Friday, February 21, 2020

सृष्टि के है रचयिता शिव ,
जग के परमपिता हैं शिव।
जटा धरे है गंगा अपनी ,
तन मले भस्मचिता हैं,शिव।
नही चाहते कठिन तपस्या ,
नही चाहते धन का दान ।
बेलपत्र और जल अर्पण से
द्रवित हो जाते कृपानिधान।
पापकर्म और अनाचार से
रुष्ट होते हैं भोले शंकर।
तांडव नृत्य से कंपा दें धरती,
नेत्र तीसरा खोले शंकर।
शिवरात्रि का पर्व है पावन ,
शिवमय सा है मानो कण कण।
प्रसाद कृपा का मांगें शिव से ,
शिवमय ही हो अपना जीवन।

अचला गुप्ता
इंदौर

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