ।
कौन  बात  है  जो  सखी, ढूढे न मिलत  है  ।।

होली  की  शुभकामनाएं
शारदा  मिश्रा

4 comments:

  1. यह सामर्थ है कवित्री का कि उन्होंने होली को रंग से नहीं जोड़ा बल्कि यह बताया कि होली रंग से कैसे जुड़ी ,होली रंग तक कैसे पहुंची .
    मानव मन प्रकृति और परम्परा को कैसे जोड़ता है .
    उनकी रचना का यह सहज लेकिन गंभीर भाव है ,इस रचना यूँ तो रसपूर्ण है किन्तु भाव के साथ गहरी परिपक्वता है .
    बहुत बहुत शुभकामनाये शारदा जी आपको .💐💐🙏🏻

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  2. यह सामर्थ है कवित्री का कि उन्होंने होली को रंग से नहीं जोड़ा बल्कि यह बताया कि होली रंग से कैसे जुड़ी ,होली रंग तक कैसे पहुंची .
    मानव मन प्रकृति और परम्परा को कैसे जोड़ता है .
    उनकी रचना का यह सहज लेकिन गंभीर भाव है ,यह रचना यूँ तो रसपूर्ण है किन्तु भाव के साथ गहरी परिपक्वता है .
    बहुत बहुत शुभकामनाये शारदा जी आपको .💐💐🙏🏻

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  3. शरदा जी आपने कल्याण आदिवासी लड़की की भावनाओं को बहुत ही सुंदर तरीके से चित्रित किया है कविता में आपका आदिवासी संस्कृति से जुड़ाव सहज परिलक्षित होता है
    बहुत-बहुत साधुवाद की पात्र हैं आप

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