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ग्रुरुपूर्णिमा
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गुरुवंदना
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निर्देशक -डा सुनीता श्रीवास्तव
संपादक-संकल्प श्रीवास्तव
संपादक टीम-मानवेन्द्र नारायणि माया
चिन्मय श्रीवास्तव
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रचनाकर
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1राजू चौरसिया
2डा राजीव वर्मा सलिल
3डा विनीता रघुवंशी
4राम जी,धार
5संजय जैन
6शारदा मिश्रा
7निति अग्निहोत्री
8मंजू गुप्ता
9रितु प्रज्ञा
10ममता तिवारी
11कुसुम सोगानी
12शोभा तिवारी
13प्रेरणा सेन्द्रे
14उषा गुप्ता
15प्रभा तिवारी
16कुंदन पाटिल
17कुमुद दुबे
18प्रभा जैन
19मनोरमा जोशी
20स्मिता जैन
21सरला मेहता
22संगीता भारुका
23ममता बड़जात्या
24कुमुद दुबे
25अमिता मराठे
26चारुमित्रा नागर
27मंजिरी पुणेताम्बेकर
28सुशील कोठरी
29अचला गुप्ता
30पूनम शर्मा
31निधी गिरी
32हेमलता शर्मा
33शलिनी खरे
34कविता ओसवाल
35सविता ठाकुर
36मीना जैन
37अलका जैन
38निशा विधा
39सीता देवी
40डा आभा माथुर
ज श्री गुरु पूजन गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्री गुरु चरणों में कोटिस नमन वन्दन आपकी जय विजय हो आप दीर्घायु हो स्वस्थ्य आनन्दित रहे आपसे ही हमें सद्बुद्धि संस्कार मिले ,आपने मेरे अंधकार में ज्ञान की ज्योति जला दी यह दुनिया जब भटक रही थी तब आप ही इसे मार्गदर्शन कर रहे थे ,आज आपके बताए मार्ग पर खुशियाँ ही खुशियाँ है कामयावियां जहाँ स्यंम तालिया बजाकर मन भाव विभोर करती हो ,और उस मार्ग से हमारे साथ आपके अनेक शिष्य नीलगगन की ऊंचाई पर पहुँच कर नगर ,देश, प्रदेश परिवार का आपका नाम रोशन कर खुद अब गुरु बन गए , पर आप सबसे बड़े सबके गुरु है, आप है तो हम है आप है तो यह जहां है नमन चरण वन्दन आपको ,,,,,
देवी देव ऋषि जन बोले ,
हम सबके सम्मान गुरु है ll
प्रथम पाठ हिंदी अंग्रेजी ,
गणित सँस्कृत ज्ञान गुरु है ll
न्याय नीति के सुंदर नायक ,
जन जागृति जहांन गुरु है ll
सबल साधना हरि आराधना ,
अखिल विश्व ब्राम्हण गुरु है ll
गायन वादन गीत संगीत की ,
मधुर मधुर स्वर तान गुरु है ll
हर जन जन की इच्छा पूरण ,
हर दिल के अरमान गुरु है ll
हर निर्धन गरीब की चाहत ,
मन्द मन्द मुस्कान गुरु है ll
दया धर्म के सु आराधक ,
बाकई बड़े महान गुरु है ll
इस बसुधा से आसमान तक ,
हम सबकी पहचान गुरु है ll
नामुमकिन को मुमकिन करदें ,
इस दुनियां की शान गुरु है ll
गुरु विन ज्ञान अधूरा राजू ,
नई खोज विज्ञान गुरु है ll
श्री गुरु चरणों मे नत वंदन ,
यश वैभव यशगान गुरु है
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गुरुवंदन
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गुरु को नित वंदन करो, हर पल है गुरुवार.
गुरु ही देता शिष्य को, निज आचार-विचार..
*
विधि-हरि-हर, परब्रम्ह भी, गुरु-सम्मुख लघुकाय.
अगम अमित है गुरु कृपा, अन्य नहीं पर्याय..
*
गुरु है गंगा ज्ञान की, करे पाप का नाश.
ब्रम्हा-विष्णु-महेश सम, काटे भव का पाश..
*
गुरु भास्कर अज्ञान तम, ज्ञान सुमंगल भोर.
शिष्य पखेरू कर्म कर, गहे सफलता कोर..
*
गुरु-चरणों में बैठकर, गुर जीवन के जान.
ज्ञान गहे एकाग्र मन, चंचल चित अज्ञान..
*
गुरुता जिसमें वही गुरु, शत-शत नम्र प्रणाम.
कंकर से शंकर गढ़े, कर्म करे निष्काम..
*
गुरु पल में ले शिष्य के, गुण-अवगुण पहचान.
दोष मिटाकर बना दे, आदम से इंसान..
*
गुरु-चरणों में स्वर्ग है, गुरु-सेवा में मुक्ति.
भव सागर-उद्धार की, गुरु-पूजन ही युक्ति..
*
माटी शिष्य कुम्हार गुरु, करे न कुछ संकोच.
कूटे-साने रात-दिन, तब पैदा हो लोच..
*
कथनी-करनी एक हो, गुरु उसको ही मान.
चिन्तन चरखा पठन रुई, सूत आचरण जान..
*
शिष्यों के गुरु एक है, गुरु को शिष्य अनेक.
भक्तों को हरि एक ज्यों, हरि को भक्त अनेक..
*
गुरु तो गिरिवर उच्च हो, शिष्य 'सलिल' सम दीन.
गुरु-पद-रज बिन विकल हो, जैसे जल बिन मीन..
*
ज्ञान-ज्योति गुरु दीप ही, तम का करे विनाश.
लगन-परिश्रम दीप-घृत, श्रृद्धा प्रखर प्रकाश..
*
गुरु दुनिया में कम मिलें, मिलते गुरु-घंटाल.
पाठ पढ़ाकर त्याग का, स्वयं उड़ाते माल..
*
गुरु-गरिमा-गायन करे, पाप-ताप का नाश.
गुरु-अनुकम्पा काटती, महाकाल का पाश..
*
विश्वामित्र-वशिष्ठ बिन, शिष्य न होता राम.
गुरु गुण दे, अवगुण हरे, अनथक आठों याम..
*
गुरु खुद गुड़ रह शिष्य को, शक्कर सदृश निखार.
माटी से मूरत गढ़े, पूजे सब संसार..
*
गुरु की महिमा है अगम, गाकर तरता शिष्य.
गुरु कल का अनुमान कर, गढ़ता आज भविष्य..
*
मुँह देखी कहता नहीं, गुरु बतलाता दोष.
कमियाँ दूर किये बिना, गुरु न करे संतोष..
*
शिष्य बिना गुरु अधूरा, गुरु बिन शिष्य अपूर्ण.
सिन्धु-बिंदु, रवि-किरण सम, गुरु गिरि चेला चूर्ण..
*
गुरु अनुकम्पा नर्मदा, रुके न नेह-निनाद.
अविचल श्रृद्धा रहे तो, भंग न हो संवाद..
*
गुरु की जय-जयकार कर, रसना होती धन्य.
गुरु पग-रज पाकर तरें, कामी क्रोधी वन्य..
*
गुरुवर जिस पर सदय हों, उसके जागें भाग्य.
लोभ-मोह से मुक्ति पा, शिष्य वरे वैराग्य..
*
गुरु को पारस जानिए, करे लौह को स्वर्ण.
शिष्य और गुरु जगत में, केवल दो ही वर्ण..
*
संस्कार की सान पर, गुरु धरता है धार.
नीर-क्षीर सम शिष्य के, कर आचार-विचार..
*
माटी से मूरत गढ़े, सद्गुरु फूंके प्राण.
कर अपूर्ण को पूर्ण गुरु, भव से देता त्राण..
*
गुरु से भेद न मानिये, गुरु से रहें न दूर.
गुरु बिन 'सलिल' मनुष्य है, आँखें रहते सूर.
*
टीचर-प्रीचर गुरु नहीं, ना मास्टर-उस्ताद.
गुरु-पूजा ही प्रथम कर, प्रभु की पूजा बाद..
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मार्गान्तीकरण
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कब तक करते रहोगे
विनाश की लीला?
कहाँ तक भटकते फिरोगे
ईर्षा के इलाकों में ?
नामुमकिन है कि मिटा दो
कोई भी स्रोत प्रेम के
जिनसे जन्म लेकर आज तक
फूलती -फलती आ रही कविता
हो सके तो एकाध मर्तबा
पढकर देख लो इन्हें
वे तुम्हारी सूखी नाभि को
प्यार के अमृत से भर देंगी
और खडा कर देगी
गर्म जोशी से -
शोषण के विरुध्द ----
हर मोर्चे पर।
(श्री प्रेमशंकर रघुवंशी के कविता संग्रह "आँगन बुहारते वक्त "से उद्धृत)
गुरु की कृपा सदा सब पर बनी रहे, गुरु पूर्णिमा पर जगत गुरु को वंदन
*डा विनीता रघुवंशी
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गुरु चरण
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मन
संभल
अब चल
गुरु चरण
की ओर रे !
ले
गुण
अपार
गुरुवर से
चरण लगा
तेरा ध्यान रे !
ये
मन
विषयों
में रमेगा
विषयन से
मुख मोड़ रे !
हे
गुरु
तुम हो
उद्धारक
मत करना
अबकी देर रे !
श्री
गुरु
पूर्णिमा
की हार्दिक
शुभकामनाएँ
श्री
राम
शरमा
परिन्दा
संचालक
योगी नरहरि
योग-ध्यान आश्रम
*राम जी,धार
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*विद्यासागर जी वाणी सुनो*
विधा : भजन
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विद्यासागर जी की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।
ज्ञानसागर जी की दिव्य ध्वनि सुनो।
जैन धर्म का पालन करो।
विद्यासागर जी की वाणी सुनो।।
आज हम सबका यह पुण्य है।
मिला है हमें मनुष्यब जन्म ..।
किये पूर्व में अच्छे कर्म।
इसलिए मिला मनुष्य जन्म।
गुरुवर के मुख्य बिंदु से।
जिनवाणी का ज्ञान प्राप्त करो।।
विद्यासागर जी की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।
वीर प्रभु जी की एक छवि।
सदा दिखती है उनमें .... ।
वीर प्रभु के कथनो को।
साकार करने आये धरती पर ।
कलयुग में मिले है हमें ।
सतयुग जैसे गुरु विद्यासागर।।
विद्यासागर जी की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।
सदा आगम का अनुसरण करे।
उसके अनुसार ही वो चले ... ।
बाल ब्रह्मचारियों को ही।
वो देते है मुनि दीक्षा।
पहले भट्टी में उन्हें तपते है।
सोना बनाकर ही छोड़ते है।।
विद्यासागर जी की वाणी सुनो।
ज्ञान अमृत का रसपान करो।।
*गुरुदेव की चरणों मे नामोस्तु*
आज गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर गुरुदेव आचर्यश्री १०८ विद्यासागर जी के चरणों में संजय जैन (मुम्बई) का भजन समर्पित है।
*जय जिनेन्द्र देव की
संजय जैन
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: *गुरूवंदना*
$$$$$$$$$
नमन करूँ गुरूदेव को,
ह्रदय मे धर ये विचार।
सकल मनोरथ पूर्ण हो,
गुरु हैं तारणहार ।।
कष्ट कंटको मे फसे,
गुरु ही मार्ग बताएं,
हाथ थाम आशीष दें,
राह सुगम बन जाए ।।
अपने ज्ञान प्रकाश से,
तम हरते गुरूदेव ।
जीवन आलौकित करें,
किरपा करें सदैव ।।
भटके मन तो राह पर ,
लाता है गुरु ज्ञान।
सद्गुरु शिक्षा बाण सम,
हर लेता अज्ञान ।।
ईश्वर मेरे मध्य में,
सेतुबंध गुरु आप।
आई जो विपदा घड़ी,
दूर किया संताप ।।
वरदहस्त धर शीष पर,
राह करो आसान ।
कृपा दृष्टि हम पर करो,
हम मूढमति अज्ञान ।।
परब्रह्म गुरु आप हैं,
सकल गुणों के धाम।
आशीर्वाद सदा रहे ,
होय सिद्ध हर काम ।।
🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏
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: गुरू महिमा
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गुरू जी की महिमा का पार नहीं पाते
ईश्वर से भी बढ़ कर उनको पाते।
अज्ञानता का अंधकार हर लेते
उर में ज्ञान का दीपक जला देते।
हमें काग से हंस बना देते
परब्रह्म से सहज मिला देते।
मन के सारे संताप मिटा देते
हमें नर से नारायण बना देते।
जीवन हमारा पावन बना देते
सत्संग की गंगा में नहला देते।
सारे तीर्थ चरणों मे उनके पा जाते
अंतर में सोई शक्ति को जगा देते।
कृपा की बरसात सदा कर देते
शिष्यों को पग ं पग पर साथ देते।
युग ं युग से भटके हुए प्राणियों को
सही पंथ व दिशा को दिखला देते ।
अनंत उपकारों की झड़ी लगा देते
संकट में सहारा बन बचा लेते।
इस संसार की आसक्ति को मिटा देते
ध्यान परमात्मा के चरणों में लगा देते।
=====================================$==$
अध्यापक की महिमा
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अ से अध्यापक है होता
सृजनाकार - सा स्वर - व्यंजन सिखाता
ध्या से ध्यान - साधना करवाता
धर्म - नैतिकता का पाठ पढ़ाता।
प से पूर्णता का प्रतीक बन के
सही दिशा ज्ञान है सिखाता
क से कर्ता , कर्म , क्रिया , कारक बनके
व्याकरण ज्ञान सिखलाता।
शब्द , व्याकरण के मेल से बनता वाक्य
सिखा के बौद्धिक ज्ञान संसार
करे भविष्य को साकार
अध्यापक की महिमा अपरम्पार
करती '
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई
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जलहरण घनाक्षरी
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गुरू छाँटते अँधेरा
करते नव सवेरा
ज्ञान दीपक जलाते
जीवन उमंग भर ।
नयी राह हैं दिखाते
बुराई चिन्ह मिटाते
हौसला करें बुलंद
शिष्य उरतल तर।
होने न देते उदास
जगाते रहते आस
मेहनती बनाकर
तकलीफें सब हर।
वंदनीय हैं हमारे
सदा बनते सहारे
करें चरण वंदन
नवाए अपना सर।
* रीतु प्रज्ञा
दरभंगा, बिहार
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गुरु सीख
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आज गुरुपर्व की सबको बधाई
गुरुओं ने ही जीवन में ढेरों सीख सिखाई
मार्गदर्शक देवदूत सच्चा साधक होते हैं गुरु
ज्ञान अज्ञान के बीच का अंतर मिटाते हैं गुरु
प्रथम गुरु माता दूजा गुरु शिक्षक मानो तो पूरा जग है गुरु
अंधकार से प्रकाश की ओर ,ठहराव से विकास की ओर ले जाते हैं गुरु
आओ झुक कर फिर याद करें अपने सारे गुरूजनो को
अपने सच्चेआचरण से श्रद्धांजलि दें, अच्छा करें अच्छा सोचे अपने गुरुओं का नाम करें
सत्य मार्ग पर निष्ठा से चलकर अपने गुरुओं का मान बढ़ाएं
सब मिलकर अपने गुरुओं को याद करें नमन करें शत शत वंदन करें
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नियमित गुरु
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ब जर धरती कागज करूँ
लेखनी वनराय
सातों समुद्र की मसि करूँ
फिर भी गुण ना लिंख पाय
संसार के सारे गुरुओं को मेरा नमन🙏🙏🙏🙏
(मेरी भाभी ने मुझे सिखाया👆👆)
लेखिकायें भी मेरी
नियमित गुरु है
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जीवन सीख
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गुरु जो जीवन जीना सिखलाते,
चुनौतियों को लक्ष्य बनाते हैं,
कठिन डगर पर चलते हैं लेकिन,
मंजिल तक पहुंचाते हैं ।
ज्ञान का भंडार है ,
प्रगति का आधार है,
उनके चरणों में जन्नत,
सपने होते साकार है।
मार्गदर्शक बन रहा दिखाते
सही -गलत में भेद बताते ,
ज्ञान का दीप जला कर के ,
अज्ञानता को दूर भगाते ।
अच्छे संस्कार देकर ,
इंसान को इंसान बनाते,
उनके कमियों को दूर कर,
होंठों पर मुस्कान लाते,
पत्थरों को तराश कर हीरा बनाते ,
खुद का खुद से परिचय करवाते।
गुरु के चरणों में वंदन ,
वे दुनिया में महान हैं ,
गुरु के बिना ज्ञान अधूरा ,
उनकी अलग पहचान है ।
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गुरु को याद
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🙏🙏🙏🙏
🙏बचपन से ही माना जो हमें कुछ सिखा पाए वही हमारा गुरु होता है। ऐसी ही सातवीं में हिंदी की अध्यापिका किरण मैम थी। जो हमें किताबों के अलाबा दुनिया की सीख देती थी। हमें जीवन में कैसे जीना चाहिये बताती थी। उनकी कक्षा का हमेशा इंतजार रहता था। एक बार हमसे बोली भगबान से जीवन में सिर्फ तीन चीजें मांगनी चाहिए। "विद्या, बुद्धि और साहस " हमारे पास ये तीनों हो तो हम जीवन में कभी नहीं हारेंगे.। आज उस बात को बीते तीस साल से ज्यादा बक्त हो गया पर आज भी जब भी भगवान के आगे हाथ जोड़ती हूँ तो विद्या, बुद्धि और साहस मांगकर किरण नाम जो सूर्य की किरण की तरह है उन महान गुरु को याद करती हूं।
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गुरू पूर्णिमा पर सादर समर्पित
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गुरू पूर्णिमा.... अपने गुरू को एक बार फिर विशेष रूप से सादर अभिवादन करने का एवम धन्यवाद देने का अवसर....गुरू के दिए ज्ञानामृत के बदले में सिर्फ करबद्ध अंजलि ही है मेरे पास।मेरी गुरू जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया,इस लायक बनाया कि मैं उनके दिए ज्ञान को दूसरों में बाँट सकूँ, उन्हें शत् शत् नमन और ये छोटी सी भेंट है कविता रूपी पुष्पांजलि.......
कर्म की भूमि पर
पुरूषार्थ के महासंग्राम में
गीता के ज्ञान के साथ
लेकर परम पिता का सर पर हाथ
ज्ञान की गंगा में जिसने
हमको भी बहाया
कर्तव्य,स्वमान,निष्ठा
जिम्मेदारी व अनुशासन का
जिसने पाठ पढ़ाया
कौन है वह ??
कोई और नहीं
ये हैं मेरी गुरु
आपने हमें सिखाया कि
विचारों पर उम्र का
कोई बंधन नहीं होता
फूट ही पड़ता है जमीं से
सोता तो बस होता है सोता
आपके इन हाथों ने
बनाया हमें हज़ार हाथों की ताकत
आपके विचारों को हमने
बनाया है हकीकत
साथ आपका ,प्यार आपका
श्रद्धा से नमन हमारा
गुरु बिना ज्ञान कहाँ
गुरु जहाँ सरस्वती वहाँ
मैं थी मिट्टी इक कच्ची
आकार दिया ,साकार किया
भले बुरे का ज्ञान दिया
ज्ञान-आभा से मंडित किया
ईश्वर से पहले
नमन करूँ उन्हें
ईश्वर की पहचान कराई
सबसे ऊँचा मानू जिन्हें
आप नहीं जानती
आप क्या है ??
आप शुभकामनाएँ हैं
आप पावन दुआएँ हैं
आप में भगवान बसते हैं
आप हमारी वंदनाएँ हैं
सानिध्य आपका
हमारे लिए शीतल घटाएँ हैं
संगत आपकी
दिलों को हँसाए हैं
आपसे ही तो
सदगुरू का अहसास होता है
ऐसी परम आदरणीया
श्रद्धेयगुरू को
शत् शत् नमन
अभिनंदन, अभिनंदन
*उषा गुप्ता
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नमन
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मा पिता को भी आज के दिन नमन करती हू उन्ही ने हमको गुरु का महत्व बताया की जिवन में गुरु का क्या महत्व होता है
जिनके सानिध्य में हम स्कुल की
पडाई पुरी करते हुए स्नातक तक कि डिग्री गुरु के सानिध्य में
पुरी करते हे।
आज मैं गुरु पूर्णिमा पर जो टिचर मुझे सबसे ज्यादा ध्यान रखती थी प्यार करती थी जिनके सानिध्य में 8वी से 11वी तक रही। हिन्दी की टिचर थी जिनका नाम उर्मिला निरखे था। आज वो कहा हे मुझे नही मालूम वो जहां भी हो उनको नमन करती हू।
आज उनकी एक एक शब्द बाते याद आरही है। वो हमेशा कहती थी प्रभा तुम खूब आगे बडोगी।
एक बार में 9 वी में पेपर था फिजिक्स का ओर मुझे याद रहा
केमेस्ट्री का पेपर है। जब पेपर हाथ आया तो रो रो के बुरा हाल
सबको मालूम था कि ये निरखे मेडम से ही सम्हल पायेगी
उनका नाम सुनते ही हिम्मत आई
वो आई ओर धिरे से मेरे कान में बोली जितना आता उतना लिखो में हु ना। ऐसी मेरी गुरु थी वो।
आज मोका मिला तो कुछ बात शेयर जरुर करुगी।
फेयरवल पार्टी थी मेरी टिचर कवियित्री भी थी। मेने उन्हीं की साडी पहनी उनके जेसे चलते हुए स्टेज पर गयी। उन्हीं कि कविता सुनाई।। वक्त पर उतने ही हक से डाट भी देती थी ऐसी मेरी वो गुरु थी। उनका प्रभाव तो मुझ पर ऐसा पडा कि मैने साइंस छोडकर कालेज में आर्ट लै लिया ओर उन्ही की तरह हिन्दी में M A किया ।आज उन्ही के कारण मेरी कलम चलरही हे।
निरखे मेडम आपको बहुत बहुत नमन प्रनाम
* प्रभा तिवारी 👆
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गुरू जी
===
मैं आनलाईन की दुकान पर अपने बच्चे का स्कालरसिप का फार्म फरने गया वहा बुजुर्ग इन्सान बैठे थे मेने कुछ सामान्य जानकारी ली ओर गौर से देखा तो मुझे लगा मेने इन्हें काफी करीब से कही देखा हैं मेने थोड़ा दिमाग पर जोर दिया ओर पुछा! सर जी क्या आप नारायण विघा मन्दिर टिचर थे! तो सर ने कहा हा! अभी आठ साल पहले ही रिटायर हुवा हुँ- पर तुम क्यों पुछ रहें हो? सर जी! मैं भी कक्षा 9 वी में आपका विघार्थी रह चुका हुँ। सर जी वाह! क्या बात हैं अब कहा हो बेटा - सर मैं प्रायवेट कम्पनी पिछले 28 साल से काम कर रहा हुँ। सर जी- बहुत अछ्छा बेटा घर पर सब आनन्द मंगल से तो हैं। जी सर सब आनन्द से हैं सर के आखों में खुशी की चमक साफ साफ दिख रही थी ओर मेरे मन में सर का खोप! क्यों की सर ने ही मुझे काफी करते हुये पकढा था ओर एक जोरदार चाटा जड़ते हुये कहा था अब से ऐसा कार्य करते दिखे तो परिक्षा से बाहर कर दुंगा! आज सर के सामने अपने समय की कमीया महसुस हो रही थी गुरू की सिख आज भी नेक पथ पर चलने की प्रेरणा देती रहती हैं गुरूजी आपको प्रणाम।
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एक बच्पन की चुलबुली हरकत
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मुझे आज भी याद है जब मे,कक्षा पाँचवी मे पढ़ती थी घर पर सर पढा़ने आते थे उनका नाम आजाद सर था वह पढा़ते
अच्छा थे पर ,अगर कुछ
सवाल गलत कर देते तो वह बडी़ जोर से हाथ पर
चिमटा खोड़ते थे ।
बड़ा गुस्सा आता ,परेशान होकर एक रोज मे और
मेरी सहेली शैल ने सोचा
अब इनसे नहीं पढे़गे ।
पिताजी से शिकायत की पर उन्होंने कहा गुरु की
प्रताड़ना से ही शिक्षा मिलती है कोई बात नहीं ,
एक रोज मेरी सहेली को
दिमाग मे आया,आज सर को मजा चखाते है वह केमच की फली लाई और
वह कुर्सी के ऊपर डाल दी ,सर उस पर बैठे थोडी देर बाद उचक उचक कर
परेशान होने लगे ऐसी
खुजली मची वह परेशान और हम खुश खूब हँसे
दुसरे दिन पढाने नहीं आये बच्पन बीता पर
शैतानी आज भी याद आती है ।
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बचपन की चुलबुले किस्से
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वैसे तो गुरु बहुत सम्मानीय होते हैं, किन्तु जब वे शिष्य के साथ दुजना भाव करते हैं तब मन बहुत दुखी हो जाता है।ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ।N C C कैम्प्स में हमारी टीचर जी थी जो बहुत खड़ूस थी।गुस्सा सातवें आसमान पर।परफेक्शन के साथ परेड,शूटिंग,ड्रेसिंग, सब कुछ101 % परफेक्ट चाहिए रहता था।परेड में अगर ठीक कदमताल न करो तो,पैरों पर सोटी पड़ती।बारबार उनके गुस्से से मेरे मन से उतर गई थी वो।कैम्प में कैम्प फायर के बाद रात को हम 2 कैडेट्स उनके कमरे में चुपके से घुसकर पास की खटिया से चोटी बांध दी।औरहोंठों पर मुछे बना दी।सुबह में जब वे उठी तो उनके साथियों ने बहुत मज़ाक बनाया,खूब हँसी उड़ाई।हम सब तो दूसरे हॉल में थे ,तो हम पर शंका होने का कोई प्रश्न ही नहीं था।इसतरह से आज तक वो किस्सा सभी से छूपा है,किन्तु आज मुझे शैतानियों की बात याद आ गई ,क्योंकि मेरी ग्रुप की सखियोने भी बताने में संकोच नही किया,तो मैंने भी😁👍🏼💁♀️
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: गुरु की गुरूता
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बचपन में जो गुरु जी हमें पढ़ाते थ
वह कुर्सी पर बैठे बैठे ही सो जाते थे
फिर हम बच्चे उनका चश्मा छिपा कर भाग जाते थे
फिर चाहे गुस्से में ही सही पर ककहरा वही हमें सिखाते थे
गुरु का सही मतलब जाना जब हुए थोड़े बड़े।
पता चला कि वह तो भगवान से भी पहले थे खड़े।।
उन्होंने ज्ञान देकरहमें विद्या कीसीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ाया।
उनकी बदौलत ही हम आज अपने पैरों पर है खड़े।।
गुरु ना होते तो हम ज्ञान कहां से पाते।
गुरु ही हमें जिंदगी का पहाड़ा पढ़ाते।।
उन्होंने अगर हमें आज डांट ना लगाई होती तो
ना जाने हम जिंदगी की कितनी ठोकरें खाते।।
मां ने हमको जन्म दिया पर गुरु ने दिया आकार है
मां बाप के बाद गुरु के हम पर बहुत उपकार हैं।
जिन्होंने हमारे व्यक्तित्व को दिया एक नया नाम है।
ऐसे गुरु के चरणो में मेरा कोटि कोटि प्रणाम है।।
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गुरु वंदना
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श्रीगुरु चरण वंदन करूँ
करबद्ध करी गुण गाउँ
देऊ बुद्धि बल सकल ज्ञान
तव सेवक मैं हूँ नादान
मुझ पर कृपा करो गुरु
कुमार्ग पर कभी ना जाऊँ
न्याय सत्य पालन करूँ
पितुमात का मान बढ़ाऊं
मुझको कोई नहीं चाहत
सुख औरों का मेरी दौलत
अश्रु पराए मैं पोछूँ सर्वदा
दीनों पर लुटाऊं मैं खुशियां
विश्वास आधार हो सबका
संसार हो सुन्दर स्वर्ग सा
कोई ना हो बीमार लाचार
स्वप्न सारे हो जाए साकार
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वंदन
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: एकमेवाक्षरं यस्तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत् ।
पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद् दत्त्वा चाऽनृणी भवेत् ।
(जो गुरु एक अक्षर का भी ज्ञान कराता है, उसके ऋण से मुक्त होने के लिए, उसे देने योग्य पृथ्वी में कोई पदार्थ नहीं है ।)
आप सभी को प्रणाम,जिनसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता रहा है।
🙏गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएं🙏
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क्ररबध प्रणाम
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आज गुरु पूर्णिमा में मैं करबद्ध होकर अपने समस्त गुरुओं को नमन करती हूं जीवन काल में कोई एक गुरु नहीं होता जब से हम पैदा होते हैं प्रथम गुरु हमारी मां होती है फिर हम भाई बहनों से सीखते हैं फिर मित्रों से सीखते हैं हमारी संगति जो होती है वह हमें सिखाती है और फिर टीचर हमारे गुरु होते हैं जो लाइफ के अलग-अलग स्थान में हमें आगे बढ़ाते हैं शिक्षा देते हैं जैसे-जैसे जीवन बढ़ता है हमारे गुरु बदलते जाते हैं जीवन हमें खट्टे मीठे अनुभव देती हैं कुछ अच्छे लोग हमारे जीवन में आते हैं वह हमें आगे बढ़ा देते हैं कुछ बुरे लोग आते हैं वह भी हमारे गुरु हैं वह भी हमें सबक सिखा कर जाते हैं और वह गलती दोबारा न करने का हम प्रण करते हैं इसलिए जीवन के हर काल में गुरु बदलते रहते हैं लेकिन फिर भी जीवन के सारे आयाम तय करने के बाद यह समझ में आया कि सबसे बड़ा गुरु वह परमेश्वर है वह परवरदिगार है जिस पर आपकी आस्था है वह हर समस्या से आपको बाहर निकालता है वही मार्गदर्शन करता है वही आपकी रक्षा करता है वही समय-समय पर विभिन्न रूप में आकर मिलता है इसलिए जीवन में जितने भी लोगों से मैंने कुछ भी सीखा है वह सभी मेरे गुरु हैं और उन सभी के प्रति मैं कृतज्ञ हूं 🌷🌷🌷
*ममता बड़जात्या
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*गुरु पूर्णिमा - मेरा चिन्तन*
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प्रथम गुरु माता-पिता जिन्होंने हमें जन्म देने के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दिया। कोटि-कोटि नमन
गुरु महिमा का बखान असंभव है।।
ईश्वरीय शक्ति जिनके हर स्वरुप ने (-अवतार) हमें शिक्षा संस्कार से देते हैं, वे सभी दिव्य पवित्र आत्माएं ऋषि-मुनियों द्वारा विभिन्न ग्रंथ रामायण गीता वेद पुराण उपनिषद आदि की रचना करके आध्यत्मिक ज्ञान व्यवहारिक ज्ञान का संचार करने का माध्यम चुना और सद्मार्ग प्रशस्त किया। सभी ऋषि मुनि गण, कथाकार शिक्षकलेखक जिनसे हम जीवन में कुछ न कुछ ज्ञान गृहण करते रहते हैं।
हर वह आत्मा जो हमें अज्ञानता रुपी अंधकार से निकाल प्रकाश का मार्ग दिखाये जीवन के आदर्श मूल्यों से अवगत कराये, गुरु ही है।
जीवन क्षणभंगूर है। वहीं ज्ञान और गुरु का स्वरूप विस्तारित है।
वे सभी दिव्यआत्मायें जिनसे हमें जीवन में कुछ कुछ सीखने को मिल रहा है। वे परिवार जन समाज जन मित्रगणअलग अलग स्वरुप में हमारे इर्द गिर्द ही हैं।
आत्मायें छोटी बड़ी नहीं होती।
बड़ों के साथ बच्चों से भी हम सीखते हैं।
अतः सभी दिव्यात्माओं को कोटिश:नमन जिन्होंने मेरे अंतकरण को ज्ञान रुपी प्रकाश से प्रकाशित किया है।
इन्दौर (म०प्र०)
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शीर्षक
सार्थक बीज
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आज राहुल तड़के उठ गया था। स्नान कर मां के पास गया।उसे मां ने अचरज से देखा। राहुल नीचे झुककर पैर छू रहा था।प्यार से उठाते हुए मां ने पूछा क्या बात है राहुल तुम्हें घर में आये मेहमानऔर घर के सभी बड़े लोगों को नमस्कार करो कहने पर भी भाग जाते हो आज ये कैसा परिवर्तन है।
मां कल कक्षा में मेडम ने गुरू पूर्णिमा का महत्व समझाया था।वह कह रही थी गुरू ही शिष्य के सब दोषों को माफ कर सुधारता भी है। उन्होंने इतनी सारी ज्ञान की बातें बताई मां एक ही बात समझ में आई ।मां ने पूछा बेटा कौनसी बात? बच्चों की मां ही प्रथम गुरू होती है। इसलिए मां आप ही मुझे आशीर्वाद दो और सभी गलतियों को माफ कर दो।आज से आपकी हर बात समझकर पूरी करूंगा।
मां ने सजल नेत्रों से देखा और राहुल को चुमते हुए कहा सच है जीवन में गुरु का दिशा निर्देश बहुत महत्वपूर्ण होता है।वह ज्ञान का पुंज होता है। वास्तव में जिससे जो हम सीखते हैं,वह हमारा गुरु होता हैं।अपने देश में सभी कलाओं के शिक्षकों का बहुत श्रध्दा भाव से प्रेरित होकर पूजन करते हैं।गुरू का आशीर्वाद ही कल्याणकारी व ज्ञानवर्धक होता है।
हाथों में गुलाब के फूल लिए राहुल की नजरे मां को सम्मान पूर्वक देख रही थी।मां भी उस शिक्षकको धन्यवाद दे रही जिसने
राहुल के ह्रदय को परिवर्तित कर दिया था ।कहते हैं गिली माटी में बोया सार्थक बीज शुभ वृध्दि को प्राप्त होता है।
*अमिता मराठे
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गुरू
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बच्चों की पहले गुरु माँ बाप है क्योंकि बचपन उन्हीं की छत्र छाया मे बीतता हैं बच्चा तो कच्चे घडे जैसा होता है ।जो शिक्षा दोगे वहीं सिखेंगे गा तो माँ बाप को पहला नमन स्कूल मे शिक्षक हमारे गुरु गुरु हमें अंन्धकार से उजाले की और ले जाते है । हमारा भविष्य गुरु के हाथो मे है ।वो हमे पूर्ण रूप से तैयार करते हैं ताकी हम भटक ना जाये । भगवान ने भी गुरु से शिक्षा प्राप्त कर गुरु का मान बढाया , भगवान से गुरू ने ही मिलाया
गुरु गोविंद दोनो खडे काके लागु पाय
बलिहारी गुरु देव की गोविंद दीयो बताय
हमे अपने माँता पिता का हमेशा सम्मान करना चाहिए ।
और हमारे गुरु का जिसने हमे आज इस मुकाम तक पहुंचा या आज मे अपने गुरु को कोटि कोटि नमन करती हूं उनकी कृपा से आज मे ये चार लाइन लिख सकी
एसे गुरु को नमन
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: शत नमन , वंदन सस्नेह ,
गुणगान गुरु का
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निहित उसमें , उसकी विद्वता और सशक्तता का ।
कोमल मन , अधखिले स्वरूपों की , कच्ची माटी को ,
देता है वह नवाकार, कर निर्मित दृढ आधारभूमि ,
और सिंचित कर उन्हें ,
अपने --- प्रेम , चिंतन , धैर्य और संबल से ।
है पथ ये जीवन के नीचे - ऊँचें ,
कदम बढ़ातें उस पर,
होता साक्षात्कार ,
कभी उन अंचिन्हें पलों
नामालूम सी सख्शियतों से ,
जो कर देतें संरचना ऐसे
जीवन मूल्यों और प्रेणना की
जिसकी निर्मिति स्वयं
बन जाती गुरुमंत्र ।
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विषय -गुरुपूर्णिमा
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विधा -रोचक संस्मरण
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आज मेरी आयु तिरपन साल की है l यह संस्मरण तब का है जब मैं कक्षा तीसरी में थी l मैं अपनी कक्षा की सबसे बदमाश लड़की थी l हमारा लड़कियों का स्कूल था l हिंदी का वर्ग था l भार्गव मैडम बंदरगाह पाठ पढ़ाने वालीं थीं l उन्होंने पूछा लड़कियों बंदरगाह का अर्थ क्या होता है कौन बताएगा? मैंने जल्दी से हाथ ऊपर किया l उन्होंने कहा बताओ? मैंने कहा बंदरगाह याने जहाँ बंदर रहते है l मेरा जवाब सुनकर उन्होंने मुझे कक्षा से बाहर निकाल दिया l मुझे आज तक समझ नहीं आया कि उन्होंने मुझे शिक्षा क्यूँ दी? शिक्षा देने की जगह मुझे समझाना था l
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: हमारे देश में हीरो की परिभाषा ही गलत है। फिल्मी कलाकारों को हमारे देश में हीरो कहा जाता है ... जबकि हीरो सिर्फ असल जीवन में सफलता अर्जित करनेवाले ही होते हैं ... जो जीरो से उठ खड़ा हो वही हीरो है। ...
यह तस्वीर है कर्नाटक के छोटे से गाँव कडइकुडी (मैसूर) के एक गरीब किसान परिवार में पैदा हुये प्रताप की ... इस 21 वर्षीय वैज्ञानिक ने फ्रांस से प्रतिमाह 16 लाख की तनख्वाह, 5 BHK फ्लैट और 2.5 करोड़ की कार ऑफर ठुकरा दिया ... और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने इन्हें DRDO में नियुक्त किया है। ....
प्रताप एक गरीब किसान परिवार से हैं, बचपन से ही इन्हें इलेक्ट्रॉनिक्स में काफी दिलचस्पी थी ... 12 क्लास में जाते-जाते पास के सायबर कैफे में जाकर इन्होंने अंतरिक्ष, विमानों के बारे में काफी जानकारी इकठ्ठा कर ली ....
दुनियाँ भर के वैज्ञानिकों को अपनी टुटी-फुटी अंग्रेजी में मेल भेजते रहते थे कि मैं आपसे सीखना चाहता हूँ ... पर कोई जवाब सामने से नहीं आता ... इंजिनियरींग करना चाहते थे, लेकिन पैसे नहीं थे ....
इसलिये Bsc में एडमिशन ले लिया, पर उसे भी पैसों की वजह से पुरा नहीं कर पाये।
पैसे न भर पाने की वजह से इन्हें होस्टल से बाहर निकाल दिया गया ... यह सरकारी बस स्टैंड पर रहने सोने लगे, कपड़े वहीं के पब्लिक टॉयलेट में धोते रहे ... इंटरनेट की मदत से कम्प्युटर लैंग्वेजेस जैसे C,C++,java, Python सब सीखा ...
इलेक्ट्रोनिक्स कचरे से ड्रोन बनाना सीख लिया।
80 बार असफल होने के बाद आखिरकार वह ड्रोन बनाने में सफल रहे ... उस ड्रोन को लेकर वह IIT Delhi में हो रहे एक प्रतिस्पर्धा में चले गये... और वहाँ जाकर "द्वितिय पुरस्कार" प्राप्त किया... वहाँ उन्हें किसी ने जापान में होने वाले ड्रोन कॉम्पटिशन में भाग लेने को कहा...
उसके लिये उन्हें अपने प्रोजेक्ट को चेन्नई के एक प्रोफसेर से अप्रुव करवाना आवश्यक था... दिल्ली से वह पहली बार चेन्नई चले गये... काफी मुश्किल से अप्रुवल मिल गया... जापान जाने के लिये 60000 रूपयों की जरूरत थी... एक मैसूर के ही भले इंसान ने उनकी मदत की ...प्रताप ने अपनी माता जी का मंगलसुत्र बेच दिया और जापान चले गये।...
जब जापान पहूंचे तो सिर्फ 1400 रूपये बचे थे।... इसलिये जिस स्थान तक उन्हें जाना था उसके लिये बुलेट ट्रेन ना लेकर सादी ट्रेन पकड़ी।... 16 स्टॉप पर ट्रेन बदली... उसके बाद 8 किलोमिटर तक पैदल चलकर हॉल तक पहुंचे।...
प्रतिस्पर्घा स्थल पर उनकी ही तरह 127 देशों से लोग भाग लेने आये हुये थे।... बड़ी-बड़ी युनिवर्सिटी के बच्चे भाग ले रहे थे।... नतीजे घोषित हुये।... ग्रेड अनुसार नतीजे बताये जा रहे थे।... प्रताप का नाम किसी ग्रेड में नहीं आया।...
वह निराश हो गये।
अंत में टॉप टेन की घोषणा होने लगी। प्रताप वहाँ से जाने की तैयारी कर रहे थे।
10 वे नंबर के विजेता की घोषणा हुई ...
9 वे नंबर की हुई ...
8 वे नंबर की हुई ...
7..6..5..4..3..2 और पहला पुरस्कार मिला हमारे भारत के प्रताप को।
अमेरिकी झंडा जो सदैव वहाँ उपर रहता था वह थोड़ा नीचे आया, और सबसे उपर तिरंगा लहराने लगा...
प्रताप की आँखे आँसू से भर गयी। वह रोने लगे।...
उन्हें 10 हजार डॉलर (सात लाख से ज्यादा) का पुरस्कार मिला।...
तुरंत बाद फ्रांस ने इन्हें जॉब ऑफर की।...
मोदी जी की जानकारी में प्रताप की यह उपलब्धि आयी।... उन्होंने प्रताप को मिलने बुलाया तथा पुरस्कृत किया।... उनके राज्य में भी सम्मानित किया गया।... 600 से ज्यादा ड्रोन्स बना चुके हैं ...
मोदी जी ने DRDO से बात करके प्रताप को DRDO में नियुक्ती दिलवाई।... आज प्रताप DRDO के एक वैज्ञानिक हैं।...
इसलिये हीरो वह है, जो जीरो से निकला हो। प्रताप जैसे लोगों को प्रेरणा का स्त्रोत आज के विद्यार्थियों को बनाना चाहिये, ना की टिकटॉक जैसे किसी एप्प पर काल्पनिक दुनियाँ में जीने वाले किसी रंगबिरंगे बाल वाले जोकर को।
( प्रताप की कहानी मुझे ट्वीटर से मिली है, एक व्यक्ती ने अलग-अलग न्युज पोर्टल्स से इसे कंफर्म किया है। )
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गुरु
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मेरे प्रथम गुरु ,यानी मेरे माता पिता ।जब से होश संभाला ,उनको दिन प्रतिदिन कठिन परिस्थितियों का सामना करते देखा।केंद्र सरकार में उच्च पदों का निर्वाह करते पिता हमेशा स्थानांतरण के कारण घर से दूर ही रहते।हमारी पढ़ाई के कारण हम माँ के साथ रहते।माँ के पास एक हिसाब कॉपी होती थी ,जिसमे वे 2 रुपए का भी हिसाब लिखा करतीं।पिता अपने आदर्शों और ईमानदारी के कारण लोगो की कूटनीतियों का सामना करते और जीत हमेशा सत्य की ही होती।
मैंने अपने इन गुरुओं के आदर्श पर चलना और स्पष्टवादिता को आत्मसात किया जिसके कारण मुझे भी कभी कभी उन्ही विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है पर मुझे पता है कि मैं उनके दिखाए मार्ग पर चलती रहूंगी तो उनके आशीर्वाद के सहारे।
मेरे गुरु ,मेरे माता पिता को कोटिशः प्रणाम।💐🙏
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🙏🏻🌹गुरु पूर्णिमा के अवसर पर🌹🙏🏻*
*गुरु सत्य है, गुरु पूर्ण है, गुरु सादा, सरल और प्रेमी है। वह शिष्य का हित चिंतक है। *वह शिष्य*का धन नहीं अपितु उसका*अज्ञान लूट लेता है*
* *शिष्य* *का धन या द्रव्य नहीं अपितु चिंता* *वह पाप हर लेता* *है। गुरुजनों की यही महिमा होती है कि वह कठिन तपस्या के बिना शिष्य को परमात्मा का दर्शन करा* *देते हैं। घर में गुफा की शांति और एकांत का अनुभव करा देते हैं। प्रपंच में परमार्थ दिखाते हैं, गुरु की महिमा अपरम्पार होती है।*
*🌹🌹🙏🏻गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं🙏🏻🌹🌹*
*
*🙏🏻*गुरुदेव के चरणों मे वंदन*🙏*
*इंदौर*
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गुरु पूर्णिमा उपलक्ष्य में कुछ पुष्प गुरु चरणो में अर्पित💐💐💐
बहुत कुछ आया ह्रदय में यह लिखू ,वह लिखूँ; लिखा भी; सोचा भी ; हर दफ़ा । एक बार नही कई बार, हर बार - हर बार ,निष्कर्ष वही था की मेरा गुरु कौन! क्या 'सतगुरु' या उनसे मिलवाने वाली माँ ; जीवन के हर पल पर केसे चलेंगे यह दिखाने को कौन था फ़ीर हर वो बात जो खुशी की थी या घोर विपदा की हर एसे क्षण में मुझे कोन साथ दिखा कोई दुसरा नही वो थी मेरी माँ एसी निस्वार्थ गुरु जिसने बदले में कभी भी कुछ भी खुद्के लिये चाहा ही नही, वो कोई दुसरा नही वो हर कदम पर हर जगह गुरु मेरी माँ ही है। वह जो रस्ता सद्गुरु दिखाते हैं वो सफल हो यह प्रार्थना करने वाली होती है मेरी माँ । उस रास्ते पर मैं चलू यह कहने वाली भी माँ☺️😊
गुरु का गुणगान करना हमारे बस में है ही नही वो केवल महसूस किया जा सकता है , यह कुछ एसा है जेसे गूँगा गुड खा रहा है पर वो बयाँ नही कर सकता।
हर क्षेत्र में माँ सर्वोपरि है किन्तु आज समस्त उन गुरूजनो को भी प्रणाम जिन्होने प्रत्यक्ष परोक्ष रुप से कुछ सिखाया है।
जेसे सिक्के के दो पहलू होते हैं वेसे ही जीवन में भी एक सकारत्मक एवं नकारात्मक ठीक वेसे ही इस कुछ लोग साथ निभाने वाले कुछ साथ छोडने वाले वही कुछ मुसीबत में से निकालने कुछ उसमे डालने वाले और कुछ धोका देने वाले मिलते हैं आगे भी मिलते रहेंगे उन सभी का शुक्रिया क्युकि ये सब हमे वह सिखाते हैं जो हमें कोई नही सीखता । जो हमारी मुसीबत में काम आता है वह केसे किसी के काम आ सकते हैं;वही यह भी, की ,जो मुसीबत में डालते या भाग जाते हैं हमे जो महसूस हो रहा है वह हमारी वजह से कभी दुसरा न महसूस करे। एसी समस्त शिक्षा के हकदार गुरुओं को प्रणाम🙏🙏🙏
लेखनी को विराम देने से पुर्व दो शब्द :-
माँ तू तो सदा के लिये है प्रथम से अन्त गुरु तक ।
सतगुरु की भी बात निराली जब तेरे लिये नही सूझ रही थी राह मुझे उन्होने ही सुझाई थी वो बात जीवनदायनि।
एक गुरु आपको नज़रअदाज केसे कर दूँ आप हो मेरे स्वयं के विचार और मन जो सदेव यह शिक्षा देते हो मुझे कहि मुझसे कोई चूक ना हो जाये मिले संस्कारों में।
पुन: गुरुजनों को नमन🙏🙏🙏
*निधि गिरी
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*गुरु की महिमा*
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इस जग में गुरु का,
सबसे ऊंचा स्थान ।
जिसने गुरु की सेवा की,
बना है जग की शान।।
आओ मिलकर करें,
गुरुदेव की वंदना ।
आशीर्वाद मिले हमको,
दिल की यही तमन्ना ।।
आओ हम कर्ण,
एकलव्य बन जाए ।
और विवेकानंद बन कर,
जग में नाम कमाये ।।
कार्य हमारे ऐसे हो,
हम राष्ट्रभक्त कहलाएं । स्वर्णिमभारत का सपना,
साकार जगत में कर जाएं ।।
हे गुरू, परमपिता,
दे दो हमको वरदान ।
जिसने गुरू की सेवा की,
बना है जग की शान ।।
सुश्री हेमलता शर्मा
"भोली बैन"
राजेंद्र नगर इंदौर
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: 🙏गुरूवर🙏
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गुरूवर तुम्हें प्रणाम
देते हमकों ज्ञान
करें वो कल्याण
गुरूवर तुम्हें प्रणाम
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अर्पित करू
भाव पुष्प गुरु
वंदना करू
शीश नवाऊ
गुरूवर तुम्हें प्रणाम
🌸🌸🌸🌸
माँगू वर मैं
अटल सत्य पर
सदा रहूं मैं
जीवन सफल हो जाएं
गुरुवर तुम्हें प्रणाम
🌸🌸🌸🌸
लिखू जो
गुरू जीवन पर
मन उज्जवल हो जाएं
गुरूवर तुम्हें प्रणाम
🌸🌸🌸🌸
गुरु की वंदना
भक्ति मार्ग दिखलाएं
जीवन सवारा
उद्वार कर दिया
गुरूवर तुम्हें प्रणाम
🌸🌸🌸🌸
गुरूपूर्णिमा अभिनंदन हैं
गुरु को वंदन हैं
शिष्य की भक्ति का उत्सव हैं
गुरुवर तुम्हें प्रणाम
🌸🌸🌸🌸
ऐसी अन्तज्यौत जगा दो
मन वीणा झंकृत हो जाएं
भक्ति धारा बहती जाएं
गुरूवर तुम्हें प्रणाम ।।
🌸🌸🌸🌸
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गुरुपूर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं
🙏🙏🙏💐
हमारे गुरु
जिन्होंने हमारे जीवन को एक मूर्त्त रूप दिया और जिनके आशीर्वचन जो हमारा मार्गदर्शन करते रहे ,आज हम कला में लेखन में जो कर पा रहे है वो हमारे गुरु का आशीर्वाद है जो सदा हम पर बना रहता है,उनकी सीख हमेशा हमारे साथ रहती है।हम आज अपने जीवन में कोई भी सफलता पाते है वह हमें हमारी गुरु की भक्ति से ही मिलती है।जिनका अदृश्य हाथ हमारे सिर पर हमेशा रहता है।🙏🙏🙏
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सच्ची गुरु दक्षिणा”*
•═══
✦ एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन शिष्यों ने अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती की कि उन्हें गुरुदक्षिणा में उनसे क्या चाहिए?
✦ गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराए और फिर बड़े स्नेहपूर्वक कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए, ला सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे। सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं। वे उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा।’
✦ अब वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुंच चुके थे लेकिन यह देखकर कि वहां पर तो सूखी पत्तियां केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा!
✦ वे सोच में पड़ गए कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया। वे उसके पास पहुंच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला भर सूखी पत्तियां दे दे।
✦ अब उस किसान ने उनसे क्षमा याचना करते हुए बताया कि वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही उपयोग कर लिया था। अब, वे तीनों, पास में ही बसे एक गांव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहां उनकी कोई सहायता कर सके।
✦ वहां पहुंच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी पत्तियां एकत्रित किया करती थी। पर भाग्य ने यहां पर भी उनका साथ नहीं दिया क्योंकि वह बूढी मां तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की औषधियां बनाया करती थी।
✦ अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये । गुरु जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले आये गुरुदक्षिणा ?’तीनों ने सर झुका लिया।
✦ गुरू जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव, हम आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाए। हमने सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं।'
✦ गुरु जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले- ‘निराश क्यों होते हो ? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं। मुझे गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो। ’तीनों शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गए।
✦ वह शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त होकर सुन रहा था, अचानक बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी, अब मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं ? आप का संकेत, वस्तुतः इसी ओर है न कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का अपना-अपना महत्त्व होता है।
✦ गुरु जी भी तुरंत ही बोले-‘हाँ, पुत्र, मेरे कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाए उत्सव बन सके।
✦ दूसरे, यदि जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें। ’अब शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था।
✦ अंततः, मैं यही कहना चाहती हूँ कि यदि हम मन, वचन और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो भी यह कहानी खरी ही उतरेगी।
✦ सब के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत करने का दुस्साहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त बाधाओं को हर लेती है।
✦ वस्तुतः हमारे जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’ पुरुषार्थ ही होता है - ऐसा विद्वानों का मत है।
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*प्रथम श्रावण सोमवार*
*प्रभु मेरी आस पूर्ण कर दो*
🌹
💫 *जब तक प्राण रहे इस तन में,**
*मुझ में तव भक्ति भर दो।*
*रहूँ सदैव निकट मैं तुमसे,*
*मुझ में वह वैभव भर दो।।*
*न भूले यह चेतन अपनी चेतनता,*
*पर की चाह का अंत कर दो।* *स्व से मैं पहचान ही कर लूँ*
*सम्यक भाव प्रकट कर दो।।*
*टूटे न यह विश्वास की डोर कभी,*
*मुझ में वहअटल श्रद्धान भर दो।*
*पाप पुण्य की इस दुनिया में,*
*निर्मल भाव उदय कर दो।*
*जैसे आप वैसा हूँ मैं भी,*
*कर्तापन जरा कम कर दो।।*
*अनंत काल से भटक रहा हूं,*
*अब भटकन मेरी बंद कर दो।*
*आपका साथ न छूटे बस,*
*यह इक आस पूर्ण कर दो*।।
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मनमोहन
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: प्रकृति है सब से गुरु जान लो यार
चिड़िया कोयल से बेहतर गायन किसका
उपकार में जीवन गुजार दो कहती नदी कल कल बह कर समझौ दोस्त
चाहे जिवन हो बहुत छोटा सा दोस्त दल
फूलों की तरह महकने में ना कसर रहे
फलौ है जब वृक्ष लद जाते शीश झुकाते
जब संकल्प होना पहाड़ सा मजबूत होना
सावन की तरह झूम के चलो चाल मस्तानी
आज मोसम बदला कल बदले नसीब
मां सबसे पहली गुरु इंसान की दोस्त
मां तुझे गुरु पूर्णिमा पर तेरा वंदन करें
स्कूल के शिक्षक आपका वंदना करें
हाथ पकड़ कर लिखना जीसने सिखाया
साहित्यकार तेरा अभिनंदन सलाम तुझे
सत्य क्या असत्य क्या समझाया तुने
हर आदमी होता गुरु गर गोर से देखें
विधार्थी बनो बेहतर शिक्षा मिले सबको
गुरु बिना जीवन आधा अधुरा रहे दोस्त
गुरु की वंदना कर गुरु का मान बडाये
हम सब को श्रेष्ठ गुरु मिले कामना करते
गुरु की इज्जत करना हमारा कर्तव्य पथम
अलका जैन इंदौर
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गुरु को याद 🙏🙏🙏🙏
🙏बचपन से ही माना जो हमें कुछ सिखा पाए वही हमारा गुरु होता है। ऐसी ही सातवीं में हिंदी की अध्यापिका किरण मैम थी। जो हमें किताबों के अलाबा दुनिया की सीख देती थी। हमें जीवन में कैसे जीना चाहिये बताती थी। उनकी कक्षा का हमेशा इंतजार रहता था। एक बार हमसे बोली भगबान से जीवन में सिर्फ तीन चीजें मांगनी चाहिए। "विद्या, बुद्धि और साहस " हमारे पास ये तीनों हो तो हम जीवन में कभी नहीं हारेंगे.। आज उस बात को बीते तीस साल से ज्यादा बक्त हो गया पर आज भी जब भी भगवान के आगे हाथ जोड़ती हूँ तो विद्या, बुद्धि और साहस मांगकर किरण नाम जो सूर्य की किरण की तरह है उन महान गुरु को याद करती हूं।
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गुरु
सबका कोई न कोई गुरु होता है,
किसी केे लिए आप गुरु,
और आप किसी को गुरु मानते हो,
गुरु अपने सब बच्चों से प्यार करता है|
गुरु एक होता है,
पर उसके रूप अनेक होते हैं,
कोई गुरु ग़ुस्सा,
तोह कोई शांत होता है|
उनको हर साल नए बच्चे मिलते हैं,
वोह उनको सीखाता है,
और कुछ उनसे सीखता है,
गुरु सबसे महान हैं|
हर गुरु अलग तरह से सीखाता है,
इसका मतलब यह नहीं कि,
दुसरे गुरु केे पास ज्ञान नहीं,
सबके गुरु और उनका सिखाने का तरीक़ा अलग होता है|
गुरु की तुलना आप नहीं कर सकते,
वह अपनी मेहनत से उस जगह बैठा है,
गुरु हमेशा मार्गदर्शन का प्रतिक है,
चाहे आपको अच्छे लगे या नहीं पर उनका सम्मान हमेशा करो|
हर गुरु अपना घर छोड़ कर,
दुसरे बच्चों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं,
उनके लिए कोई छुट्टी नहीं होती,
और यह भी एक बात हैं,
कि हर कोई गुरु नहीं बन सकता|
उन्हें हर तरह केे बच्चों से निपटना होता है,
फिर भी वह अपने आप को संभालने की कोशिश करते हैं,
कोई बच्चा तेज़,
तोह कोई सीखने में धीमा होता है|
गुरु केे अंदर सब गुण होते हैं,
कोई गुरु खराब नहीं होता,
वह पहली नज़र में समझ लेता है,
कि बच्चा कितना सीख पाएगा|
गुरु हमेशा आपका अच्छा ही चाहता है,
उनको ना ही तुम्हारा कमाया पैसा या नाम चाहिए,
उनकी जीवन सफल है,
जब तुम कुछ अच्छा बन जाओ|
सभी गुरुओ को प्रणाम
*Nishant Vaidya
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।। 🌹गुरुदेव 🌹।।
गुरुदेव के आशीर्वाद से ,
सुगम मार्ग मिल जाता है ,
अंधकार सब दूर होकर ,
प्रकाश ज्ञान का फैल जाता है ।
गुरुदेव की कृपा से हमें ,
प्रभु भक्ति मिल जाती है ,
विषयों के मोह से हटकर, जीवन नैया पार हो जाती है ।
गुरुदेव दयालु होते हैं ,
जन कारज सिद्ध करते हैं ,
लोभ मोह में फंसे मनुज को ,
प्रभु मार्ग ले जाते हैं ।
जीवन में सद्गुणों का ,
दीप गुरु जगाते हैं,
दे कल्याण का ज्ञान हमेशा ,
खुशियों के फूल खिलाते हैं ।
निश्चयअटल बने गुरु मेरा ,
सन्मार्ग दिशा बढ़ता जाऊं ,
इंसान धर्म को सार्थक कर ,
दया धर्म निभाता जाऊं ।।
स्वरचित और मौलिक
*सीता देवी राठी
कूचबिहार
पश्चिम बंगाल
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++++++
*कुसुम*
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(संस्मरण )
जब मैं राजकीय बालिका इन्टर कॉलेज में प्रधानाचार्या थी ,तब मेरे पास चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तो आठ थै पर उनमें से चौकीदारऔर स्वीपर दिन की ड्यूटी करते नहीं थे , शेष छै चपरासियों में से केवल एक ही स्त्री थी । कुछ दिन बाद वह भी सेवा निवृत्त हो गई तो कठिनाई होने लगी । प्राय: किसी न किसी लड़की (छात्रा) की तबियत ख़राब हो जाती थी तब उसे महिला चपरासी के साथ रिक्शा में बैठा कर उसके घर भिजवाना पड़ता था । रिक्शा का किराया या तो लड़की के पास होता था ,या चपरसिन लड़की के घर पहुँचने के बाद उसकी मम्मी से ले लेती थी , साथ ही यह भी लिखवा कर ले आती थी कि उनकी बेटी ( नाम व कक्षा सहित ) सुरक्षित घर पहुँच गई कागज़ पर लड़की की माँ के हस्ताक्षर ,दिनांक सहित , करवा लिये जाते थे । एकमात्र चपरासिन के रिटायर होने के बाद
इस काम में कठिनाई आने लगी क्योंकि पुरुष चपरासी के साथ लड़की को रिक्शा में भेजने को मैं तैयार नहीं थी ,तब पुरुष चपरासी की साइकिल के कैरियर पर बैठा कर उसके घर भिजवाया जाने लगा पर मेरे मन में फिर भी शंका रहती थी ,कहीं बीमार लड़की गिर न जाये ।
ऐसे में जब एक अभिभावक ने अपने व्यय पर एक चपरासिन विद्यालय में रखने का प्रस्ताव दिया तो मैंने तुरन्त स्वीकार कर लिया ।उनका प्रस्ताव था कि जो स्त्री वे सेविका के रूप में रखवायेंगे उसे केवल दो सौ रुपये प्रतिमाह देने होंगे और यह दो सौ रुपये वे स्वयम् प्रतिमाह अभिभावक संघ के कोष में देंगे ।
मेरी स्वीकृति मिल जाने के बाद वे अगले दिन उस स्त्री को अपने साथ ले आये । वह निम्न मध्यम वर्ग की लगभग 25-26 वर्षीय स्त्री थी । तीन बच्चों की माँ होने पर भी कम उम्र लगती थी और थी भी ।
मैंने उसका संक्षिप्त सा
इन्टरव्यू लिया ।
मैं----तुम्हारा नाम क्या है ?
स्त्री ---- कुसुम
मैं--- क्या ,क्या काम कर सकती
हो ?
स्त्री-- जो आप कहें ।
मैं ---तनख्वाह कितनी लोगी ?
स्त्री-- जो आप दें
मैं ----देखो मैं तुम्हें दो सौ रुपये
प्रतिमाह दे सकती हूँ ।
स्त्री---ठीक है ।
स्त्री मुझे ठीक लगी ,और मैंने उसे रखने का मन बना लिया ।फिर भी मैंने उससे पूछा कि यदि मैं किसी महीने उसे वेतन न दे सकी तो वह क्या करेगी ? मन में डर तो था ही कि यदि वह सज्जन अपनी बात से पलट गये और दो सौ रुपये न दिये तो ? यह भी डर था कि महीने भर काम करने के बाद वेतन न मिलने पर वह हंगामा खड़ा कर सकती थी ।मेरे अन्तिम प्रश्न पर उसका उत्तर मुझे बहुत पसंद आया ।उसने कहा
"मैं समझ लूँगी कि मैंने अपने घर में काम किया ।" इसके बाद मैंने उसे विद्यालय में काम करने की अनुमति दे दी ।हर स्त्री को विद्यालय में रख भी तो नहीं सकते । क्या पता वह चोर हो या लड़कियों को कुमार्ग पर ले जाने वाली हो । क्योंकि वह सरकार की दी हुई नहीं थी और मेरी रखी हुई थी अत: सारा उत्तरदायित्व मेरा बनता था । वैसे भी उस विद्यालय का स्टाफ़ मेरे दोष ढूँढने में और उन्हे बढ़ा चढ़ा कर फैलाने में बहुत रुचि लेता था ,इसके दो कारण थे । एक तो वहाँ का स्टाफ़
आधा पहाड़ी और और आधा देसी ( मैदान का ) होने पर भी जो
लोग नेता टाइप थे वे पहाड़ी थे और मेरे देसी होने से नाराज़ थे ।
दूसरी शिकायत उनकी यह थी कि
सरकार ने प्रधानाचार्याओं का
direct recruitment क्यों किया ? उनकी पदोन्नति क्यों नहीं की ? अपनी पदोन्नति न हो पाने का विषाद वे डायरेक्ट कमीशन से आयी प्रधानाचार्या को परेशान कर के निकालती थीं । पहाड़ी क्लर्क व चपरासी भी उनके साथ जुड़ जाते थे जिनके कभी प्रघानाचार्या बनने की संभावना भी नहीं थी । देसी स्टाफ़ की वे इस प्रकार मस्तिष्क की धुलाई
( ब्रेन वॉश) करती थीं कि वे भी उन्ही के स्वर में स्वर मिलाने लगती थीं ।
उस संक्षिप्त साक्षात्कार के बाद कुसुम विद्यालय में काम करने लगी । उसके जीवन में मुख्य दुख तो पैसे के अभाव का था पर उसका पति शक्की था इस कारण भी वह दुखी रहती थी ।
मैंने उसे अपने कार्यालय के सामने चिक के बाहर बैठने और मेरे द्वारा घन्टी बजाये जाने पर अन्दर आने का आदेश दिया था ।
एक दिन एक सज्जन मेरे कमरे में आते ही बोले " दीदी इस स्त्री से कह दीजिये कि दरवाज़े के सामने बैठ कर न रोये ,अशुभ होता है।" शायद वह उनके आने के समय रो रही होगी । मेरे समझाने पर उसने बताया कि घर का टेंशन याद आ जाने पर आँसू आ जाते हैं । कक्षा सात तक पढ़ी होने पर भी *टेंशन* शब्द का बहुत अधिक और सटीक प्रयोग करती थी ।
थोड़े ही दिन में वह विद्यालय के वातावरण में घुलमिल गई । विद्यालय में नित्य ही खाने पीने का प्रोग्राम बन जाता । कभी किसी (शिक्षिका) का ,या उसके बच्चे का जन्मदिन है ,कभी किसी की विवाह की वर्षगाँठ है , किसी का बच्चा पास हुआ है या ऐसे ही किसी बहाने से किसी न किसी को घेर लिया जाता और उसे मिठाई नमकीन आदि खिलाना पड़ता । मैं इन लोगों में घुलती मिलती नहीं थी ,यद्यपि शिष्टाचार की बातचीत करती थी ,पर नाश्ते की प्लेट और चाय का कप सर्वप्रथम मुझे ही दिया जाता ।इन सारे आयोजनों में मुख्य भूमिका होती थी कुसुम की ।वही बाज़ार से चाय नाश्ता लाती ,प्लेटों में नाश्ता और कपों में चाय डालती और ट्रे में रख कर सबको बाँटती।
सदा रोती रहने वाली अब सदा हँसने वाली बन गई थी । बात बेबात खिलखिलाती रहती । वेतन तो उसका अभी दो सौ रुपया ही था पर शिक्षिकाओं के बीच चलने वाली बातों से होने वाला मनबहलाव और प्रायः नित्य ही चलने वाले चाय नाश्ता प्रोग्राम ने उसके जीवन में रंग भर दिया था । जब किसी शिक्षिका के पास चाय नाश्ता खिलाने का कोई कारण न होता तब contributary खाने पीने का प्रोग्राम चलता । एक कागज़ पर सहयोग राशि देने का प्रस्ताव लिख कर ,सब के नाम लिख दिये जाते । कुसुम ही बड़े उत्साह से सबसे लेकर रुपये जमा करती , फिर खाने का सामान ख़रीद कर लाती ,ट्रे में सजा कर सबको बाँटती और बाद में बर्तन धोकर रखती । तब तक दफ़्ती और प्लास्टिक के डिस्पोज़ेबल कप प्लेट नहीं चले थे । जाड़े के दिन आ जाने के कारण मैं भी अब अपने कक्ष के स्थान पर अपनी मेज़ धूप में ही लगवा लेती थी ।
इसलिये मेरे पास किसी चपरासी की अलग से ड्यूटी लगाया जाना आवश्यक नहीं था ।
कुसुम पहले तो बताती थी कि वह किसी का पहना हुआ कपड़ा नहीं पहनती ,पर जब एक शिक्षिका ने बड़े प्यार से समझा कर और छोटी बहन बता कर अपनी एक पुरानी साड़ी उसे दी तो उसने ले ली । साड़ी काफ़ी सुन्दर थी ।हो सकता है कहीं से कटी फटी हो जो दिखाई नहीं देती हो या यह भी हो सकता है कि उस शिक्षिका ने मन भर जाने के कारण साड़ी छोड़ दी हो । इसके बाद तो कुसुम के पास कपड़ों का ढेर आ गया । अनेक स्वेटर , साड़ियाँ , शॉल आदि उसके तन की शोभा बढ़ाने लगे । पहले वह
शक्ल सूरत से सामान्य दिखती थी पर अब सुन्दर दिखने लगी ।
एक बात बताना तो भूल ही गई । हमारे कॉलेज को सरकार ने
ज़बर्दस्ती एक बस दे दी । मैं तो लिख कर भेज चुकी थी कि चालक का पद न होने के कारण बस देना व्यर्थ है किसी और विद्यालय को यह बस दे दी जाये।
मैं तो निश्चिन्त हो गई पर मार्च के महीने में विभाग से लगातार दो तीन तार आ गये कि बस न ले जाने पर मेरे विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जायेगी । बस के लिये धनराशि का आवन्टन भी हो गया ।अब तो मुझे लखनऊ जाना पड़ा । एक चपरासी को साथ लेकर लखनऊ गई क्योंकि कॉलेज में केवल एक ही पुरुष क्लर्क था जो कैश बुक को पूर्ण करने , विभिन्न मदों में प्राप्त सरकारी धनराशि का उपभोग करने आदि में व्यस्त था
( मार्च में वित्तीय वर्ष की समाप्ति
होती है ), शेष दोनों लड़कियाँ थीं। मुझे दौड़ भाग में सहायता के लिये पुरुष सहायक चाहिये था ,अत: एक विश्वसनीय चपरासी को साथ लेकर लखनऊ गई । बस तो मिल गई पर उस बस को जसपुर (जहाँ मेरा विद्यालय स्थित था ) लाना आसान न था । जसपुर उन दिनों
नैनीताल ज़िले में आता था हालाँकि अब ऊधमसिंह नगर नामक ज़िले में आता है। प्रत्येक
ड्राइवर नैनीताल ज़िले का नाम सुन कर मना कर देता था । बहुत
समझाने पर कि जसपुर भले ही नैनीताल ज़िले में आता है पर तराई होने के कारण मैदान जैसा ही है , जो ड्राइवर मान भी जाता था वह अगले दिन आता नहीं था। इसी चक्कर में तीन दिन लखनऊ में रुकना पड़ा ।उधर कॉलेज में मेरे हस्ताक्षर के अभाव में वित्तीय कार्य नहीं हो सकते थे । बड़ी मुश्किल से एक ड्राइवर ने उचित से बहुत अधिक धनराशि पर हाँ की । मैंने उसका ड्राइविंग लाइसेन्स अपने पास रख लिया ।
वह ड्राइवर अगले दिन आया भी और तब मैं मार्च के अन्तिम दिन जसपुर पहुँच कर सभी बिलों पर हस्ताक्षर कर सकी।
बस आ जाने के बाद जनता का दबाव पड़ने लगा कि बस चलनी चाहिये । न ड्राइवर था न ड्राइवर के वेतन के लिये पैसा ।
अभिभावक संघ के सदस्यों के सुझाव पर हर छात्रा से प्रतिमाह एक रुपया लेकर उसका एक फ़ंड बनाया गया , एक ड्राइवर रखा गया और उसके वेतन का भुगतान इसी फ़ंड से किया जाने लगा । धनराशि क्योंकि ड्राइवर के वेतन से अधिक हो जाती थी अत: मैंने इसी फ़ंड से कुसुम के वेतन का भुगतान भी करना शुरू कर दिया । इस फ़ंड का रख रखाव भी एक अलग रजिस्टर पर बिलकुल अन्य boys' funds के समान किया जाता था । क्यों कि प्रतिवर्ष छात्राओं की संख्या बढ़ती जाती थी अत: इस फ़न्ड की धनराशि भी बढ़ती जाती थी । मैंने कुसुम का वेतन भी बढ़ा दिया ,क्योंकि उसका वेतन बहुत
कम था ।
कुसुम सुन्दर और फ़ैशनेबल वस्त्र पहनने की बहुत शौक़ीन थी ।उसके मुख से कई बार यह वाक्य सुना " खाया किसने देखा है ? पहना सबने देखा है "अर्थात भले ही भरपेट खाने को न मिले पर पहनना अच्छा चाहिये क्यों कि वह सबको
दिखाई देता है । भोली स्त्री यह नहीं जानती थी कि अभाव का जीवन और आधा पेट भोजन भी मनुष्य के चेहरे पर अपनी छाप छोड़ देते हैं । अभावग्रस्त जीवन जीने वाला दूर से ही पहचान में आ जाता है । "शो" शब्द का भी वह बहुत प्रयोग करती थी । एक बार उसने मेरे लिये एक बिना बाहों वाला स्वेटर बुना ( बुनाई में वह दक्ष थी और ऊन सलाई मेरी थी । "शो " के चक्कर में वह इतना टाइट बुना कि मेरी पसलियाँ दबने लगीं । जब मैंने स्वेटर अधिक चुस्त होने की बात कही तो उसने बताया कि टाइट स्वेटर में ही शो आती है ,ढीले में नहीं आती । मैं न तो शो में विश्वास रखती हूँ न इतनी शो सहन कर सकती थी अत: वह स्वेटर उधेड़ कर दोबारा बनाना पड़ा । अब वह लिपस्टिक लगा कर कॉलेज में आने लगी थी । जब मैंने उससे कहा कि कॉलेज में लिपस्टिक लगा कर नहीं आना चाहिये तो ऐसा लगा कि उसने लिपस्टिक लगाना छोड़ दिया है पर बाद में ध्यान गया कि वह चटख़ रंग की लिपस्टिक के स्थान पर बहुत हल्के गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगाने लगी थी । उसका लिपस्टिक प्रेम देख कर मैंने आगे कुछ नहीं कहा ।
उन दिनों मैं ऐसा करती थी कि घर में काम करने वाली सहायिका से एक किलो मैदा की मठरी बनवा लेती थी ।मेरा किशोर बेटा भी मेरे साथ रहता था , उसे समय बेसमय भूख लग सकती थी । मठरी बनने के दिन कुसुम भी मेरे घर पर आ जाती थी । दोनों आपस में ननद भाभी बनी हुई थीं । मुझे यह देख कर हँसी आती थी कि सामने तो दोनों
बहुत घुल मिल कर बात करती थीं पर कुसुम के जाते ही उसकी मुँहबोली भाभी सावित्री उसकी बुराई करने लगती थी और अवसर पाते ही कुसुम सावित्री की बुराई करने लगती थी । यह बताना आवश्यक है कि कुछ शिक्षिकाओं ने उसे मेरे घर आने से रोकने का बहुत प्रयास किया और कहा " तू प्रिन्सिपल के घर काम क्यों करती है ? तू विद्यालय के लिये रखी गई है ।" कुसुम ने बड़ी चतुराई से यह कह कर उनका मुँह बन्द कर दिया "मैं
प्रिन्सिपल के घर पर काम क्यों करूँगी ? उनके पास ख़ुद ही हर काम के लिये नौकरानी है । रही मठरी बनवाने की बात ,वह तो मैं
अपनी मुँहबोली भाभी से बातें करने जाती हूँ ,साथ साथ मठरी भी बनवा देती हूँ ।" यह वही शिक्षिकायें थीं जो शुरू शुरू में कुसुम को मेरे कमरे के सामने बैठने से भी रोकती थीं और उसे बार बार विभिन्न बहानों से बाजा़र भेजती थीं । उससे कहती थीं " तू
लड़कियों के लिये रखी गई है । प्रिन्सिपल के कमरे के सामने क्यों बैठती है ? " उस समय कुसुम नई नई आयी थी अतः उत्तर नहीं दे पाती थी पर वह सब बातें मुझे बता देती थी । तब मैंने उसे बताया कि जो टीचर कुसुम से बाज़ार जाने को कहे उससे कह दे
" प्रिन्सिपल से कहलवा दो ।"
इसके बाद यह समस्या समाप्त हो गई । मेरे पास आने की किसी की हिम्मत नहीं थी ।
कुसुम नित्य मेरे कमरे की चाबी मुझसे ले कर ,तुरन्त कमरा खोल कर साफ़ करती थी । मेरा आवास विद्यालय के परिसर मेंही बना होने के कारण यह कोई कठिन काम भी न था ।जब वह चाबी लेने आती थी उस समय मैं भी कॉलेज जाने को तैयार हो रही होती थी । प्रायः ही वह इस सम्बन्ध में परामर्श देती कि मुझे उस दिन कौन सी साड़ी पहननी
चाहिये । यदि मैं साड़ी पहन चुकी होती तो वह कभी साड़ी नीचे से खींच कर ठीक करती ,कभी पल्ला लम्बा करती ,कभी कन्धे पर चुन्नटें ठीक कर के पिन दोबारा लगाती ,तात्पर्य यह कि उस का हाथ लगे बिना मेरी तैयारी अपूर्ण रहती ।ऊनी कोट के स्थान पर
जब मैंने एक लम्बा कोटनुमा स्वेटर बुनवाना चाहा ( नैनीताल यानि हेडक्वार्टर पर बार बार जाना पड़ता था और सवेरे 4.45 की बस पकड़नी पड़ती थी क्योंकि उसी दिन लौटना भी होता था ।मेरा बेटा मात्र 13-14 वर्ष का था और उसे रात में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था । इसके अतिरिक्त नैनीताल मै रुकने की कोई व्यवस्था भी न थी । ) तो मुझे कुसुम से अधिक उपयुक्त कोई स्त्री न दिखी । उसने शादी से पहले भी स्वेटर बुन कर आजिविका चलाने का काम कर रखा था । कहने पर उसने तुरन्त हामी भर ली । मैंने उसकी बताई गई ऊन ,सलाइयाँ और चेन मँगवा दी । मेरा मनपसन्द सामने चेन लगा लम्बा कोटनुमा स्वेटर तैयार हो गया । लेकिन पैसे देने पर वह ज़िद पकड़ गई कि मुझसे रुपये नहीं लेगी ।मुझे बड़ी ग्लानि हुई कि मैं क्यों किसी ग़रीब की मेहनत मुफ़्त में लूँ ! मुझे पता होता कि यह पैसे नहीं लेगी तो मैं इस से बुनवाती ही नहीं ,किसी और से बुनवाती ।मेरे लाख कहने पर भी वह मेहनताना लेने को तैयार नहीं हुई । उसका कहना था कि मैंने उसकी ज़िन्दगी बदल दी थी अत: वह मुझसे मेहनताना नहीं ले सकती थी । उसका वाक्य
" दीदी ,इसी बहाने मेरी निशानी आपके पास रहेगी । इसे देखेंगी तो मुझे याद तो करेंगी ।" वह स्वेटर अभी भी मेरी अलमारी में हैंगर पर लटका है । वह बहुत बदल गई थी । उसका हर समय हँसना देख कर विश्वास ही नहीं होता था कि यह वही कुसुम है जो पहले हर समय रोया करती थी ।
उस समय उसका वेतन 200/- से
बढ़ कर 500/- हो गया था ।
कुछ समय बाद मेरी D.I.O.S. पद पर प्रोन्नति हो गई और मैं वहाँ से चली आई। पता नहीं मेरे बाद कुसुम का क्या हुआ ।पता नहीं मेरे बाद आने वाली प्रिन्सिपल ने उसकी सेवाएं चालू रखीं या नहीं ।
मैंने जिन्हे कार्यभार हस्तान्तरित किया था ,वह तो वहीं की प्रवक्ता थीं । हो सकता है वह अभी भी उसी विद्यालय में हो ।यद्यपि यह 1991या 1992 की घटना है ।अधिक संभावना इस बात की है कि मेरे आने के बाद ही उसका पत्ता साफ़ हो गया हो ।जो भी हो ,मैं उसके जीवन के कुछ वर्ष तो प्रफ़ुल्लतामय बना सकी , इसका संतोष है ।
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गुरु की महिमा
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गुरुदेव शत शत करू चरण वंदन,
कृपा करो ऐसी, मिटे भव बंधन,
गुरु की महिमा अपरम्पार है जीवन में उनका सर्वोच्च स्थान है हमे अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले रोशनी के ये वो पुंज है जो जीवन को रोशन करने की अद्भुत क्षमता रखते है,जीवन के सच्चे मार्ग दर्शक,जीवन के यथार्थ का बोध कराने वाले,अच्छे संस्कार देने वाले,उचित ज्ञान शिक्षा देने वाले प्रमुख आधार स्तम्भ,प्रेरणा के स्रोत सच्चे गुरु होते है सबसे पहले देव शास्त्र गुरु के चरणों शत शत नमन,जीवनदाता,जीवन रक्षक ,सबसे बड़े पथ प्रदर्शक माता पिता को उचित शिक्षा देकर योग्य बनाने वाले शिक्षकों को,आत्म कल्याण का जीवन की सच्चाई का बोध कराने वाले अपनी अमृत वाणी से कृतार्थ करने वाले अध्यात्म गुरु को, इसके अलावा जीवन में सच्ची प्रेरणा देने वाले अन्य सभी गुरु के चरणों में शत शत नमन, उन सभी के प्रति श्रद्धा,प्रेम विश्वास सम्मान हमेशा बना रहे यही कामना करते है,वाकई ऐसे सच्चे गुरु के संसर्ग में आकर धन्य हो जाते है,,,,धन्य है उनकी महिमा।
* नवनीत जैन
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मे खंडवा में माखनलाल चतुर्वेदी कोलेज में पड़ती थी मेरी गुरु कृष्णना अग्निहोत्री थी मुझे बहुत पसन्द थी में हर वक़्त सामने रहना पसन्द करती थी उनके लिए में पानी आदि कई चीजें उनको देती मेडम ने कहाँ किरण ऐ सब मत करा करो मेने क़हां मेडम में आपको गुरु मानती हु मेरेको आपकी सेवा करने अच्छा लगता हे मेंआपकी शिष्या हु वेखुश हो गई ओर मेरेको आशीर्वाद दिया ऐक दिन उनका जन्म दिन थामेने सरप्राइन रखा वसब के साथ बुके दियायक़ीनमानो मेरेको देख वे इतनी खुश हो गई व मुझे आशीर्वाद दियाअब मेरा व मेरेगुरू क़ासम्बंध हो गया में उनका कोलेज में देखतीरोज़ जेसे हीवेआती मेंउनकी साथ हो लेती मेने अपने गुरु की सेवा की आज भी मेंउनको नमन करती हु उन्ही के कारण मेरी झिझक मिटी हे ओर मेंआगे बड़ीआज भी वे इन्दोर में 🙏हेओरमें उन्हें याद करती हु🙏मेरी अपनी यादें हे जब भी गुरु पूनम आती हे में उन्हें नमन करती हुक़ी उनकी बादोलत आज में इस मुक्काम पर पहुँची। यादें रह जाती हे समय नीकल जाता हे। पुरानी कोलेज के जमाने क़ी यादें
अतिसुन्दर सभी रचनाऐं एक से बढ कर एक हैं एक अद्भत संकलन के लिये बहुत बहुत बधाईयाँ।
ReplyDeleteएक दिन के अन्दर इतना सुन्दर संकलन प्रसतुत करना अपने आप में एक मिशाल हैं। बहुत बहुत बधाईयाँ। कुन्दन पाटिल देवास
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