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| शोभा रानी तिवारी |
तुम बिन मांग सूनीहुई,
सूना दिन सूनी रात ,
आंखें गंगा जमुना बहती ,
बुझ गई सारी मन की आस ,
रंगीन दुनिया बेरंग हुई ,
अपने मन को बहलाऊँं कैसे ?
किसे रंग लगाऊँ सजनवा ?बताओ होली खेलूं कैसे ?
कहा था होली पर आऊंगा ,
सब के लिए कुछ ना कुछ ना ,लाऊंगा ,
मुन्नी के लिए गुड़िया,
तुम्हारे लिएचूड़ियां लाऊंगा ,
आए तो तीन रंग में लिपटे ,
मन को ढांढस बंधाऊँ कैसे?
मैं होली खेलूं कैसे ?
पापा तो जैसे पत्थर हो गए ,
शून्य में देखा करते हैं,
उदासी चेहरे पर छाई ,
मुंह से कुछ ना कहते हैं ,
गर्व है शहादत पर उनके,
पर दिल को समझाऊं कैसे ?
मैं होली खेलूँ कैसे ?
मैं होली खेलूँ कैसे?

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