Thursday, July 9, 2020

कहना जरुर

*......कहना  ज़रूर......*

कभी जो आये मन में कोई
बात   उसे  कहना  ज़रूर 
न करना  वक्त  का इंतज़ार 
न होना  मगरूर ।

जब  *पिता*  का किया 
कुछ दिल को  छू जाये 
तो *जाकर  गले उनके* 
*लगना  ज़रूर*।
कभी जो आये मन में कोई 
बात   उसे  कहना  ज़रूर 

बनाये जब  *माँ*  कुछ 
तुम्हारे मन का
*कांपते हाथों  को* 
*चूम लेना ज़रूर*।
कभी जो आये मन में कोई 
बात   उसे  कहना  ज़रूर 

जब अस्त व्यस्त  होके  *बीबी* 
भूल कर  खुद को 
घर  संवारती नज़र  आये
तो धीरे  से उसके कानों में 
" *बहुत  खूबसूरत  हो* "
कहना ज़रूर 
कभी  जो आये मन में  कोई 
बात   उसे  कहना  ज़रूर 

आये जूझ  कर दुनिया  से 
*हमसफर* जब भी
 *सुकून भरे कुछ  पल साथ* 
गुजारना  ज़रूर
कभी  जो आये मन में  कोई 
बात   उसे  कहना  ज़रूर 

*बच्चों* को  लगा कर गले 
जब तब 
*व्यस्त  हूँ  पर दूर नहीं*
*इक पल भी* 
ये बतलाना  ज़रूर ।
कभी जो आये मन में
कोई  बात   
उसे  कहना  ज़रूर 

जड़ें  कितनी भी गहरी  हों 
*रिश्तों* की सीने में 
पनपते रहने की खातिर
वक्त वे वक्त 
*इज़हार की बौछार*
*करना ज़रूर*
कभी  जो आये मन में  कोई 
बात,  उसे  कहना  ज़रूर 

नहीं  भरोसा  वक्त  का  
साथ किसी  का कब  
छूट  जाये 
कोई *दोस्त* न जाने  
कब रूठ  जाये 
*तबादला  हो जाये दिल या*
*दुनिया  से किसी  का*
उससे  पहले  दिल की बात 
पहुंचाना ज़रूर ।

न करना  वक्त का इंतज़ार 
न होना मगरूर 
कभी जो आये , मन में 
कोई बात उसे 
*कहना ज़रूर*

*नूतन 

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