Saturday, July 20, 2019

बिछिया और चुभन (लघुकथा)

सौफे पर बैठी पान चबाती सास ने झाड़ू लगाती बहू से पूछा , "क्यों री बहू ! तेरी उँगली  में बिछुए नहीं दिख रहे , 
क्यों उतारे ? अपशकुन कर दिया हमारे घर में ।तुझे मालूम है न जिंदगी में एक ही बार सुहाग के ये मंगल जेवर उतरते हैं । जब उसका पति ऊपर चला जाता है ।"
 " क्या करूँ माँजी , इन्होंने शराब के नशे में काँच का गिलास पैर पर दे  मारा  । सारी  अंगुलियाँ सूज गयी हैं । "
  " पीक फेंकते हुए , ह म्बे जरा सा ही लगा , जा बिछुआ ढीला कर पहन के आ ।"
"  न माँजी ,  घाव पर बिछुआ बहुत चुभता है । "
 मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई

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