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जो सहता है वही जानता ,
क्या होती है विरह वेदना
महारोग के दारुण दुख सी
होती है यह विरह वेदना
कोई औषधि काम अाये, न
कोई लेप शान्ति दे पाये,
प्रिय-मुख-दर्शन एक दवा है
ऐसी होती विरह वेदना
दर्शन जब तक हुआ न प्रिय का
दर्शन की अभिलाष प्रबल थी
दर्शन कर के प्रियतम मुख का
दावानल हुई विरह वेदना
"बाहुपाश में ले लो अब तो
ऊँचे स्वर में चिल्लाती है
पिक, मयूर, दादुर से बढ़ कर
शोर मचाती विरह वेदना
अश्रुधार से कपोल नम हैं
रुद्ध कंठ है नयन नीर से
अाओ प्रिय मत देर करो अब
सही न जाती विरह वेदना
*डॉ. आभा माथुर*
सेवा निवृत्त प्राचार्य
ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण
संस्थान ( हाथरस )
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