Monday, March 18, 2019

रूठे घर के कहकहे

जब से मकान बने हैं
घरों के कहकहे रूठ गए हैं
इस अंधी दौड़ में
सारे अपने पीछे छूट गए हैं
होली दिवाली पर पहले लोग मिलते भी थे
मोबाईल पर फौरवर्ड कर अब सब
उस ज़हमत से भी
बरी हो गए हैं

एक वक़्त था,
जब रसोई में से सुगंधें आती थीं
चाची ताई बुआ दादी
मिलकर अचार बनाती थीं
अब तो बस ऑर्डर करने के लिए
होटलों का नम्बर ढूंढ़ते नए हैं
अड़ोस पड़ोस की कटोरी की जगह
टेक अवे वाले खड़े हो गए हैं

एक ही कमरे में गद्दे डाल कर
सब मटरगश्ती करते थे
कैरम लूडो की बाज़ियाँ होती थीं
अन्ताक्षरी में नए सुर निकलते थे
अब दीवारों को ताँकते हैं
गुमसुम पड़े रहते हैं
अपने अपने कमरे के, अब चोंचले बड़े होते हैं

शादी ब्याह में हज़ारों रस्में होती थीं
हर तरफ़ गुलज़ार ख़ुशियाँ होती थीं
देवरों और सालियों के लफड़े बड़े होते थे
एक शादी में अगली शादी के बीज पड़े होते थे
अब तो नाते रिश्तेदार ही ख़त्म हो गए हैं
जब से दस्तखत से रिश्ते जुड़ गए हैं

घूमने के लिए चिड़ियाघर ही सही
पूरा परिवार साथ जाता था
लड्डू मठरी पूरी सब्ज़ी में
पिकनिक का मज़ा आता था
अब वैकैशन होती हैं
सिंगापुर मलेशिया से नीचे बात नहीं होती है
फ़ोटो खिंचते हैं, पर सारी सेल्फ़ी ही होती हैं

बड़े बूढे़ जब गुज़रते थे
तो दुःख में भी परिवार साथ होता था
बिना हल्दी छौंक के खाने में
आशीर्वाद और स्वाद,
दोनों का अंबार होता था
अब मातमपुर्सी फ़ोन पर होती है
गुज़रने की ख़बर अख़बारों से मिलती है

हाँ! हम मोर्डन हो गए हैं
चाँद से आगे निकल पड़े हैं
१०० करोड़ की आबादी में भी
हम सब अकेले खड़े हैं
कोई हमदर्द नहीं है,
सिर्फ़ मतलब तक के हैं
प्यार अपनापन रिस चुका है
अब हम जेब में,
सिर्फ़ ग़ुरूर रखते हैं

ऐसा ही रहा तो जल्द ही हम रोबोट बन जाएँगे
आँसु हँसी शर्म लिहाज़,
कुछ भी महसूस नहीं कर पाएँगे
चार कंधों के लिए भी कोई मौजूद नहीं होगा
मरेगा बाद में,
पहले ख़ुद के लिए इंसान
एक क़ब्र खोद रहा होगा

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