एक पेड़ था
बोगनवेलिया....
काग़ज़ी फूलों का...
कोई खुशबू नही.....
बिना देखरेख के बढ़ता रहता..
पर कितना सुंदर लगता था...
उस घने पेड़ में
गौरैया का घोंसला था...
सुबह सुबह पेड़ भर जाता था
चिड़ियों से.....
उस पर टांग दिया था
एक छिका ....
जिसमें रख दिया करते थे
दाना और पानी....
चीं-चीं ची-चीं चिड़ियों की
भर देती थी,
उन क़ाग़जी फ़ूलों मे जान...
आने लगती थी भीनी भीनी खुशबू....
सारा दिन चहलपहल रहती
कितना सुंदर दृश्य होता था....
फिर एक दिन
घर ले आए कार....
और उजड़ गया आशियाना....
बिखर गया आबदाना....
चहचहाहट गुम हुई
कार की भर्राहट सुनाई देती है....
भीनी भीनी खुशबू नही
धूल धुंए की धुंध दिखाई देती है....
बिजली के तार पर बैठी
अपने घोंसले और दानापानी को
खोजती सजल आँखों से
वह गौरैया दिखाई देती है......
*नम्रता सरन "सोना"*
बोगनवेलिया....
काग़ज़ी फूलों का...
कोई खुशबू नही.....
बिना देखरेख के बढ़ता रहता..
पर कितना सुंदर लगता था...
उस घने पेड़ में
गौरैया का घोंसला था...
सुबह सुबह पेड़ भर जाता था
चिड़ियों से.....
उस पर टांग दिया था
एक छिका ....
जिसमें रख दिया करते थे
दाना और पानी....
चीं-चीं ची-चीं चिड़ियों की
भर देती थी,
उन क़ाग़जी फ़ूलों मे जान...
आने लगती थी भीनी भीनी खुशबू....
सारा दिन चहलपहल रहती
कितना सुंदर दृश्य होता था....
फिर एक दिन
घर ले आए कार....
और उजड़ गया आशियाना....
बिखर गया आबदाना....
चहचहाहट गुम हुई
कार की भर्राहट सुनाई देती है....
भीनी भीनी खुशबू नही
धूल धुंए की धुंध दिखाई देती है....
बिजली के तार पर बैठी
अपने घोंसले और दानापानी को
खोजती सजल आँखों से
वह गौरैया दिखाई देती है......
*नम्रता सरन "सोना"*

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