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| मानवेन्द्र नारायणी माया |
*गुरू वो मृदंग है:- जिसके बजते ही अनाहद नाद सुनने शुरू हो जाते है !*
*गुरू वो ज्ञान हैं :-जिसके मिलते ही पांचो शरीर एक हो जाते हैं !*
*गुरू वो दीक्षा है:- जो सही मायने में मिलती है तो भवसागर पार हो जाते है !*
*गुरू वो नदी है :- जो निरंतर हमारे प्राण से बहती हैं !*
*गुरू वो सत चित आनंद है:- जो हमें हमारी पहचान देता है !*
*गुरू वो अमृत है :-जिसे पीकर कोई कभी प्यासा नही रहता है !*
*गुरू वो मृदँग है :-जिसे बजाते ही सोहम नाद की झलक मिलती है !*
*गुरू वो खजाना है :-जो अनमोल है !*
*गुरू वो प्रसाद है :-जिसके भाग्य में हो, उसे कभी कुछ भी मांगने की ज़रूरत नही पड़ती हैं|*

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