Tuesday, July 7, 2020

वस्त्र विहीन धरा
(एक दु:स्वप्न)
 मेरे दु:स्वप्ननों  की है लंबी फेहरिस्त 
नहीं लेती यह थमने का नाम
 सुखी रेत की नदी से मैं ,
 पहुंच गई मेरे शहर के उद्यान,
पेड़ अभी  यूं ही खड़े थे,
   पत्ती  विहीन ठूंठ से अड़े थे ।
सूखी झाड़ियां छितरी थीं ।
दूर-दूर बस सुनसान 
मैं आवाक ! जब प्राण  वायू दाता  ही ना रहे, तो कैसे बचेंगे प्राण ।
कभी हरी-भरी फल -फूलों से,
 आच्छादित थीं, नदी की ये वादियां ।
कलरव पंछियों का , ढेरों थे जल पक्षी,
 यहां सुनती थी मैं कोयल की बोली ,
कभी झूलीथी यहां, सावन के झूले ।
याद आ गए तीजों के हिंडोले,
 और सखियों की ठिठोली,
 देखा एक शिक्षक छात्रों की टोली  को प्लास्टिक के नमूने दिखा रहे थे।
 इन्हें कहते हैं पेड़ कभी होते थे हरे-भरे, पत्तियों से आच्छादित फल फूलों से लदे ,
 अब लगते हैं ,लकड़ी के काले भूरे खंभों से। नकली पेड़ दिखा कर समझा रहे थे।
 सर पत्ती कैसी होती है, फूल किसे कहते हैं। फल क्या होते हैं,आंखें फाड़े छात्र प्रश्न पूछे जा रहे थे ।
मैंने देखे हैं ,बचपन में  सब नमूने दिखाते, गर्व से बताते ,शिक्षक  अनुभव सुना रहे थे ।
सर घास कैसी होती है ?
सुना है धरती ओढ़ धानी चुनर सुंदर लगती है। जैसे से हरी पीली साड़ी मां पर फबती है। मां ने घास के बारे में समझाया था ,
तब पापा ने मां की साड़ी को धरती पर बिछाया था ।
मास्टर बगले झांक रहे थे ,नमूना नहीं लाए थे वह घास का । इधर-उधर ताक रहे थे ।
जड़ वत चुपचाप खड़े थे ।
या देख दशा नग्न धरा कि,
 वह अनायास रो पड़े थे।
 दु:स्वप्न टूटा अचकचा कर ,
मेरी आंख खुल गई ।
 घर के सामने पार्क की हरियाली देख
 बरबस ये आंखें बरस गई।
 काश कि यह दिन देखने से हम  बच जाएं,
 पर्यावरण के लिए, हम सब सचेत हो जाएं।
 पंचोली , कोटा, राजस्थान

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