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| मालवेंद्र बधेका नारायणी।माया |
भरी गई फूला से डाल डाल।
फागण को यो महिनो आयो।
गौरी ने बांका को मन हरषायो।
पान को बीड़ो,निभय या रीत।
पर अबे म्हारी या नी है जीत।
सजन सांची कहूं जिया की।
आखर ज्ञान
भगोरिया की भागमभाग।
जगावे सजन गौरी का भाग।
पण अब जदे ज खिलेगा फूल।
पेला ज समझा एक दूजा की भूल।
जुना जमाना की रीत सोमणी लागे।
पण अबे जमानो गयो घणों आगे।
भणी लखी काम करा देस के संग।
जद चढ़े जीवन में भगोरिया को रंग।
🙏प्रेषिका
माया (नारायणी) मालवेन्द्र बधेका
स्वरचित

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