🌹गीत🌹
(कविश्रेष्ठ स्व. गोपालदास नीरज की द्वितीय पुण्यतिथि पर विशेष)
“दिल के काबे में नमाज़ पढ़”
(गोपालदास ‘नीरज’)
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
उसका नूर न मस्जिद में है,
उसकी ज्योति न मन्दिर में !
जिस मोती को ढूँढ रहा तू,
वो है दिल के समन्दर में !
मन की माला फेर,हाथ की तस्बीह घुमाना छोड़ !
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
जो कुछ बोले हैं पैग़म्बर,
वही कहा सब सन्तों ने !
लेकिन उसके मानी बदले,
सारे भ्रष्ट महन्तों ने !
पण्डित-मुल्ला सब झूठे हैं,इनसे हाथ मिलाना छोड़ !
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
ख़ुदा ख़लक से अलग नहीं है,
इसमें वो ही समाया है !
जैसे तुझमें ही पोशीदा,
तेरा अपना साया है !
दुनिया से मत दूर भाग,बस ख़ुद से दौड़ लगाना छोड़ !
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
पूजा-पाठ,नमाज़-जाप,
सब छलना और दिखावा है !
दिल है तेरा साफ़ तो,
तेरा घर ही काशी-काबा है !
मकड़जाल है ये सब जग के,इनका ताना-बाना छोड़ !
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
तू ही तो सन्सारी है रे,
और तू ही सन्सार भी है !
क़ैदी तू ही,जेल भी तू ही,
तू ही पहरेदार भी है !
तीन गुनों वाली रस्सी में,अब तो गाँठ लगाना छोड़ !
दिल के काबे में नमाज़ पढ़,यहाँ-वहाँ भरमाना छोड़ !
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