विषय:-प्रिय की प्रीत
शीर्षक:- प्रीत निराली
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प्रिय की प्रीत है सबसे निराली,
देख उसे चाल हो जाती मतवाली।
मनभावन लागे सावन की रिमझिम बारिश,
न करते प्रेम में कभी मुझ संग साजिश।
प्रिय की प्रीत है सबसे निराली,
रोम-रोम झलकता कबीर दोहावली।
हर मुश्किल कर देते हैं आसान,
होठों मुस्कान न रहते कभी परेशान।
प्रिय की प्रित है सबसे निराली,
पिलाते सदा प्रेम भरी प्याली।
फूलों से करें मेरा दिव्य श्रृंगार,
चाँदनी शरमाए जब करें प्रेम वार।
प्रिय की प्रीत है सबसे निराली,
मधुर मिलन की बेला में झूमती दीपाली।
खिल उठता है मेरा कोमल काया,
सुध बिसरायी रहे न सांसारिक माया।
*रीतु प्रज्ञा
दरभंगा, बिहार
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