आईल ऋतु फिर सावन के ।।
बदरी घेरलस काला -काला ,
देख के मन में परल छाला
बरसी बरखा के फुहार जब
मन परेला मोर साजन के ।।
आईल ऋतु फिर सावन के ।।
दादुर के पी -पी के शोर ,
खींचे मोहे सजन के ओर,
सपना तब देखेला अँखियाँ ,
मोर प्रियतम के आवन के ।।
आईल ऋतु फिर सावन के ।।
कर गोरी सोलह श्रृंगार ,
आवत होईहे पियवा तोहार,
लागल बा मिलन के प्यास ,
आश लागल मनभावन के ।।
आईल ऋतु फिर सावन के ।।
पड़ल झूला बा बागन में ,
कौवा उचरत बा आँगन में ,
प्रेम के हिरनी मन में कुदे
राह निहारे मन साजन के ।
आईल ऋतु फिर सावन के ।।
*डॉ मंजु गुप्ता

No comments:
Post a Comment