पायल की रुन झुन और कंगना की खन खन गर्वित हों कहतीं,
बिछिया तुम खामोश सी पांव की
उंगलियों में क्यों पड़ी रहती?
बिछिया यह सुन मुस्काई और
शुभ्र आभा से लगी दमकने।
बोली ,बहनों ,हम सब तो हैं सुहागिनों के अनमोल गहने।
जब मैं सजती सुहागिनों के पांव
में ,हो जाती अनमोल।
स्त्रीत्व की गरिमा है मुझसे,सभी
जानते मेरा मोल।
खनक नही है तुमसी मुझमे ,
लेकिन दमक की हूँ मैं स्वामिनी।
मुझे पहन जब इठलातीं हैं ,हर
नारी लगती है कामिनी।
अचला गुप्ता
इंदौर
बिछिया तुम खामोश सी पांव की
उंगलियों में क्यों पड़ी रहती?
बिछिया यह सुन मुस्काई और
शुभ्र आभा से लगी दमकने।
बोली ,बहनों ,हम सब तो हैं सुहागिनों के अनमोल गहने।
जब मैं सजती सुहागिनों के पांव
में ,हो जाती अनमोल।
स्त्रीत्व की गरिमा है मुझसे,सभी
जानते मेरा मोल।
खनक नही है तुमसी मुझमे ,
लेकिन दमक की हूँ मैं स्वामिनी।
मुझे पहन जब इठलातीं हैं ,हर
नारी लगती है कामिनी।
अचला गुप्ता
इंदौर

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