Tuesday, July 21, 2020

मानव

 मानव 
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हे माानव तू कठनाई से 
तु जमी पर आया है
नारायण ने नर देह दी
अब क्यु रोता है
बन्द आखें खोल
नाम ले नारायण का
हे मानव तु म्रत्यु लोक में आया
नर देह पाई
ग्रहस्थ आश्रम की गाड़ी पर बेठ
तिरछी चला या सीघी 
सबका पालन पोषण कर
किसी का कुछ मत बिगाड़
सबसे ले भलाई
नाम नारायण का भज
अकेला आया है अकेला जावेगा
साथ कुछ न ले जावेगा
सांस सांस का लेखा  जोखा भर
पुन्य की करले कमाई
नर से नारायण बन जावेगा
चैतन्य में मिल जावेगा
मरन जिवन से छुट जावेगा
फिर न आयेगा
नाम भज ले नारायण का

         *  प्रभा तिवारी

2 comments:

  1. बहुत ही अच्छी कविता है,जीवन केसे जिना अचछे से बताया।

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