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| प्रभा जैन |
।अपने हाथों से उन्होंने सजाया था अपनी बहुरानी को।उनके शब्द थे पैर में पाय जेब पहनाते हुए।सदा सुहागन रहो, पूतो फलो।
बहुरानी या पायजेब ,बिछिया,सुहाग की निशानी छे।कभी भी निकालजे मत। ऐकी आवाज से तो घर की रौनक छे।न मालूम पडज कि लाडी बाई यंहाज कनि काम करी रिज।शायद यह एक घर मे पुरुष वर्ग को अलर्ट करने का तरीका हो सकता है।बिछिया,पायजेब भी घुँघरूवाले जो होते थे,,,
बिछिया पायजेब हमेशा सुहागन का ही श्रृंगार होता था जिससे पता पड़ता था कि कौन सधवा,और कौन विधवा
कुछ भी कहो ये पैरो के श्रृंगार को आज की आधुनिक महिलाओं ने तन से हटा दिया है,,,,उन्हें बेड़ी मानकर स्वतन्त्रता के दौर में ऊंची उड़ान भरना चाहती हैं।आजकी आधुनिक नारी को ये सब ढकोसले लगते हैं।किन्तु समय के साथ मैं अनुभवी,समझदार हो गई हूं,इसलिए ये जरूर सोचती हूँ कि,,,नही हमारे पूर्वज बहुत समझदार और बुद्धिशाली थे।उनकी ज़िंदगी जीने के तरीके में हमेशा चतुराई होती थी।प्राकृतिक रूप से अपने आपको स्वस्थ रखनेका तरीका उनके पास था।अर्थात उदाहरण के रूप में भारी भरकम गहनों को ही लें।जो एक्यूप्रेशर का काम करतेथे।पैरो की अंगुली में पहन ने वाली बिछिया,से एक्यूप्रेशर होता है जो महिला सम्बन्धी माहवारी,प्रग्नेंसी आदि परिस्तिथि के लिए लाभदायी होती है।हमारे पैरो में पहने जाने वाले गहने महिला के अच्छे स्वास्थ्य ,कमर,घुटने,पेट आदि रोगों के सुधार में एक्यूप्रेशर के सहायक होकर काया को निरोगी बनाते हैं।
आज की आधुनिक बच्चियों से मेरा यही कहना है कि हम पुरानी पीढ़ी की दादी नानी,सासुजी के विचारों को अपने हित मे मानते हुए सकारात्मक सोच रखें।ये ना सोचे,कहें,की ये सब तो ढकोसले हैं।
सचमुच में मुझे आज भी याद आती है मेरी वो प्यारी 2 सासूमाँ, जो अपने बेटे की लंबी उम्र की कामना करते हुए वर्ष में चार बार,दिवाली, दशेरा, पर्युषण, सुहाग दशमी पर नई नई डिज़ाइन की पायजेब बिछिया की जोड़ लाकर पहनाती थी।शायद उन के दिए गए उन आशीर्वाद से ही मैं अपने भरे पूरे परिवारके साथ स्वस्थ,और खुश हूँ।
अंत मे यही कहूंगी
सासुमाँ के सबसे प्रथम प्यारेसे उपहार बिछिया ने ही एक स्नेहिल पिया दिया,या ये कहो कि प्यारे पिया ने ही बिछिया से श्रृंगारित किया।🙏🏻
स्वरचित,:प्रभा जैन।19 जुलाई 2019

आपने बहुत ही सुन्दर वर्णन किया है सुहाग की निशानियों का,आपकी सास याने मेरी नानी ने मुझ से भी पैरो की बिछियां देख कर शादी के बाद पूछा था,सुहाग की निशानी बस पैर मैं,मंगल सूत्र,चूड़ी पायल सब पहना कर।आज भी उनकी याद आ जाती है,और में सारे श्रृंगार लगा लेती हूँ।
ReplyDeleteप्रीति