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| वंदना अर्गल |
नारी और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं सदीयों से।सोलह श्रृंगार करना हर नारी के मन को भाता है।शीश से नख तक नारी अनेक आभूषणों से सुसज्जित होती है।सुहाग चिन्हों में बिछीया का अपना एक अलग अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।शादी में माँग भराई,बिछीया दबाई दो बहुत ही महत्वपूर्ण नेग माने गये हैं।दुल्हनो को बिछीया पहने जब देखती थी बहुत ही अच्छा लगता था। आलता लगे पाँव में पायल और बिछीया सदैव मुझे आकर्षित करते थे। बिछीया पहनना सांईटिफिकली भी सही है हमारे शरीर के प्रेशर पाँइंट दबते हैं ।जब शादी के समय दुल्हन बन बिछीया पहनी तो बेहद सुखद अनुभव था।आजकल माॅडर्न जमाने मे एक फैशन भी बन चुका है।लाल आलता लगे पैर हों या बिना आलता के चाँदी की बिछीया मन मोह लेती है।

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