Thursday, February 13, 2020

मूरत है कर्तव्य ,प्रेम की,
हर संकट पर भारी है।

लेकिन खामोशी की चादर
ओढ़े बैठी नारी है।

बचपन बीता आदेशों और
पाबन्दी के साए में,
आज भी धूमिल सपनों की
यादें नयनों में खारी हैं।

न्यौछावर कर डाले अपने
सपने सारे अपनों पर,
अपमानित हो आंसू संग
रातें चुपचाप गुजारी हैं।

पाली पोसी अपनी छाया
सपनों को गूंथा उनके,
फिर भी उलाहनों के बोझ से
आँचल उसका भारी है।

नही चाहिए दौलत ,शोहरत,
थोड़ा सा सम्मान उसे दो ।
प्रेमदीप की ज्योत जलेगी,
वह पूजा की थाली है।

अचला गुप्ता
इंदौर

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