Tuesday, July 21, 2020

मालवी कविता

मालवी कविता
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काँ अई नी सकाँ
काँ जई नी सकाँ
बस मुंडो बांदीने
बेठ्या हाँ घर में

कोईने बुलई नी सकाँ
कोई का घर जई नी सकाँ
अतरो सो  मुंडो लईने
बस बेठ्या हाँ घर में

कईं बी रोनक नी री बजार में
भीड़ बी नी हे दुकान में
जिके पूछो ऊ योज बोली रियो हे
कई नी ,बस बेठ्या हाँ घर में

आँगणा में, छत पे घूमी रिया 
अचार की बरनी जेसा दिखी रिया
जेसा डागदर अपरेसन करीने अई रिया

केड़ो दूध नी पी जाय
इका वास्ते जाली से उको मुंडो बांदता था
शायद उकी सजा मिली हे
कईं नी बस मुंडो बांदीके बेठ्या हाँ घर में

स्व-रचित- अरुणा खरगोनकर, इंदौर.

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