Thursday, July 2, 2020

में और मेरे आहसस



        एक अनुभव
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प्रेरक प्रसंग
किसी ने कहा है, दो हाथ से हम दस लोगो को भी नही हरा सकते परन्तु दो हाथ जोड़कर हम करोड़ो लोगो का दिल जीत सकते है ।आज नेहा बहुत क्रोध में थी। वह कुछ समय अपने भगवान को भूल गई थी ।मैने उसे देख कर  प्रेम से पूछा क्रोध को निमन्त्रण क्यो दिया? सभी वरिष्ठ भाईयो को परेशानी मे डालना क्यो चाहती हो?किसी को कही हुई बात को आपनी ओर खींचकर दुखी होना उचित नहीं ।हम भगवान के बच्चे है ।मेरा लक्ष्य था उसे प्रभु की याद दिला कर सचेत करना चाहती थी ।मैने वृत्ति से, संकल्प से  वायुमंडल परिवर्तन करने का प्रयोग करना चाहा मन ही मन उसे गुड फिलिंग देकर क्रोध शान्त करने का प्रयास किया और कहा देखो तुम्हारा गुस्सा, हाव-भाव ऑफिस का वातावरण खराब करना चाह रहा है ।शान्त हो जाओ व्यर्थ सोच हटा दो। बार बार मन में उसे कहती रही।                                       मैं  उस समय बहुत खुश हुई जब दोनो पक्षो ने वातावरण की कड़वाहट को दूर करते हुए हाथ जोड़कर बात समाप्त की।नेहा को अपने नामानुकूल होने में समय  जरूर लगा किन्तु सामान्य हो गई। मैं भी  भगवान  को मनमे धन्यवाद देते हुए ऑफिस से बाहर आ गई ।उस समय गहरा अनुभव लिया कि मन से की गई सेवाभी 
कितनी सफल सिद्ध हो सकती है बशर्ते हमारा मन साफ हो। सकारात्मक हो। 




*   अमिता मराठे

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 *रेल की पटरी*
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आज भी सुधीर गुस्से में घर से बिना नाश्ता किए चला गया।
मीता को अपने आप पर गुस्सा आ रहा था और तरस भी क्योंकि अब यह लड़ाई रोज का हिस्सा बन चुकी थी जिसे ना उगलते बन रहा था ना निगलते।
उसकी अपनी बेबसी बांध तोड़ कर आंसुओं के रूप में बह निकली।

कल की ही बात है जब मीता दुल्हन बनकर इस घर में आई थी जिसे हर पल एक नया सपना लगता।
19 बरस की एक चंचल युवती अपने अरमानों के पंख लिए आकाश में उड़ने को लालायित थी। पर इसके ठीक विपरीत सुधीर एक 25 साल का परिपक्व युवक एक धीर गंभीर व्यक्तित्व का मालिक जो पढ़ाई करते करते ही व्यापार की दुनिया में अपने कदम मजबूती से जमा चुका था।  चंद सालों में वह जिंदगी के हर चढ़ाव उतार से भली-भांति परिचित हो कर   समाज में अपना एक स्थान बना चुका था । विवाह के 5 सालों के अंदर ही मीता दो प्यारे प्यारे बच्चों की मां बन चुकी थी। अपनी जिम्मेदारियों को संभालते संभालते मीता सिर्फ घर गृहस्थी ही नहीं बाहरी दुनिया भी देखना चाहती थी। पर इन सालों में सुधीर ने अपना कारोबार इतना बढ़ लिया था कि अब उसके पास इन सब बातों के लिए समय ही नहीं था । मीता की होटल पिक्चर या घूमने जाने की बातें उसे बचकानी लगती। धीरे-धीरे मीता के अंदर एक रिक्त स्थान घर कर गया जिसे जिससे सुधीर ने कभी समझने या जानने की कोशिश ही नहीं की। वरन अब तो उसे अपनी जिंदगी में मीता का हस्तक्षेप भी बर्दाश्त नहीं था।

समय का पाबंद होना अच्छी बात है पर समय का गुलाम होना नहीं चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए उसे 10:00 बजे ऑफिस जाना ही है चाहे मीता बीमार हो या बच्चे को बुखार अपने कर्तव्य की इतिश्री वह डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेकर और गाड़ी ड्राइवर भेज कर कर देता। मीता चाहती सुधीर दो पल पास बैठे उसके साथ बच्चों की देखभाल करें पर उसके लिए यह सब बातें बेमानी थी। सुधीर के कुछ कर दिखाने के जुनून में नीता की कितनी आकांक्षा और तमन्नाओं को अपने पैरों तले रौंदा इसका तो उसे आभास भी नहीं था
बच्चे भी अब धीरे-धीरे अपने पिता से दूर होने लगे। सुधीर के घर में आते ही एक सहमा सा माहौल कायम हो जाता। वक्त के साथ-साथ सुधीर का गुस्सा और परेशानियां दोनों बढ़ने लगे। मीता उसकी परेशानियां बांटना चाहती पर सुधीर का एक ही जवाब होता तुम अपने काम से मतलब रखो इसके आगे मीता कुछ नहीं कह पाती
व्यापार में  हुए उतार-चढ़ाव की वजह से सुधीर इन दिनों कुछ ज्यादा ही पंडितों और ज्योतिषियों के चक्कर में पड़ गया। पैसा पानी की तरह बर्बाद होने लगा और कोई हल भी नहीं निकल रहा था। आज भी सुधीर किसी ज्योतिष के पास जा रहा था । मीता ने उसे समझाने की कोशिश की तो वह नाराज  होकर घर से चला गया।
 मीता रोते हुए यही सोच रही थी कि आखिर उसका कसूर क्या है? वह तो एक ऐसा जीवनसाथी चाहती है जिसके साथ वह हंसी खुशी गम दुख सुख सब बांट सकें ना कि ऐसा संरक्षक जो साधन तो जुटा  दे पर उन्हें भोगने में साथ ना दे। मीता के पास सुख सुविधा के सारे साधन नौकर चाकर गाड़ी बंगले सब है पर फिर भी उसके मन का एक कोना खाली पड़ा है पुरुष स्त्री के दिल की उस लहर को क्यों नहीं महसूस कर पाता जिसमें वह उसे भिगोना चाहती है मीता तन और मन दोनों का मिलन चाहती हैं पर सुधीर शायद उसे समझ ही नहीं पाता। मीता अपने इस दर्द को किसी को बयां भी नहीं कर पाती क्योंकि दुनिया की नजरों में वह बहुत सुखी है सास ससुर एक इज्जतदार पति दो बच्चे और सारी सुविधाएं इससे ज्यादा एक स्त्री को और क्या चाहिए पर वह कैसे कहें की एक आदर्श बेटा एक प्यारा पति क्यों नहीं बन पाता। सुधीर बुरा आदमी नहीं है पर बस मीता की भावनाओं का उसके लिए कोई मूल्य नहीं जब उसका मन हो तो पास बुलाए बात करें नहीं तो मुंह घुमा कर सो जाए। यही सब सोचते सोचते मीता की आंख लग गई। बच्चों की आवाज से हड़बड़ा कर उठी और उन्हें खाना देते हुए सोचने लगी शायद उसका और सुधीर का जीवन उस रेल की पटरी की तरह है जो साथ-साथ तो चलती है पर कभी मिल नहीं पाती। इसे ही अपनी नियति मान काम करते हुए वह गुनगुनाने लगी
अपना जीवन रेल की पटरी साथ रहे और मिल ना पाए
आए जाए कितने मौसम फूल मगर यह खिल ना पाए
[01/07, 14:09] Prbha Tiwari Ji: आज डाक्टर दिवस हे।
आज डाक्टर दिवस पर आप सबसे उन यादो को साझा कर रही हू जो मेने देखा।
मेरे जीजा डाक्टर एस डी दुबे
जो सरकारी सर्विस में रह चुके।
ओर बड़वानी से सिविल सर्जन हो के रिटायर्ड हुए।
जब उनकी पोस्टीग धार के पास बदनावर में हुई थी।ये 1972 की बात है 
उनको वहां रहते आठ नव साल 
 हो गये थे। मरिज से बडे
आत्मीयता से मिलते थे आधा तो मरिज उनके  सरल व्यवहार से ही अच्छा हो जाता था। इस कारण  लोगों को उन पर इतना विश्वास हो गया था कि डाक्टर साहब एक बार हमारे बच्चे को देख ले फिर शहर ले जावेगे। बदनावर
तहसील होने से पहले वहां लाइट
बहुत ज्यादा जाती थी। ऐसे में आप्रेशन करते जब लाइट चली जाती थी तो अपेनडिस हार्निया इनका आप्रेशन टार्च में करते थे।
उनका सेवाभाव देखकर लोग चकित होते थे कि आजतक सरकारी डाक्टर यहां तो हमने नहीं देखा। लोग मेरे जीजा को भगवान् ही कहने लग गये थे। जब उनका टासफर हुआ तो लोग रोये ।ऐसी सेवा भाव उन्होंने सर्विस में हमेशा  बनाये रखा ।रिटायर्ड के बाद भी उन्होंने मरिज से कभी फिस नहीं ली। 
 रिटायर मेंट को20 साल हो गये हैं।  ।  आज तक इस उम्र में भी उनसे जितना बनता है। बरोबर मरिज देख लेते हैं। आज के दिन में मेरे जीजा के साथ साथ सभी सिनिअर्स जुनियरस को बहुत बहुत बधाई व नमन करती हू। जिन्होंने अपनी परवाह न करते हुए भगवान् के    रूप मे आकर लोगों की जान बचाई। सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं आप स्वस्थ रहे आपका परिवार स्वस्थ रहे। नमन 🙏🙏 🌹🌹
*स्मिता जैन 
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*डॉ के प्रति मेरा अनुभव*
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मैंने डॉक्टर के दो रूप देखे ।
 डॉक्टर भगवान का रूप होते हैं । वह हमें नई जिंदगी देते हैं , तो कभी-कभी डॉक्टर की लापरवाही से इंसान की जान पर बन आती है । मैंने यह दोनों बात अनुभव की और मुझे इन दोनों तरह का अनुभव एक ही बार हुआ । मैं सर्दी, खाँसी , बुखार या उल्टी-दस्त होने पर होम्योपैथी इलाज लेती थी ।

पिछले साल जनवरी के आखरी दिनों की बात है । मुझे रात में बुखार आया । दूसरे दिन होम्योपैथिक डॉक्टर को दिखाया । उसने कहा मुझे टाइफाइड लग रहा है और दवा दे दी । दूसरे दिन बहुत ज्यादा दस्त लगने लगे । तब मैंने एलोपैथिक डॉक्टर को दिखाया उसने भी यही कहा टाइफाइड है । दस्त लगने और बुखार के कारण बहुत ज्यादा कमजोरी आ गई थी । थोड़ी सांस लेने में भी तकलीफ हो रही थी । इसलिए डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती कर लिया । लेकिन तबियत सँभलने के बदले बिगड़ती चली गई । 4 दिन बाद पल्स रेट गिर गई । सांस नहीं ली जा रही थी । तब उसने रात को 12:00 बजे बोला कि आप इन्हें चोइथराम हॉस्पिटल ले जाइए और वहां डॉ प्रदीप जैन को दिखाइए क्योंकि ऑक्सीजन की कमी हो गई है । अगर डॉक्टर को समझ में नहीं आया था कि मुझे क्या हुआ है तो उसे पहले ही बोल देना था दूसरे हॉस्पिटल के लिए । 4 दिन भर्ती रखकर हालत बिगाड़ दी । रात को 12:00 बजे पति और बेटा मुझे चोइथराम हॉस्पिटल लेकर गए । वहाँ जाते ही पता नहीं कितने सारे टेस्ट किए गए उस समय बताया गया कि मुझे वायरल निमोनिया हो गया है । डॉ. प्रदीप जैन ने पति और बेटे को बताया स्थिति बहुत ही ज्यादा गंभीर है । फेफड़े काम नहीं कर रहे हैं । प्लेटलेट्स भी बहुत ज्यादा कम हो गए हैं । मुझ पर बेहोशी सी छा रही थी । पानी तक नहीं पी सक रही थी । मुझे तुरंत ऑक्सीजन पर रखा गया । आइसोलेशन वार्ड में शिफ्ट किया गया । प्लेटलेट्स देखने के लिए दिन में तीन तीन बार खून की जाँच होती थी । रोज सुबह चेस्ट का एक्सरे होता था ।  डॉक्टर के अथक प्रयासों से करीब 5 दिन बाद स्थिति में थोड़ा सा सुधार मालूम हुआ । इलाज के साथ-साथ डॉक्टर का कोमल व्यवहार बातचीत और मोरल सपोर्ट से परिवार को उम्मीद जगी और मुझ में थोड़ी हिम्मत आई । करीब 13 दिन तक मैं ऑक्सीजन पर रही । 15 दिन बाद डॉक्टर ने हॉस्पिटल से डिस्चार्ज यह कह कर दिया कि घर पर भी इसी तरह आराम करना है और दवाइयां समय-समय पर लेनी है ।

 मेरे लिए डॉ प्रदीप जैन भगवान बन कर आए जिन्होंने मुझे दूसरी जिंदगी दी


* रश्मि सक्सैना 
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         इंदौर

डॉक्टर जीवनदाता,
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डॉक्टर और मरीज का रिश्ता बहुत पवित्र होता है डॉक्टर का प्यार ,विश्वास,समर्पण,सेवा,सकारात्मक सोच,कर्तव्यनिष्ठा,वाणी माधुर्य, हिम्मत उचित सलाह ईमानदारी,समझदारी मरीज को नया जीवन देती है, येसभी सद्गुण डॉक्टर के श्रृंगार है जिससे उनका व्यक्तित्व सुंदर बनता है और डॉक्टर की एक सुंदर छबि मानस पटल पर निर्मित होती है चिकित्सा जगत के वो सभी डॉक्टर्स धन्य है,,,,,,,,,
हार्दिक शुभ कामनाएं,,,,,,,,,

                  * नवनीत जैन
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मृगनयनी
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पुष्ट नव युग्मों का तन।
यौवन का रक्त झंकृत।
श्रृंगार भावों से भरकर।
प्रति व्यस्त मन मृगनयनी।

उर उत्तेजित बन्धन तोड़।
निशंक निर्भिक अनियंत्रण
अदम्य उत्साहित चित्त से।
नवजीवन की नव संगिनी।

तेरी वाणी की मृदु झंकार
अप्रतिम सुन्दरता अपार।
हे मृगनयनी हे सुकुमारी।
किस दर्पण में देखूं साकार

मन में बसी तेरी चितवन।
सुधामय सांसों काउपवन।
भौंहों के भावोंमें सुखमन।
हो मृगनयनी का आगमन।

*अमिता मराठे 
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        *शीर्षक-इंसपेक्टर सरदारा सिंह* 
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अरे बिटिया, तूं सुबह-सुबह ही रोने लगी। क्या बात है?. देखो ना मां-आज पापाजी फिर मुझसे बिना मिले चले गये। रात में सोने के बाद ही आते हैं।  पन्द्रह दिनों से मैंने उनका चेहरा तक नहीं देखा। 
मां बोली- बिटिया रानी, तुम्हारे पिता अर्थात " *इंसपेक्टर सरदारा सिंह* " 
राष्ट्र-हित, समाज हित की खातिर दिन-रात कोरोनो-वारियर्स बनकर देशसेवा में जुटे हुये हैं। वो अपनी कुर्बानी दे रहे हैं।ऐसे में हमारा कर्तव्य है कि इस नेक कार्य में हम उनका साथ दें और हां तेरे पापाजी का फोन आया था, आज शाम वो पांच बजे तुझसे मिलने आ रहे हैं।

दरअसल बिटिया तेजस्वनी का  उन खबरों को देखकर मन, मलीन होने लगता है, जब खबर आती हैं कि  कोरोना-वारियर्स भी संक्रमित हो रहे हैं।
आज तेजस्वनी का पल-पल, बरस के समान गुजर रहा था। पांच बजने ही वाले थे कि दरवाजे पर स्वर गूंजा, तेजू।
तेजू की खुशियों का ठिकाना ना रहा, वह तेजी से आगे बढ़ती चली गई, तभी पापा ने उसे रोका और मुस्कुराते हुये कहने लगे बेटा- इतने दिन ठहरी हो तो 14 दिन आपको और रुकना पड़ेगा। तेजू बोली पापाजी, मैं समझी नहीं। तभी *इंसपेक्टर सरदारा सिंह* ने कहा, दर असल मुझे कोरोना-संक्रमण हो गया है, मुझे यहीं से वापिस अस्पताल जाना होगा। पल भर मे बिटिया के खुशियों के  आंसू गम में बदल गये। सिर पर जैसे गमों के काले-काले बादल बरसने के तैयार बैठे हों, तभी माताजी ने ढाढस बंधाया और इंसपेक्टर उल्टे पैर, इस बार सबके लिये नहीं, बल्कि अपने परिवार की खातिर एक और जंग जीतने अस्पताल चले गये।

समय बीतता गया। एक, दिन, दो दीन .....।

बिटिया की पापाजी से मोबाइल पर बातें होती रहती थी।

दसवे दिन मुस्कुराते हुये, मां बिटिया के पास आयीं, कहने लगीं-तेजू , तेरे पापाजी का संंक्रमण टेस्ट नेगेटिव आया है, डाक्टर कह रहे थे कि अगर दूसरा टेस्ट भी नेगेटिव आया तो उनकी अस्पताल से छुट्टी हो जायेगी।
तेजू तुरंत मां सरस्वती के सामने आंख मूंद कर बैठ गई और दूसरे दिन का इंतजार करने लगी।

जैसा सोचा था वैसा ही हुआ। आज देश का एक और वीर सपूत *इंसपेक्टर सरदारा सिंह* एक और जंग जीतकर घर आ रहे हैं।
उनके घर के 500 मीटर दूर से ही गली के  दोनों तरफ लोग फूलमाला, पुष्पवर्षा, ताली, शंख बजाकर  विजेता का स्वागत कर रहे हैं।
बिटिया दूर से ही अपने पापाजी को निहार रही है, इस बार उसे ऐसा लग रहा है जैसे *इंसपेक्टर सरदारा सिंह* अपनी तेजू को गोद में बिठाकर सारे जहां की सैर करा रहे हों।


*राजेश कुमार, लखेरा, जबलपुर। म.प्र.।
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 डॉक्टर डे पर 
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माँ बाप के लिए क्या लिखू?  बचपन से आज तक जो महसूस हुआ उसमे यही देखा की माँ बाप के पास न कोई डिग्री थी। डॉक्टर की न दबाई न थर्मामीटर फिर भी चेहरा देखकर बुखार और बीमारी पहचान लेते थे। 
        हमारी आवाज ही उन्हें हमारी बीमारी का कारण और बजह बता देती थी। 
     शादी के बाद भी फ़ोन पर आबाज से पूछते क्या हुआ?  तबियत ठीक नहीं है?  और तो और उनके छूने से सर पर हाथ रखने से हम ठीक हो जाते था।  
  और एक एंटी डोज़ माँ की गोद जब उसमे अपना सर रख देते थे तो बढ़ी से बढ़ी बीमारी ठीक हो जाती थी। आज भी बो दवाइयां याद आती है माँ बाप की.। काश! वो हमेशा हमारे साथ होती माँ की एंटी डोज़ (माँ की गोद ) जिसे हम माँ बनने के बाद भी नहीं भूल पाते। 

  *     प्रेरणा सेन्द्रे
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माँ पापा सबसे बड़े डॉक्टर
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माँ पापा तो दुनिया के सबसे बड़े डॉक्टर हैं अपने बच्चों के लिये।याद है जब बुखार आता था और पापा सिरहाने बैठ पानी की पट्टियां रख बुखार छू करते थे,और माँ! माँ तो ऊंची नीची ही जाती थी दौड़ दौड़ कर अदरक तुलसी गुड़ का काढ़ा बना पिलाना,गर्मी में नकोली फूटने पर बर्फ से सिकाई करना,सर्दी यों में घरेलू दवाइयों को मिलाकर ठंड के लड्डू खिलाना आज भी याद आता है।N. C. C परेड में सुबह जाते टाइम ठंडे पानी से नहला देती,,, कहती ठंड ठंड क्या करती हो?ठंड तुम्हे क्या खाती है? चलो जल्दी से नहाकर गर्म गर्म दूध लड्डू खाकर जाओ नाश्ते में ।ताकत रहेगी शरीर में
     शादी हो कर सुसराल गई तब भी फर्स्ट एड का छोटा सा डिब्बा बनाकर दे दिया।अपने कमरे में रख लेना।ठंड लग जाये तो सौंठ कालीमिर्च की गोली ले लेना,गला खराब हो तो नमक गरारे कर लेना,भाप ले लेना,,पेट दुखे तो अजवाइन फांक लेना और हां छोटी मोटी चोट या जलने के घाव पर हल्दी लगा लेना।ऐसे आधी बीमारी छोटी मोटी तो माँ ही भगा देती थी।पापा भी कोई कम वैद्य नही थे।सुबह जल्दी उठो,दौड़ने जाओ,साईकल से सब काम करो।कोई लूना नहीं।मजबूत बनो।ऐसे माँ पापाजी की डॉक्टरी आज भी याद आती है।और असर मुझे भी आया है उनका।मेरे डॉक्टर बेटे की छोटी मोटी सर्दी खांसी तो  डॉक्टर बन कर मैं ही दूर कर देती हूँ।हल्दी केशर का दूध,मुलेठी,अजवाइन ,लौंग तेल से दांतों का दर्द आज भी दूर कर देती हूँ।सचमुच में नानी दादी के नुस्खे होते तो बहुत जोरदार।पीढ़ी दर पीढ़ी इसे बढाते रहना चाहिए आगे।बहुत 👌 काम की चीज है।

*प्रभा जैन ,इंदौर
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डाक्टर्स डे 
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डाक्टर हमारे लिए भगवान का दूसरा रूप है 
पर माता पिताजी भी डाक्टर से कम नहीं होते है ।मुझे याद है म कभी माँ से कहती आज पेट दुखः रहा है वह फोरन 
मुझे अजवाइन सेक कर 
दे देती थी आराम हो जाता था कभी ऐड़िया फट जाती दर्द होता माँ
मोम पिधलाकर लगाती थी ,एक रोज मेरा छोटा भाई बहुत रो रहा था करीब दो तीन महिने का था वह बोली शायद पेट मे दर्द हो रहा होगा वह 
हींग गरम कर डूढी़ मे नाखूनों पर लेप लगा देती
थी ।सर्दी खासी हो तो तुलसी का काड़ा और हल्दी नमक गर्म पानी से 
पिलाती थी बहुत जल्दी 
फरक पड़ जाता था ।
कभी गिरने से चोट लगती माँ तेल हल्दी का फाया बनाकर सेक कर पट्टी बाँध देती थी कहती हल्दी
ऐन्टीबायोटिक है वाकई माँ भी एक डाक्टर है 
हमे कभी कभी घरेलू उपचार छोटे मोटी बीमारी मे करना चाहिए ।

*  मनोरमा जोशी 
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ईश्वर
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करीब  दो साल पूर्व पापा अचानक  घर पर बेसुध हो गिर पड़े ।तुरंत अस्पताल ले जाकर उन्हें भर्ती कराया गया और सही समय पर इलाज शुरू हो गया।
मैं जब उनसे मिलने नागपूर पहुंची तो थोड़ा सुधार आने लगा था उनके स्वास्थ्य में।उनका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने बताया कि थोड़ी सी भी देर हो जाती तो मुश्किल हो जाती।निरन्तर स्वास्थ्य में सुधार के पश्चात यानी पूरे 1 माह के बाद डॉक्टर की सहमति के बाद एम्बुलेंस से उन्हें मुम्बई ले जाया गया जहां भाई के घर अब वे स्वस्थ होकर सामान्य जिंदगी बसर कर रहे हैं।
उनसे जब भी मिलती हूँ ,उन ईश्वर रूपी डॉक्टरों को मन ही मन प्रणाम करती हूं ,जिनके बिना हम उन्हें मौत के मुंह से वापस नही ला सकते थे।
धरती पर डॉक्टर रूपी ईश्वर को कोटिशः प्रणाम🙏

*अचला गुप्ता
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 मेरा सपना
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डॉक्टर समाज का अभिन्न अंग होता है।स्वास्थ्य मनुष्य काअमूल्य धन है। वह बीमार व्यक्ति का इलाज कर उसे नया जीवन प्रदान करता है।
मेरा भी सपना डॉक्टर बनकर सरकारी अस्पताल में विशेषकर गांवों में सेवा देने का था।मैं महिलाओं की डॉक्टर (गायनोकोलॉजिस्ट) बनती,क्योंकि एक नए जीवन को जन्म देने,और उस माता की उचित देखभाल करना सर्वश्रेष्ठ सेवा होती। परिस्थितिवश ये सपना पूरा ना हो सका।
डॉक्टर का व्यक्तित्व और मरीज के साथ उसका व्यवहार उसे ईश्वर की श्रेणी में लाता है। मैं  इन्दौर की डॉ. वैयजन्ती भोरास्कर से बहुत प्रभावित हूं। 
मेरे पापा भी डॉक्टर थे। वो मेडिकल कॉलेज में पी.एस.एम. के प्रोफेसर थे। शायद उनकी प्रेरणा ने  ही शिक्षाविद् बनने में मदद की। उनके आदर्श मेरे लिए दोनों प्रकार से प्रेरणा के स्त्रोत रहे।
परन्तु आज कोरोना के दौर में मन में कसक उठती रही, कि काश मैं डॉक्टर होती तो मानव जीवन में अपना योगदान दे पाती ।
चिकित्सा सेवा को समर्पित🙏🙏🙏🙏
*सविता ठाकुर 

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शीर्षक - जीवन उद्धारकर्ता 
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चिकित्सा विज्ञान के अध्ययन में अपने जीवन के महत्वपूर्ण साल लगाता 
इस पेशे को सम्हालने के लिये ये पूर्ण परिक्षण लेता 
हर एक अपने जीवन काल को लेकर इस पर भरोसा रखता 
वहीं ये हमको जीतने का विश्वास दिलाये रखता 
यह मरने वाले को जिन्दा रखने की पूरी कोशिश करता 
और रोते हुए आये को हँसते हुए भेजता 
प्रिस्क्रिप्शन पर रंग बिरंगी दवाएँ लिखता रहता 
हर पंद्रह दिन में मिलने आने को  कहता 
अपनी माँ की कहानियों का अगवान देखा 
श्वेत वस्त्र पहने हुए मैने आज भगवान देखा 
स्वलिखित 


*मंजिरी पुणेतंबेकर 
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आज डाक्टर दिवस हे
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आज डाक्टर दिवस पर आप सबसे उन यादो को साझा कर रही हू जो मेने देखा।
मेरे जीजा डाक्टर एस डी दुबे
जो सरकारी सर्विस में रह चुके।
ओर बड़वानी से सिविल सर्जन हो के रिटायर्ड हुए।
जब उनकी पोस्टीग धार के पास बदनावर में हुई थी।ये 1972 की बात है 
उनको वहां रहते आठ नव साल 
 हो गये थे। मरिज से बडे
आत्मीयता से मिलते थे आधा तो मरिज उनके  सरल व्यवहार से ही अच्छा हो जाता था। इस कारण  लोगों को उन पर इतना विश्वास हो गया था कि डाक्टर साहब एक बार हमारे बच्चे को देख ले फिर शहर ले जावेगे। बदनावर
तहसील होने से पहले वहां लाइट
बहुत ज्यादा जाती थी। ऐसे में आप्रेशन करते जब लाइट चली जाती थी तो अपेनडिस हार्निया इनका आप्रेशन टार्च में करते थे।
उनका सेवाभाव देखकर लोग चकित होते थे कि आजतक सरकारी डाक्टर यहां तो हमने नहीं देखा। लोग मेरे जीजा को भगवान् ही कहने लग गये थे। जब उनका टासफर हुआ तो लोग रोये ।ऐसी सेवा भाव उन्होंने सर्विस में हमेशा  बनाये रखा ।रिटायर्ड के बाद भी उन्होंने मरिज से कभी फिस नहीं ली। 
 रिटायर मेंट को20 साल हो गये हैं।  ।  आज तक इस उम्र में भी उनसे जितना बनता है। बरोबर मरिज देख लेते हैं। आज के दिन में मेरे जीजा के साथ साथ सभी सिनिअर्स जुनियरस को बहुत बहुत बधाई व नमन करती हू। जिन्होंने अपनी परवाह न करते हुए भगवान् के    रूप मे आकर लोगों की जान बचाई। सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं आप स्वस्थ रहे आपका परिवार स्वस्थ रहे। नमन 🙏🙏 🌹🌹


                    *  प्रभा तिवारी
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 डॉक्टर है ईश्वर का ही स्वरूप,
स्वस्थ्य बनाता रोग अनुरूप।
ना दिन का सुकून,ना समय पर खाना,
जब बीमार पुकारे ,दौड़कर चले जाना।
दिन रात मेहनत से बचाता कितनी जाने,
बदले में पाए दुआएं,लोग भगवान माने।
ना त्योहार,ना परिवार,सिर्फ फर्ज निभाना,
फिर भी ना होना परेशान,सिर्फ खुशी दिखाना।
डॉक्टर का इन्सान बने रहना आसान नहीं,
मरते को जीवन देना,किसी के बस का काम नहीं।
याद रखेंगे आपके दैनिक बलिदानों को,
नमन है आपको और  आपके जीवन को।
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

*सविता ठाकुर

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अनुभव
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डॉक्टर के प्रति मेरा भी बहुत गहरा अनुभव है । एक फौजी की परिवार होने के नाते बच्चों को लेकर अकेले रहना होता है। उनके पति देव या तो कश्मीर के  इलाकों में या अति संवेदन शील जगह पर तैनात रहते थे। मेरा तीन बच्चो के साथ संघर्ष  बहुत करना पड़ा। उस दौरान छोटा बच्चा सिर्फ चार महीने का था उसको निमोनिया हो गया।  उस दौरान हम क्वाटर्स में नहीं थे । बच्चा छोटा होने कारण मै साथ भी नहीं जा सकी जहां उनका पोस्टिंग हुआ था।  रात भर उसकी सांसे उखड़ने की कगार पे .....
मै डर डर कर रात बिताई। सुबह ही 5 बजे किसी को बुलाकर हॉस्पिटल ले गई । थोड़ी देर न आते तो....... डॉक्टर का यह बात सुन मुझे खूब रोना आया। फ़िक्र मत करो अब ठीक हो जाएगा..... यह भरोसे के दो बोल मेरे कान में अमृत घुल गई। वो ठीक होता रहा । 5 दिन बाद छुट्टी कराकर घर आई । मेरे बच्चे को बचाने वाले वो डॉक्टर किसी मसीहा से कम नहीं थे । नमन  🙏🙏🙏💐

*मित्रा शर्मा
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भगवान के प्रतिनिधि
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जब वह मेडिकल में प्रवेश पाने। 
कितनी रातें जागते ये वो ही जाने।  
पुस्तकालय की किताबों में उलझा रहता। 
ना ढंग से खाता पढ़ाई ही करता रहता । 

 मिल जाता है मेडिकल में  जब उसे प्रवेश। 
सुखी रहे सब हो जाती उसकी इच्छा विशेष।  
 भगवान का प्रतिनिधि उसे समझ लेते हैं।  
जैसे हाथ लगाते ही रोग दूर हो जाते हैं।

कोख से मृत्यु तक वह साथ निभाता है।
न जाने उससे कैसा नाता बन जाता है। 
जीवन उसे सौंप भगवान समझ लेते हैं।
 हर चमत्कार की उम्मीद उसी से कर लेते है।

नहीं सन्तान तो उसी से आस लगाते है।
सन्तान के जन्म के लिए उसी के पास जाते है।
 दर्द बढ़े तो फिर उसे याद फरमाते है।
पर जाने क्यों इस भगवन को हर शुभ कार्य में बुलाना भूल जाते है।

*मीना जैन भोपाल (.स्वरचित   


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 *भूली बिसरी यादें*
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आज 1 जुलाई को *डाक्टर्स डे* है। यूँ तो कोविड -19 के समय  जिस तरह हमने डाक्टर्स को अपनी जान जोखिम में डाल कर सेवा में रत और समर्पित देखा , तो उनके सम्मान में  मस्तक झुक जाता है।  किन्तु यह भी सत्य है कि आजकल अधिकांश चिकित्सक व्यवसायी बन गए हैं और वह भी अमानवीयता को ताक पर रखकर। कुछ धनपति जिनका  चिकित्सा से दूर-दूर का वास्ता नहीं ,उन्होने बड़े-बड़े अस्पताल एवं रिसर्च सेंटर खोलकर  चिकित्सकों को एक निश्चित तन्ख्वाह पर नियुक्ति किया है और चिकित्सा माफिया अपने एजेंटों के माध्यम से जाल बिछा कर लोगों को लूटने में लगे हुए हैं । यह आज की तस्वीर है। 

किन्तु कुछ वर्षों पूर्व तस्वीर कुछ और थी । लोग डाॅक्टर को भगवान समझते थे और डाॅ भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से मरीज की उम्मीदों पर खरा उतरता था ।

ऐसा ही एक वाकया आपके समक्ष रख रही हूँ। 

बात उन दिनों की है, जब मैं कक्षा तीसरी की विद्यार्थी हुआ करती थी। 
ठंड के दिनों में रविवार छुट्टी का दिन था , इसलिए माँ ने सिर से नहला दिया । बाल गीले थे इसलिए नीचे सीढी में धूप में जाकर बैठ गई । दो तीन सहेलियां और आ गईं। 
अचानक एक गाय बदहवास सी दौड़ती आई और हमारे ऊपर गिर गई , गाय का सबसे ज्यादा वजन मेरे पैर पर आ गया, मेरे जांघ की हड्डी टूट गई। लोगों ने खींच कर पैर सीधा किया और तुरंत 
तुरंत अस्पताल ले गए । फैक्ट्री इस्टेट के छोटे हाॅस्पिटल में तब ऑपरेशन और प्लास्टर की सुविधा नहीं थी ,अतः जबलपुर के  मैडिकल कॉलेज में रैफर किया गया, जो लगभग तीस किलोमीटर दूर था और उन दिनों यातायात के बहुत साधन उपलब्ध नहीं होने की वजह से  
सरकारी एम्बुलेंस में ही मुझे ले जाया गया। मां पिताजी जिन्होंने कभी मैडिकल कॉलेज मुंह नहीं देखा था ; उन्हें मेरी वजह से इतना परेशान होना पड़ा ।
मेरे पैर की हट्टी टूट गई थी। लोगों के पैर सीधा करते समय  वह एक पर एक चढ़ गई थी । डॉ ने देखते से ही कहा ऑपरेशन करना पड़ेगा। 
 
अगले दिन बड़े डाॅ का राउंड था उन्होंने कहा ऑपरेशन की जरूरत नहीं। 
वैसे ही ठीक हो जाएगी ।

दो डाॅक्टरों की पृथक राय ने माँ पिता जी को परेशान कर दिया। वे उन बड़े स्पेशलिस्ट  डाॅ ओरी साहब के बंग्ले पर गए -
"सर, ऑपरेशन जरूरी हो तो प्लीज़ कर दीजिये, लड़की है , एक पैर छोटा हो गया, तो जीवन खराब हो जाएगा ।"
डॉ साहब ने पिता जी कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि- "यह केवल आपकी नहीं, मेरी भी बेटी है । इसकी जिम्मेदारी मै लेता हूँ।  ऐसा कुछ नहीं होगा। 
विश्वास रखो पैरों में एक सेंटीमीटर अंतर भी नहीं आएगा।" 
फिर चेस्ट  से लेकर पैर के अंगूठे के नाखून तक प्लास्टर चढ़ा । आजकल तो नई तकनीक से छोटे और सुविधाजनक प्लास्टर चढ़ने लगे हैं। 
तीन महीने तक बिस्तर पर लेट कर ही गुजरे । इस बीच बाबूजी ने रात-रात भर जाग कर कितनी ही कहानियां सुनाकर मन बहलाया  । शायद उन्ही कहानियों का असर है कि मेरी कल्पना शीलता पुष्ट हुई, मैं कुछ लिखने योग्य हो गई। 

तीन माह बाद जब प्लास्टर कटा तो माँ-पिता जी बहुत व्यग्र थे । डाॅ ओरी ने उनकी ओर देखा और इंचटेप से मेरा पैर नापने के लिए झुके । मां बाबूजी की धडकन बढ़ रही थीं। 
"ये देखिये बिल्कुल बराबर! 
नापिये , नापिये,  अपने हाथ से नाप लीजिए। 

माँ बाबूजी की आँख में आँसू थे । दोनों हाथ जोड़कर डाॅ के सामने खड़े थे । मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे । आंखों से आँसू ही डाॅ साहब के लिए  दुआ बन कर बह रहे थे।  

शायद डाॅ भी भावुक हो गए थे 
। बाबूजी के कंधे पर हाथ रखा और तुरंत बाहर निकल गए। 

मैं भी बचपन की बहुत-सी बातें भूल गई, किन्तु उन डाॅ साहब का नाम आज तक नहीं नहीं भूली ।

*डाॅ ओरी , भगवान डाॅ ओरी!*



*- वंदना दुबे
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सच्ची सेवा 
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डॉक्टर भगवान होते हैं यह तो सच है बस उनमें लालच की भावना न हो ऐसा ही वाकया लिखने जा रही हूं
आई (मेरी सासु जी) को ७५ की उम्र में भी किसी बड़ी बीमारी ने नहीं घेरा था ,पर ७ साल पहले skin infection होने से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया वहां डॉक्टर की एक दवाई heavy dose में देने की वजह से उन्हें आधे शरीर में लकवा मार गया पर अस्पताल ये मानने को तैयार नहीं था, हम कुछ भी नहीं कर सके, हमने दुसरे डॉक्टर का इलाज शुरू किया आई कि दवाईयां शुरू हुई घर का व्यक्ति यदि बीमार  पड़ जाए तो अच्छे अच्छे पढ़ें लिखो का भी दिमाग भी काम नहीं करता,हमारा भी वही हाल था, हमने इलाज में कोई कसर नहीं छोड़ी, फिजियोथेरेपी करवाई, दवाईयां भी चल रही थी पर कोई विशेष फर्क नजर नहीं आया, मेरे पति कभी कभी हताश हो जाते कहते आई का अस्पताल में ही इलाज करवाते हैं, एक दिन हमारे family doctor का घर आना हुआ वे हमारे घर जैसे ही थे उन्होंने आई का पुरा चेक अप किया और फिर हाल में आके बैठे, मेरे पति ने उनसे पूछा"अंकल, आई कब तक ठीक होंगी? डॉक्टर अंकल ने जो जवाब दिया उसे सुनकर हमारा मन उनके प्रति श्रद्धा से भर गया वे बोले देखो बेटा ऐसा है"सेवा करोगे तो उसका मेवा कभी न कभी जरूर मिलेगा, माताजी की सेवा करो, उनके पास बैठो, उन्हे motivate करो उनके आधे डॉक्टर तो तुम्हीं लोग हो दवाएं इतना असर नहीं करेंगी जितनी तुम्हारी सेवाएं, क्योंकी बेटा समय सबका आता है, टेंशन मत लो खुद भी स्वस्थ रहो और मरीज़ को भी खुश रखो और यदि ये नहीं हो तो डॉक्टरों को ही तुम्हारी कमाई का मेवा खाने दो, बाकी तुम खुद ही समझदार हो"उनके इन शब्दों ने हमें अंदर तक झकझोर दिया,सच में डाक्टर हो तो ऐसे जो सिर्फ़ अपनी जेब का ही नहीं सोचते बल्की सच्चा सेवा भाव रखते हैं, हमारे सेवा भाव से आई कि तबियत में थोड़ा सुधार हुआ वे छोटे मोटे काम खुद कर लेती पलंग के सहारे बैठना,पलंग पर ही खुद के हाथों से खाना, दैनिक साफ-सफाई अपने हाथों से कर लेना कर लेती, बीच-बीच में डाक्टर अंकल भी उन्हें देखने आ जाते पर fees नहीं लेते कहते"मुझे भी थोड़ा पुण्य कमाने दो"उम्र के चलते आई ज्यादा दिनों तक हमारा साथ नहीं निभा पाई पर जाते समय जो आत्मिक शांति उनके चेहरे पर थी वह डॉक्टर अंकल द्वारा हमें दी हुई सीख का ही नतीजा था, धन्य हैं डॉक्टर अंकल आप ,आप जैसे डॉक्टर दुनिया के हर कोने में हो कोरोना के हमारे डॉक्टर hero's ने भी  इस बात का प्रमाण दे दिया है कि सेवा भाव से बढ़कर कुछ नहीं।



स्वरचित
*स्वाति वाड़गे (वनकर)


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चिकित्सा प्रणाली 
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उत्तरोत्तर गहन शोध और नवाधुनिक पद्धति के कारण आधुनिक  चिकित्सा प्रणाली विज्ञान का चमत्कार है। 
पर यहाँ सेवा भाव ही मूल भूत प्रेणना है ।तन से मन का जुड़ाव तो अटूट है मन स्वस्थ है तो तन भी प्रसन्न चित्त होगा ही होगा ।
कई बार हम देखतें है कि भावात्मक संबल मिलने से असाध्य पीड़ा भी ठीक होने लगती है ।
सुश्री सुलोचना मोघे --- सत्तर वर्षीय गरिमामय व्यक्तित्व , साहित्य , संगीत और आध्यात्म का सुन्दर सम्मिश्रण --- इंसान तो इंसान मैंने उन्हें सड़क किनारे पड़े बीमार स्वान का घाव धोते और उसकी सुश्रुषा करते देखा है । उनके निस्वार्थ और हर समय सेवा में तत्पर रहने वाले भाव और स्वभाव में वही भावात्मक जुड़ाव था जो किसी भी बीमार को अच्छा महसूस करने में जादू का काम करता है ।
आज चिकित्सक दिवस पर  उनके सेवा भाव के पुनीत काम करने के लिए मैं अपनी असीम 
आदरांजलि देती हूँ उन्हें । 

*शालीनि  रायजादा 

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श्रृंगार रस 
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श्रृंगार रस में नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया जाता है 💐श्रंगार रस को रसराज या रस्पति भी कहा जाता है🌹 इसका स्थाई भाव प्रेम या रति है,     प्रेम संसार के कोने-कोने में व्याप्त और हरित कृति है💐

स्वयं प्रकृति सौंदर्य बिखरती हुई रति है। चंद्र चांदनी में सुंदरता की कृति है🌷

श्रृंगार उतना ही उचित है जितना नैनो को आकर्षक लगे🌷 नैनों में स्वच्छंदता के आते ही यह सौंदर्य विहीन हो जाता है।।🌹
मानव सृष्टि के प्रारंभ से ही श्रंगार का जोर है 💐श्रंगार अपने आप में ही सिरमोर है 💐

नारी श्रृंगार से परिपूर्ण हो सुंदर सात्विक  श्रृंगार का ही रूप हो🌷 जो नैनो के अनुरूप हो जो नैनो के अनुरूप है🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
*सुषमा शुक्ला इंदौर


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 *अपनापन*
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विधा: कविता

दिल के झरोको से,
प्यार झलकता है।
आपकी वाणी में,
अपनापन दिखता है।
तभी तो आपसे निगाहें,
मिलाने को मन करता है।
और तुम्हें दिल से, 
अपनाने का मन करता है।।

कौन कहता है कि तुम,
दिल नहीं लगा सकते।
और किसी को अपना, 
बन नही सकते।
क्योंकि दोस्तो ये, 
दिलका मामला है।
जिसे पत्थर दिल, 
निभा नहीं सकते।।

फूलों की तरह सुंदर हो,
दिल से भी सुंदर हो।
इसलिए कहता हूं की,
तुम खिलता हुआ गुलाब हो।
तभी तो दिल करता है, 
कि तुम्हें देखता ही रहूं।
और अपने दिल को,
थोड़ा शीतल कर सकूं।।


*जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन (मुम्बई)

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                  *पुनर्विवाह-लघुकथा* 
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       *कुमार* और राधा पिछले चौदह वर्षों से अलग-अलग रहे थे। बच्चें अनु और प्रिया दोनों के मध्य बंट चुके थे। प्रिया राधा के पास थी और अनु कुमार के पास। छोटी-छोटी घरेलु बातों पर उपजा तनाव तलाक की वज़ह कब बना! दोनों समझ ही नहीं सके। राधा सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी तो वहीं कुमार पुर्व की भांति मार्केटिंग का व्यापार कर रहा था।
"पापा! आप मार्केटिंग लाइन में न जाने कितने ग्राहकों  को कनवेंस कर देते है लेकिन मम्मी को समझाने में अब तक असफल है! ऐसा क्यों?" प्रिया अपने पापा को फोन पर कह रही थी।
निश्चित रूप से ये प्रश्न कुमार को विचलित करने के लिए पर्याप्त था। अपने कॅरियर में उसने हजारों ग्राहकों को उनकी नापसंद के बावजूद जीचें जबरन विक्रय की थी, वो भी उन्हे प्रसन्न कर! फिर वह अपनी पत्नी को प्रसन्न क्यों नहीं कर सका? आज प्रिया ने उसके बीस साल के मार्केटिंग कॅरियर पर प्रश्न चिन्ह खड़ा कर दिया था। यह बात उसे चिंतित करने के लिए पर्याप्त थी।
अनु अलग रहकर भी अक्सर अपनी मां से फोन पर बातें कर लिया करती।
"ममा! शिक्षक अपने व्यावसायिक जीवन में आने वाली बहुत सी चुनौतियों का न केवल सामना करते हैं अपितु विजय भी प्राप्त करते हैं। शिक्षक के भरोसे सरकार कितने ही महत्वपूर्ण कार्य संपादित करती है। क्या वह शिक्षक अपने निजी जीवन की छोटी-मोटी समस्या हल नहीं कर सकते?" अनु ने फोन पर अपनी मां से कहा।
राधा को विश्वास हो गया की अनु आयु में भले ही छोटी हो किन्तु उसके विचार अब बड़े हो गये थे। राधा को सर्वश्रेष्ठ शिक्षक का राज्यपाल सम्मान पिछले वर्ष ही प्राप्त हुआ था। एक शिक्षक के रूप में वह सफल थी किन्तु निजी जीवन में असफल! क्या शिक्षक का उत्तरदायित्व स्कूल और स्कूल के बच्चों के कल्याणार्थ ही होता है। वह अपने निजी संबंधों को सुचारू रूप से गतिमान रखने में असफल क्यों हुई थी?
बाहरी चकाचौंध से नेत्र क्षणिक भर के लिए अवश्य बंद हो जाते है किन्तु ये ताम-झाम दिर्घामी आंतरिक सुख कभी नहीं दे सकते।
कुमार और राधा को यह बात समझनी होगी। तब ही वे  संपूर्ण सफल और योग्य माने जायेंगे। पारिवारिक रिश्तों में मधुरता और पारस्परिक संबंधों को अटूट बनाये रखना दोनों की सामुहिक जिम्मेदारी होती है। इस बात को कुमार और राधा जितनी जल्दी समझ जाये, उतना ही उनके और दोनों बच्चों के लिए निश्चित लाभदायक सिद्ध होगा।
खैर! दोनों बहनों ने माता-पिता का पुनर्विवाह किये जाने की योजना में प्रारंभिक सफलता प्राप्त कर अपने प्रयत्नों में वृद्धि कर दी थी।

* जितेन्द्र  शिवहरे
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