मिल जाते है महाकाल साथियों सावन में ।
1,
दादुर मोर पपिहा बोले ,
धरती मां हरियाली ओढ़े,
भर जाते नदिया ताल साथियों सावन में ।
हो जाते मालामाल साथियों सावन में ।
2
भक्ति ज्ञान की बहती है गंगा
लहराता सावन में तिरंगा ,
रक्षा बंधन हर साल साथियों सावन में ।
हो जाते मालामाल साथियों सावन में ।
3
बाग बगीचों की बलिहारी ,
झूला झूल रहे नर नारी ,
सब खाते बाटी दाल साथियों सावन में ।
हो जाते मालामाल साथियों सावन में ।।
*साधना सक्सेना ,इंदौर
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