प्रेम
*मेघना रॉय
स्वतः जनित हृदय ,संवाद है प्रेम---
स्फूर्ति की निश्छल ,अविरल धार है प्रेम
जहाँ गिरा हो जाती है सनयन,
नयन करते नीरव भाषण।
नहीं मांगता जो प्रतिदान,
देना चाहता जो बलिदान।
प्रेम मे कहाँ प्रदर्शन,
भाता जिसे सिर्फ समर्पण।
नि:स्वार्थता की पराकाष्ठा है प्रेम।
प्रकृति के हर कण मे है प्रेम, भास्कर की मौन भाषा, पुलकित हो,
कुमुदिनी से कुछ कहती--
तो शशि की नीरव धवल चाँदनी, है रजनीगंधा को भाँति।
अंतस की ज्योतिर्मय राह है प्रेम,
सतत निर्झर प्रवाह है प्रेम।
यह उन्मुक्त होता है, स्वछंद नहीं--
स्वतंत्र होता है, उत्श्रृंखल नही---
साध्य नहीं, साधना है प्रेम--
अमूर्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति है प्रेम,
सम्पूर्ण समग्रता से ऊपर उठकर,
व्यक्ति से समष्टि बन,
निखर,मुखर,हो बिखर, सँवर जाता है ये प्रेम।।
*मेघना रॉय
स्वतः जनित हृदय ,संवाद है प्रेम---
स्फूर्ति की निश्छल ,अविरल धार है प्रेम
जहाँ गिरा हो जाती है सनयन,
नयन करते नीरव भाषण।
नहीं मांगता जो प्रतिदान,
देना चाहता जो बलिदान।
प्रेम मे कहाँ प्रदर्शन,
भाता जिसे सिर्फ समर्पण।
नि:स्वार्थता की पराकाष्ठा है प्रेम।
प्रकृति के हर कण मे है प्रेम, भास्कर की मौन भाषा, पुलकित हो,
कुमुदिनी से कुछ कहती--
तो शशि की नीरव धवल चाँदनी, है रजनीगंधा को भाँति।
अंतस की ज्योतिर्मय राह है प्रेम,
सतत निर्झर प्रवाह है प्रेम।
यह उन्मुक्त होता है, स्वछंद नहीं--
स्वतंत्र होता है, उत्श्रृंखल नही---
साध्य नहीं, साधना है प्रेम--
अमूर्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति है प्रेम,
सम्पूर्ण समग्रता से ऊपर उठकर,
व्यक्ति से समष्टि बन,
निखर,मुखर,हो बिखर, सँवर जाता है ये प्रेम।।

Amazing
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