Tuesday, July 21, 2020

अमृत धारा सखियो की टोली





 

अंग—अंग में रूप रंग है 
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 सुरेश चन्द्र शौक़

 सुरेश चन्द्र शौक़ » आँच »

अंग—अंग में रूप रंग है,सोज़ो—साज़ है, मौसीक़ी है
तेरा सरापा है कि ख़ुदा ने एक मुरस्सा नज़्म कही है

अपने ज़िह्न के हर गोशे में तुझको पया है नूर—अफ़शाँ
अपने दिल की हर धड़कन में मैंने तिरी आवाज़ सुनी है

तन्हा रहने पर भी मैंने तन्हाई महसूस नहीं की
मेरे साथ हमेशा तेरी यादों की ही बज़्म रही है

सूरज ढलता है तो तेरी याद के दीपक जल उठते हैं
मेरे दिल के शहर की हर शब दीवाली की शब होती है

सोये अरमाँ जाग उठते हैं ,कितने तूफ़ाँ जाग उठते हैं
सावन भादों की रिम—झिम तन—मन में आग लगा जाती है

ज़िक्र करूँ क्या तेरे ग़म का ,तेरे ग़म को क्या ग़म समझूँ
तेरा ग़म वो नेमत है जो क़िस्मत वालों को मिलती है

आओ ऐसे में खुल जाएँ , एक दूसरे में घुल जाएँ
फ़स्ल—ए—गुल है जाम—ए—मुल है, तुम हो मैं हूँ, तन्हाई है

शौक़ बारहा सोचा उनसे जो कहना है कह ही डालूँ
लेकिन वो जब भी मिलते हैं दिल की दिल में रह जाती है.

===========


 बिछड़ी प्यार की धड़कने
आँखों में नमी दे
बन्द राहों की उलझनें जीने न दे
वो खामोशियाँ भी इश्क़ को ही तलाशे
कुछ अनकही सी ख्वाइशें
दिल तो छुपा दे ये मोहोब्बत
कैसा जो अंग अंग लुटा न दे……
=================




धड़कन

जिंदगी का सफर 
कुछ इस तरह चल पड़ा
ना तुम हमको भूल पाए
 ना हम तुम्हें
जब भी तन्हा बैठे हो 
चली आती  हैं याद तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान होठों 
करती है बसेरा अपना पर 
दिल भी अपने उपस्थिति दर्शाता है
शरीर भी कापता है
अंग अंग धड़कने लगता है

डॉक्टर दीपिका राव बांसवाड़ा राजस्थान
=====
: वैसे अंग अंग नहीं 
दिल धड़कता है 
अंग अंग तो फड़कता है
पर जहां न पहुंचे रवि
 वहां पहुंचे कवि😉🌹
: *दोहा*

दिल की धड़कन तो सुनी,
सबने लाखों बार।
पर अंगों का धड़कना,
हमें नही स्वीकार।
*प्रीत* जी करो समीक्षा।
यही हम सब की इच्छा।
😊😍😄😄

डॉ सुषमा
कानपुर
=====
@⁨PRIYANKA सोनी⁩
: *दोहा*

दिल की धड़कन तो सुनी,
सबने लाखों बार।
पर अंगों का धड़कना,
हमें नही स्वीकार।
*प्रीत* जी करो समीक्षा।
यही हम सब की इच्छा।
😊😍😄😄
@
डॉ सुषमा
कानपुर
=====
 जाही बिध राखे रामताही बिध रहिए
जीवन मे सुख दुख आते रहते है
व्यक्ति घबरा जाता है।यदि उसे
ईश्वर पर सच्ची आस्था है तो वह
कभी नही घबराएगा क्योकि वह
जो भी करेगा अच्छा ही करेगा।

डाॅप्रभा गुप्ता आगरा
=========
 दिल
      दुनिया का सबसे 
             खूबसूरत म्यूजिक
      अपने  दिल की 
            हार्डबीट्स है
       क्योकि इसे
             भगवान ने खुद
       कंपोज किया है
           सदा दिल की सुनिए 

    लता सिंघई ,अमरावती
=========
 धड़कन

जिंदगी का सफर 
कुछ इस तरह चल पड़ा
ना तुम हमको भूल पाए
 ना हम तुम्हें
जब भी तन्हा बैठे हो 
चली आती  हैं याद तुम्हारी
हल्की सी मुस्कान होठों पर
करती है बसेरा अपना 
दिल भी अपनी उपस्थिति 
दर्शाने को धड़कता  लगता है 
शरीर भी कापता है
अंग अंग थिरकने लगता है

डॉक्टर दीपिका राव बांसवाड़ा राजस्थान
===========
 शीर्षक ,इजहार
तन सिंहरा
सांसे बदहवास
वाणी अवाक
दिल धड़का जोर से,
सुन सकता था कोई
लहू सिमटकर सारा
अा गया यकायक
सीने में
मदहोश नयन
झुकी पलके 
अंग अंग में थिरकन
कितना कुछ,महसूस हो गया
उस एक लम्हे में
जब तुमने मेरे माथे पर
अंकित कर एक चुम्बन
यही तो कहा था
कि में
प्रेम करता हूं तुम्हे ।
                कुन्ती
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थिरकने 
     *********
अतीत के पन्ने कभी-कभी
यादों की हवाओं से
यूँ ही पलटने लगते हैं
मन बरबस बचपन में 
लौटने को व्याकुल होने लगता है
फिर उम्र का कोई भी पड़ाव हो
कला प्रेमी मन आतुर हो उठता है
बीते पलों को सोच
व्याकुल होने लगता है
नृत्य की इगुन,दुगुन तक न जाने कैसे
दौड़ लगाते थे तब
कभी-कभी चौगुन की चौखट को
भी पल में छू आते थे
बदलते चक्र ने सब बदल दिया
न जाने सब कब,कैसे खिसक गया
परआज भी देखूं नर्तन का जलवा
पैरों की थिरकन रूक नहीं पाती
और मैं वहीँ अतीत के पन्नों में
सिमट कर रह जाती हूं
यादों में फिर-फिर खो जाती।

 बता रही अंगों की थिरकन,
कुछ तो आज हुआ है।
आज मिली तुमको आजादी,
तुमने गगन छुआ है।
@
डॉ सुषमा
कानपुर
======

मेरी  धड़कन 

यह धड़कन ही तो है 
जो मेरे सबसे करीब है 
यह अहसास कराती है 
अपनो और परायो का

यह धड़कन ही तो है 
जो ऊपर-नीचे होते ही
यह अहसास कराती है 
अपनो के सुख और दुखो का

यह धड़कन ही तो है 
जो दिल मे किसी के समाने पर
यह अहसास कराती है 
अपनो की उन मीठी यादो का

यह धड़कन ही तो है 
जो आखो मे सपने सजाती है
यह अहसास कराती है
 अपनो की जिदगी मे नये रग भरने  का 


डॉ ऋचा जायसवाल 
नीमच मध्यप्रदेश
=========
यह दिल धड़का 
क्या तुमने सुना 
मेरी आँख फड़कीे 
क्या तूने देखी 
मेरे होंठ फरके 
 क्या तूने कुछ सुना 
मेरे कान बजे 
क्या तूने कुछ कहा 
मेरी बाहें फैल रही 
चलो उड़ चले 
दूर गगन में 
कहीं घूमने चलें 
थिरक रहा मेरा अंग-अंग सजना 
बोल रही मेरी धड़कन सजना क्या तेरे मन ने 
मेरे मन को पढ़ा 
मेरे मन ने 
तेरे मन से 
क्या कुछ कहा 
क्या तूने कुछ सुना 
कि मैंने क्या कहा 
अरे सुन सजना 
थिरकती है पांव की पायल मेरी 
nach le aao Sawan Ka Mahina Aaya 
chalo Sajna 
Nache Milke Payal Meri 
========
संग संग गाय की धड़कन मेरी 
चलो सजना 
चलो सजना 
नाचते चलें 
झूमते जाएं 
हवाओं के संग संग
दूर सजना 
तेरे लिए हृदय में 
प्यार भरा 
भरपूर सजना 
चल मेरी जान 
कहीं दूर चले 
नाचे गाए 
अंबर को चूम चलें


 अरे सखियों देखो आज प्रीत सोनी जी ने हमसे क्या लिखवा दिया तोबा रे तोबा अमरजीत कौर हिरदे

========
PRIYANKA सोनी: 🌹 नाबालिग सपने🌹

अंगों के थिरकन की भाषा ये मौन है,
अधरों के कंपन को समझे वो कौन है।
डरती हूं इस धड़कन की धड़क से,
प्रेम हुआ मुझको ये समझेगा कौन है।

बचपन की देहरी पर आ गई जवानी है
अल्हड़ नदी से मुझमें आई रवानी है।
बह जाऊं संग तेरे मन यही चाहे रे,
यौवन का पंछी अब करता किल्लोल है।

अधरों के कंपन को समझे वो कौन है।

सांसों की कोयलियां प्रीत गीत गाए रे,
सोंधी- बयार मुझे हर पल महकाए रे।
बाहों में तेरी बिन पंख उड़े जाती हूं,
सतरंगी सपने सजे मेरे रोम रोम है।

अधरों के कंपन को समझे वो कौन है।

भंवरों की गुनगुन अब रस घोले कान में,
मस्ती में झूंमू जब मिल के आऊं जान से।
कैसे खोल दूं मैं दिल के गहरे सारे भेद रे,
मीठे लगे आलिंगन बाकी सब गौड़ है।

अधरों के कंपन की भाषा ये मौन है।

नाबालिग सपने हैं प्यार बहुत गहरा,
प्राण हुए बगिया कांटो का इसपें पहरा। 
मनभावन पिया संग फूलों में बस जाऊं,
शहद जैसे लगने लगे प्रेम भरे बोल हैं।

प्रेम हुआ मुझको यह समझेगा कौन है।

नर्तकी सा नाचे मन जब से छुआं ये तन,
जेठ की दुपहरियां में भी खिल गया यौवन।
सपनों की सेज सजी मिलन अब पास है,
साजन की बाहों में शब्द हुए मौन है।

अंगो के थिरकन की भाषा ये मौन है,
अधरों के कंपन को समझे वो कौन है
डरती हूं इस धड़कन की धड़क से,
प्रेम हुआ मुझको ये समझेगा कौन है।

डॉ प्रियंका सोनी "

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: ये फूल खिला ये तरे हसे ,।  ,,,,,,,,
समझने वाले समझ गए हे ,मा समझे वो अनाड़ी हे
वाह ,अंग अंग थिरका दिया आपने प्रिय प्रियंका प्रेम,यौवन अध्रो की मुक भाषा कोयल की धुन गीत प्रेम के बयार महकी सी भवरो की गुनगुन,जेठ की दुपहरी नाचे हे मन,चाहे प्रिय का आलिंगन पर प्रेम पर जमाने का पहरा
कुचभी भावना नहीं छुट्टी 
बधाई प्रिय💐
==========
कोई लौटा दी मेरे 
         प्यारे प्यारे दिन 
         महकी महकी से शामे 
         बहके बहके से दिन 
                      धड़कता था दिल 
                      तुम्हारी आहट से 
                      महकती थी सांसे 
                      तुम्हारी निगाहों से 
       मन के आसमाँ से 
       तुम चले आते थे 
       बेखटक आँगन में 
       तुम उतर जाते थे 
                       ओस की बूंदों से 
                       तुम झिलमिलाते थे 
                       हौले हौले से
                       साँसों में बस जाते थे 
       अनकहे बोलो में
       उलझ सी जाती हु
       अनछुए स्पर्शो से
       सिमट सी जाती हु 
                     थिरकता है अंग अंग
                     चहकती हु  संग संग
                     कोई लौटा दी मेरे 
                     प्यारे प्यारे दिन----
                    

       लता सिंघई --अमरावती
==============

: महकी शामे ,बहके दिन , 
मन के आसमा से दिल के आंगन में उतरना वाह क्या अहसास
भूत में चली थी कविता,
फिर अनकहे बोलो में उलझ दी जाती हूं,,,,,।  
सिमट सी जाती हूं थिरकता है अंग अंग,,,,,,,,,वर्तमान में 
फिर , कोई लोटा दो मेरे प्यारे प्यारे दिन 
प्रिय लताजी लगता है लिखतेलखते खो गई
सुंदर कविता ,शुरू के तीन बंद बेहतरीन💐

==========

धड़कन है तो ज़िंदा हो
उड़ता हुआ परिंदा हो
दिल ही नहीं धड़कता है
धड़कते हैं जज़्बात हमारे
दुःख में आँसू बरसते हैं
हृदय में जज़्बात लरज़ते हैं
तब धड़कनें संभालनी पड़ती हैं
हृदय में उमड़ते जज़्बातों
पर रोक लगानी पड़ती है
धड़कनों का साथ सदा का
जीवन भर का साथ है इनका
जब तक धड़कन तब तक जीवन
जब तक जीवन तब तक धड़कन।
     डॉ. गीता यादवेन्दु
==============

 

"थिरकने लगा अंग अंग

 रिमझिम रिमझिम बरसे सावन 
महके कतरा कतरा 
 बहका बहका सा  है मन 
 याद आने लगी 
 वो पहली मोहब्बत
 वो पहली छुअन !

सिहर उठा तन मन
 थिरकने लगा अंग अंग 
गीत गाने लगी हर धड़कन
 पाकर तेरा चुंबन -आलिंगन
 हवाओं में जैसे घुंघरू बजने लगे 
 दो बदन सिमटकर एक होने लगे 

हां !
मुझे आज भी याद है 
तेरी वो  मौहब्बत,
 वो  पहला चुंबन - 
 वो पहला आलिंगन

पर  !  तुम   दुनियादारी में कुछ ऐसे खो गए
 कुछ ख्वाहिशें पूरी हुई ,कुछ ख्वाब धूमिल हो गए
 और पीछे छूट गया 
  वो  लाखों का सावन 
   हो सके तो
 एक बार फिर लौटा दो ,साजन 
 मुझे मेरा 
 वो दिलकश सावन !

  -सुमन चौधरी सुमन
    (मौलिक एवं स्वरचित रचना)
===============


थिरक  रहा था अंग 

शादी की शहनाई गूंजी कानो मे 
तब थिरक रहा था अंग अंग मेरा

 कानो मे बाली होटो पर लाली
आखो मे काजल माथे पर बिदिया 
तब थिरक रहा था मेरा चेहरा 

हाथो मे साजन की मेहदी 
अंग अंग मे हल्दी की खुशबु 
से थिरक रहा था दिल मेरा 

पैरो मे पायल की झंकार 
हाथो मे चूडियो की खनखनाट
से थिरक रहा था खुशियो से घर मेरा 

विदा की शहनाई गूंजी कानो मे 
तब थिरक रहा था अंग अंग मेरा 
साजन की बाहो मे आने को 


डॉ ऋचा जायसवाल 
नीमच  मध्यप्रदेश
===========
: मन के मौसम 
मन के मौसम का 
असर ठहरा
 वरना यह बहारें 
तो रोज बरसती हैं
 यह मन का पपीहा 
पीहू पीहू गाता है 
यह मोर पैल पाता है 
हरियाले सावन में 
जी भर के जीना सिखाती है सखियां 
बिन सखियां यह कैसा है सावन 
कैसा है जीवन 
हंसी ठिठोली 
ना गीत रंगोली
 न भंवरों की गुंजन  
 फीका है यौवन 
अधर सूखे सूखे 
है कोयल रूआंसी 
भीने मन 💕 के मौसम 
ना महकी है बगिया
 ना खिलती दुपहरी 
खुद को आलिंगन में 
भरना चाहे 
यह मन का मयूरा 
झूमे नाचे गाए 
हिरदे के संग डोले 
खाए हिचकोले 
कभी गहरा गहरा 
कभी हौले हौले 
गाय मेरा मनवा
 पिया संग डोले

 अमरजीत कौर हृदय
===========
: *अंग अंग में थिरकन*

जब मेहंदी से रचे हाथ लेकर तुम्हारा साथ शर्मीली वधु बन
किया था प्रवेश ,    उठी थी मन में उमंग
अंग अंग में थी थिरकन

जब अपने में सिमटी 
मैंने किया अभिवादन, हो विभोर तुमने किया आलिंगन, उठी थी मन में तरंग
अंग अंग में थी थिरकन

जब छिपी मुस्कुराहट की झलक देखकर,
अधरों का हौला सा स्पर्श हुआ, उठी थी तन में अगन,
अंग अंग में थी थिरकन

आज़ भी, देख तुम्हारा 
मतवाला अंदाज़
पिया झूम उठता है मन उठती है तन ‌‌मे सिहरन
अंग अंगमे होती थिरकन
================

मालती सिसोदिया अमरावती
 मैं
पिंजरे का पंछी
घुल चुका है ,मेरे खून में
पराधीनता का नमक
फिर भी मैं, प्रेम करती हूं
एक आजाद पंछी से
वह जब भी आता है
मेरे शरीर से मेरी आत्मा को
अलग कर देता है
कल्पनाओं को परवान देता है
निष्प्राण पंखों में भरता है ऊर्जा
थिरकने लगता है मेरा अंग अंग कराता है सेर अनंत गगन की
महसूस करती हूं,
आजाद ,मुक्त 
मगर अब भी, खुदा आकर पूछे
मांग ,मांग ले 
प्रेम या पराधीनता
यकीनन
मैं मांगूंगी, पराधीनता
क्योंकि ,प्रेम तो 
दूर रहकर भी किया जा सकता है
मगर पराधीनता नहीं संभव
दूर से
                     कुन्ती

======
सीमित आज़ादी
**************

जिसे मैं आज़ादी समझती हूँ
खुश होती हूँ, नाचती हूँ, थिरकती हूँ
ख़ुद को आज़ाद समझकर
वह भी वास्तव में एक पिंजरा ही है
ये आज़ादी सीमाओं में बंधी है
इस बॉर्डर लाइंस  को क्रॉस नहीं करना है
जो बनाई हैं घर,परिवार और समाज में
ये सीमित आज़ादी भी पराधीनता का ही एक रूप है
जिसे हम आज़ादी समझकर खुश होते हैं
ज़्यादा बड़ी बात नहीं है
आप अकेले सिनेमा जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते
हम अकेले देशाटन पर भी नहीं जा सकते
असीमित इच्छाएं तो दूर की बात हैं
सीमित उड़ान भी नहीं है हमारे पास
इस सीमित आज़ादी में से ही चुराने हैं
अपने लिए आज़ाद पल और ख़ुद को
आज़ाद मान तसल्ली कर लेनी है।
       डॉ. गीता 
===============

: नमस्कार सखियों

मेरी थिरकन

मैने सुनी है उसके अंगो की थिरकन
कभी पहचानी कभी अजनबी सी धडकन
मै जानती हूँ उसके हरताल की थिरकन
फिर भी उसे देख आज भी बढती दिल धडकन

पढ़ती हूँ मै उसके नजर की भाषा
वो नही समझता मेरी मन अभिलाषा
मुझ पर स्वामित्व उसीकी आशा
यही खेद करता अंतर मन निराषा

रही हूँ मै प्रयासरत युगो युगो से
नयन और पैरों की थिरकन
जोडने में
सिखाने समर्पण हम राधा मोहन बने
देख समझ पुरुषोत्तम आज बनते अनजाने
स्वरचित स्नेहा काले
===========
सभी परमात्म अंश साहित्य काव्य प्रेमी सखियों को *सखी* का यथायोग्य सादर नमस्कार है।
वाह वाह आज की श्रृंखला तो बड़ी जीवंत है धड़के अंग,थिरके अंग, चहके मन
कोशिश है एक शब्द संयोजन की मेरी भी

*अंगों की धड़कन*

जब तक है अंगों में धड़कन
तब तक ही है हम में जीवन
जो भी अंग बनाये है प्रभु ने
हर अंग में होता क्रियान्वयन

हर अंग की है अपनी ही कहानी
एक दूजे के बिना अंग है बैमानी
आंख देखें,कान सुने,नासिका सुंघानी
मुख में तो कई अंगों की क्रियायें ही समानी।

कभी कभी कोई अंग जब है 
फड़के
सोचे सभी कि शुभ है या
है अशुभ जिया सबका धड़के
बायां अंग फड़के तो लागे है ऐसे
मनमयूर नाचे कुछ शुभता मिले हो जैसे

अंग अंग हमारा है फड़के
जब ढोल थाप पर उंगली हैं
सरके
नृत्य-संगीत सुन *सखी* नाचे है मन
 घुंघरू की रूनझुन संग पैर हैं थिरके

जगत में हर वस्तु का होता रहा मोडिफिकेशन
पर ना हुआ कभी मानव अंगों का क्रियेशन
यही है अद्भुत अद्वितीय,
अनमोल विधाता का क्रियेशन

जब तक है अंगों में धड़कन
तब तक ही है हम में जीवन..

सुमित्रा गुप्ता  *सखी*
--------
: *कजरी*
हरे रामा पकड़े है जोर कोरोना,यही है रोना रे हारी।

आगे आगे पुलिस चलत है,पीछे जनता भागे रामा,
अरे रामा यहिसे कुछू नही होना,यही है रोना रे हारी।

इधर दुकानें बंद पड़ी है ठेके खुल गए सारे  रामा,
झूमें अद्धाऔर पौना, यही है रोना रे हारी।

ऊपर से आदेश हुआ है,घर से नही निकलना रामा।
फिर भी सड़क पर होना यही है रोना रे हारी।

अस्पताल में भीड़ लगी है,एकौ बेड ना खाली रामा,
पूरे न पड़ते बिछौना,यही है रोना रे हारी।

काढ़ा पियो घरै मा बइठो,थोड़े दिन थमि जाओ रामा,
अरे रामा अपनी जिद्द करोना यही है रोना रे हारी।

जल्दी से वैक्सीन बनाओ ,जग के पालनहारी रामा।
अरे रामाअब तो देर करो ना यही है रोना रे हारी
अरे रामा पकड़े है जोर कोरोना, यही है रोना रे हारी।
=============



डॉ सुषमा
कानपुर: सीपियां उम्मीद की ..
--------

सीपियां उम्मीद की ये
कर रही थी प्रार्थना।
गर्भ में मोती बनें तो 
पूर्ण हो हर कामना।।

हिम शिखर से जल चले ले
नेह सिंचित भावना।
वारिधी का तप फले तो 
हो सफल आराधना।।

भू पे उतरे तारे ले कर 
चांदनी का पालना ।
हे प्रभु हर सीप में तू 
बूंद स्वाति डालना ।।
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