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| पूजा पारवाल |
ये वो मौसम है, जिसमें है मस्ती मस्त फुहारों सी।
भीगे मन खुशियों की बूंदों से
जो होती हैं
, बिंदास बहारों सी।
प्रकृति करती है सिंगार,गाती है सरगम
मत पूछो हाल नदियों का,जो करती हैं छम-छम।
बरसता है जब मनमौजी सावन
मन मयूर करता है नृत्य मनभावन।
बागों में झूले पड़ जाते हैं
जब ये बदरा उमड़ घुमड़ के आते हैं।
मंदिरों में ढोल नगाड़े बजते हैं
हर गली शिवालय सजते हैं।
रंग-बिरंगी राखियों से सजते हैं बाजार
कहीं मिठाई,
कहीं चाकलेट और कहीं उपहार।
मन हो,उपवन हो या हो घर का आंगन
हरी भरी हो जाती धरती
जब जब आता है सावन।
पर ये कैसा सावन है आया?
हर तरफ है,दहशत का साया
कुछ ऐसा हुआ कोरोना का वार
फीके हो गये सब त्यौहार
वक्त है नाज़ुक मगर, भावनाएं रखनी होंगी
मजबूत
पीना होगा बेबसी का ये कड़वा घूंट।
भरोसा है यही कि
अपनों के साथ,
ये विकट समय भी गुजर जाएगा।
और फिर से खुशरंग सावन अपना असली रंग दिखाएगा।
* स्वरचित कविता
पूजा परवाल

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