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| शारदा मिश्रा |
या शर्म से गाल हो , रहे रतनारे है ।
ऋतु भगोरिया की है , या प्रीत का है ये गुबार ।
कौन बात है जो सखी, गौरी शरमाती है।।
टेसू फूले बाग में ,या कोई विरहिणी जले ।
लालिमा सी देखो, चहुदिश कैसी छायी है ।
प्रियतम की आस है, या प्रीत की है ये गुहार ।
कौन बात है जो सखी, गोरी अकुलाती है ।।
चांदी के गहनों से सजे, गोदने गुदे हैं माथ ।
रूपसी बालाएं चली आइ, इठलाती है ।
सखी छेड छेड कहे ,कहाँ तेरा प्रियतम ।
कौन बात है जो सखी, ढूढे न मिलत है ।।
होली की शुभकामनाएं
शारदा मिश्रा

यह सामर्थ है कवित्री का कि उन्होंने होली को रंग से नहीं जोड़ा बल्कि यह बताया कि होली रंग से कैसे जुड़ी ,होली रंग तक कैसे पहुंची .
ReplyDeleteमानव मन प्रकृति और परम्परा को कैसे जोड़ता है .
उनकी रचना का यह सहज लेकिन गंभीर भाव है ,इस रचना यूँ तो रसपूर्ण है किन्तु भाव के साथ गहरी परिपक्वता है .
बहुत बहुत शुभकामनाये शारदा जी आपको .💐💐🙏🏻
यह सामर्थ है कवित्री का कि उन्होंने होली को रंग से नहीं जोड़ा बल्कि यह बताया कि होली रंग से कैसे जुड़ी ,होली रंग तक कैसे पहुंची .
ReplyDeleteमानव मन प्रकृति और परम्परा को कैसे जोड़ता है .
उनकी रचना का यह सहज लेकिन गंभीर भाव है ,यह रचना यूँ तो रसपूर्ण है किन्तु भाव के साथ गहरी परिपक्वता है .
बहुत बहुत शुभकामनाये शारदा जी आपको .💐💐🙏🏻
शरदा जी आपने कल्याण आदिवासी लड़की की भावनाओं को बहुत ही सुंदर तरीके से चित्रित किया है कविता में आपका आदिवासी संस्कृति से जुड़ाव सहज परिलक्षित होता है
ReplyDeleteबहुत-बहुत साधुवाद की पात्र हैं आप
वाह।।।
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