------------
सावन के दिन आये सखी री सावन के दिन आये।
तन हुलसाया मन सरसाया अंखियन में प्रीतम है
समाया
नैनन नींद न आये सखी री
सावन के दिन आये।
उमड़-घुमड़ बदरा हैं आवैं
बरस-बरस मोरे तन को भिगावैं
याद पिया की आये सखी री
सावन के दिन आये।
पुरवा संग आंचल लहराया
मांग सिंदूर टीका गहराया
हिवड़े हूक उठत मोरे सखी री
सावन के दिन आये।
घर आंगन हरियाली छाई
फूल-फूल डाली महकाई
मोहे कछु न भावे सखी री
सावन के दिन आये।
मंद समीर की भीनी सन-सन रिमझिम में पायल सी छन-छन
सोलह श्रंगार न भाये सखी री
सावन के दिन आये।
मेघ मल्हार पंचम स्वर गावत
बूंद-बूंद जल तरंग
बजावत
मुझ विरहन को सताये सखी री।
सावन के दिन आये।
* लीला कृपलानी, जोधपुर

No comments:
Post a Comment