चूड़ियाँ स्त्री सी होती है.....अपने हर रंग-रूप को जीती हैं मरती हैं टूटती हैं....टूटकर भी कभी दीवार पर टँगती तो कभी खेल-खिलौने में शामिल होती....
रंग-बिरंगी काँच की चूड़ियाँ हमेशा से ही मेरे आकर्षक का केंद्र रही....बचपन में हर महीने घर पर चुड़िहारिन आती और घर की स्त्रियां पहन लेती अपनी पसन्द की चूड़ियाँ पर मैं हमेशा से ही हरी प्लेन चूड़ियाँ लेती...
आज भी हरी चूड़ियों के मोह में अपने आप को बंधी पाती हूँ....शादी के बाद मेरे श्रृंगार का अहम हिस्सा चूड़ी मुझे बहुत सन्तोष देता...पति के नोक-झोक में शिकायत करती चूड़ियाँ.... प्रेम में शर्माती चूड़ियाँ... बच्चों को डाँटने में टूटकर बिखरी चूड़ियाँ...... पर जितनी चूड़ियाँ टूटती उससे चार ज्यादा चूड़ियाँ मेरे हाथ में अगले दिन मुस्कुराती मिलती......ड्रेसिंग टेबल पर करीने से सजाकर रखी चूड़ियाँ, मेरे एकांत की सहेली होती जो मुझे जीवन में हर रिश्तें की गरिमा उसकी सीमा रेखा के बारे में बताती रहती...तभी तो वो मेरे बेहद करीब रहती......मेरी हर साड़ी के साथ उसकी मैचिंग चूड़ी ढूंढ़ने की जिम्मेवारी पति महोदय बखूबी निभाते रहे....मुझे याद नही कि कभी कोई चूड़ी चार दर्जन से कम ली होगी उन्होनें....चूड़ियों से सजा हाथ हमेशा से मुझे भाता रहा और उन्हें लुभाता.......धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता गया और हाथ में चूड़ियों की गिनती कम होती गई....और आज हाथ में काँच की चूड़ियों के स्थान पर मेटल के दो कड़े डले हैं...जो शायद मेरे स्टेटस को सूट करता हैं.....चूड़ियों से भरे हाथ को देखकर लोग ग्वार तक कहने से नही चूकते थे....खैर किसी के कहने के चक्कर में कभी पड़ी ही नही.....हाँ समय के साथ जिम्मेवारियां बढ़ी....कम्प्यूटर के कीबोर्ड को मेरी चूड़ियों से सबसे ज्यादा दिक्कत रही....मेरी मौजूदगी का खुलेआम ऐलान करने वाली मेरी चूड़ियाँ ऑफिस में काना-फूसी का मुद्दा तक बनी....कम बोलती ज्यादा सुनती....आखिरकार एक दिन दो कड़े डाल खुश होने का प्रयत्न करने लगी वही दूसरी तरफ हाथ की उतरी चूड़ियाँ अपने पलायन की ओर मुड़ने लगी......पर अब भी सावन में हरी चूड़ियाँ दर्जन भर ना पहनूं......ऐसा तो हो ही नही सकता.....
*प्रतिभा श्रीवास्तव अंश
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