Sunday, March 3, 2019

महिला दिवस सच्चे अर्थो में



 मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

सास-बहू के बीच होती न कोई खटपट
न डांट-डपट न कोई
 छल-कपट
हमारे सिर पर दुआओं के हाथ रखती है
अपने अनुभव से हर कष्ट मेरे हरती है

मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां करामाती है

मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

पराये घर की है
तू अपनी नहीं है
तू बहू बन के रह
तू बेटी नहीं है
ऐसा कोई ताना नहीं
मिला है उसे
गृह लक्ष्मी का दर्जा
मिला है उसे

मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में मेरी पत्नी मुस्कुराती है
मैं मनाता हूं महिला  हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

अपने सपनों की ऊंची वो उड़ान भरे
जो वो करना चाहे
हर वो काम करे
नहीं छेड़ता अब कोई सरे राह उसे
घर में मिलता है
बेटों सा सम्मान उसे

मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में मेरी बेटी मुस्कुराती है
मैं मनाता हूं महिला  हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

जागी नींद से और देखा आंख मल मल के
ये तो सपना था मेरा
सोचा मेंने विस्मय से
काश सच हो जाए सपना मेरा झट से
फिर "ओमप्रिया" भी कहे  ये जन जन से

मैं मनाती हूं महिला दिवस हर रोज  क्योंकि मेरे देश की हर नारी  मुस्कुराती है

मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

ये स्वप्न है मेरा, पर
साकार मिलके कर ना है
निष्ठा,समर्पण की
की ऊंची उड़ान भरना है
साथी बनकर अपने जीवन को बेहतर करना है
महिला दिवस सच्चे अर्थों में हासिल करके कहना है

हम मनाते हैं महिला दिवस हर रोज  क्योंकि मेरे देश की हर नारी  मुस्कुराती है
मैं मनाता हूं महिला दिवस हर रोज
क्योंकि मेरे घर में
 मेरी मां मुस्कुराती है

.........
डॉ अर्चना श्रीवास्तव
"ओमप्रिया"

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