Tuesday, July 21, 2020

सच की खातिर लडाई

किशन तिवारी भोपाल 
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     सच की खातिर लड़ी  धनिया
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यूँ तो हर  बात  सह  गई  धनिया 
सच की ख़ातिर मगर लड़ी धनिया 

माँज के  लौट  रही  थी  बरतन 
कितनी आँखों में गड़ गई धनिया 

घर चलाने का गणित भूल गई
चाँद तारों को पढ़ चुकी धनिया 

आ गई   है   महानगर  लेकिन 
गाँव बस्तर की सोचती धनिया 

बढ़ती बेटी को देख कर सहमी 
जो किसी से नहीं डरी धनिया 

रात    काली   घने  अंधेरे   में 
बात करती है सुबह की धनिया 


*किशन तिवारी भोपाल

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